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Climate Change: भूजल नियंत्रण, ग्लेशियर निगरानी से पर्यावरण बचा रहा है लद्दाख; समग्र और वैज्ञानिक मॉडल लागू

अमर उजाला नेटवर्क, लेह Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 30 Mar 2026 03:34 AM IST
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सार

भूजन दोहन पर सख्ती, ग्लेशियरों की सैटेलाइट निगरानी, जल संरक्षण ढांचे का विस्तार, टिकाऊ पर्यटन नीति और बड़े पैमाने पर जैविक खेती को एक साथ जोड़ा गया है। 

Ladakh is saving the environment through groundwater management and glacier monitoring.
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विस्तार

लद्दाख ने जलवायु संकट से निपटने के लिए अब पारंपरिक उपायों से आगे बढ़कर एक समग्र और वैज्ञानिक मॉडल लागू किया है। भूजन दोहन पर सख्ती, ग्लेशियरों की सैटेलाइट निगरानी, जल संरक्षण ढांचे का विस्तार, टिकाऊ पर्यटन नीति और बड़े पैमाने पर जैविक खेती को एक साथ जोड़ा गया है। 

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यह पहल केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि जल, भूमि और आजीविका के संतुलन को ध्यान में रखते हुए एक दीर्घकालिक जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल तैयार करने की दिशा में कदम है। इस व्यापक रणनीति की जानकारी 24 मार्च को दायर उस अनुपालन हलफनामे में दी गई है, जो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देशों के तहत तैयार किया गया है। लद्दाख प्रशासन ने जल संकट की जड़ पर प्रहार करते हुए लेह जिले के अर्ध-संकटग्रस्त क्षेत्रों में भूजल दोहन पर सख्त नियंत्रण लागू किया है। 
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23 दिसंबर 2024 के आदेश के तहत इन क्षेत्रों में नए बोरवेल खोदने पर प्रभावी रोक लगा दी गई है। जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। इसे देखते हुए जियो-स्पेशियल लद्दाख परियोजना के तहत इसरो की मदद से ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए रिमोट सेंसिंग तकनीक का उपयोग शुरू किया गया है। यह परियोजना पूरी हो चुकी है और इसके जरिए ग्लेशियरों के पिघलने, झीलों के विस्तार और संभावित खतरे का आकलन किया जा रहा है।

ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली झीलों के अचानक फटने का खतरा (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) लद्दाख के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है। संवेदनशील झील क्षेत्रों को इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर, लेह से जोड़ा जाएगा, ताकि किसी भी संभावित आपदा से पहले चेतावनी जारी की जा सके। यह प्रस्ताव राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को भेजा गया है।

गांवों से शहर तक जल संरक्षण का नेटवर्क मजबूत
जल संरक्षण के क्षेत्र में लद्दाख में बड़े पैमाने पर संरचनात्मक बदलाव किए गए हैं। मनरेगा, एसएसपी, एसडीपी और जिला कैपेक्स जैसी योजनाओं के तहत 811 जल संचयन संरचनाएं बनाई गई हैं। इसके साथ ही इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट प्रोग्राम के तहत 42 जल टैंक, तालाब, सिंचाई नहरें और चेक डैम विकसित किए गए हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य वर्षा जल को संरक्षित करना, भूजल रिचार्ज बढ़ाना और सूखे की स्थिति से निपटना है। लेह शहर में टी-ट्रेंच परियोजना को अमृत योजना के तहत पुनर्जीवित किया गया है, जिससे भूजल पुनर्भरण और प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण को बल मिलेगा। 

टिकाऊ पर्यटन की दिशा में बदलाव
पर्यटन से बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए लद्दाख ने नीति स्तर पर बदलाव शुरू किए हैं। 2024 में लागू सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) नीति के तहत होटल और गेस्ट हाउस में विकेंद्रीकृत एसटीपी लगाने को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके साथ ही 2025 की नई प्रोत्साहन योजना का मसौदा तैयार किया गया है। 
 

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