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पहलगाम हमले का एक साल: इंसानियत पर आतंकियों के वार की टीस नहीं हो रही कम, परिजनों ने यादों के सहारे जीना सीखा

रोली खन्ना,अमर उजाला, जम्मू Published by: Digvijay Singh Updated Tue, 21 Apr 2026 06:00 AM IST
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सार

22 अप्रैल 2025...स्थान पहलगाम की बायसरन घाटी...हंसते-खिलखिलाते चेहरों से भरा मैदान अचानक चीखों में बदल गया। चार दिन पहले दुल्हन बनी एक बेटी, गोद में पति का सिर लिए पत्थर सी बैठी थी...चारों तरफ 26 लाशें और सन्नाटा...आज भी यह मंजर रूह कंपा देती है।

One Year Since the Pahalgam Terror Attack Families Have Not Forgotten the Wounds in jammu
बहू के साथ शुभम के माता पिता - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

22 अप्रैल 2025...स्थान पहलगाम की बायसरन घाटी...हंसते-खिलखिलाते चेहरों से भरा मैदान अचानक चीखों में बदल गया। चार दिन पहले दुल्हन बनी एक बेटी, गोद में पति का सिर लिए पत्थर सी बैठी थी...चारों तरफ 26 लाशें और सन्नाटा...आज भी यह मंजर रूह कंपा देती है। आहिस्ता-आहिस्ता एक साल बीत गया, पर जख्मों से आज भी टीसें उठती हैं। दर्द कुछ कम हो इसलिए किसी ने सेवा को दर्द की दवा बना लिया, किसी ने यादों को जीने का सहारा बना लिया। यह हौसले की कहानी है। टूटकर भी जीने की कहानी है...रोली खन्ना की रिपोर्ट...

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मेरे बेटे शुभम को घूमने का बहुत शौक था बायसरन गया तो लौटा नहीं। आतंकियों ने पहली गोली बेटे के माथे पर मारी थी वह हमारे सपनों में रंग भर रहा था, पर गद्दारों ने उसे छीन लिया, हमारा सबकुछ चला गया, उम्मीदें चली गईं, पर संकल्प लिया कि गद्दारों के सामने हौसला नहीं टूटने देंगे। कानपुर के संजय द्विवेदी और सीमा द्विवेदी बेटे शुभम को याद करते-करते भावुक हो जाते हैं, फिर दृढ़ता दिखाते हुए कहते हैं, हमने ठाना है कि हम शुभम ही नहीं, बल्कि पहलगाम के सभी शहीदों की स्मृतियों को सहेज कर रखेंगे। संजय कहते हैं, जिंदगी के इस दर्द में, उतार-चढ़ाव में हमारी बहू ऐशन्या हर वक्त हमारे साथ रही, जैसे शुभम रहता था, वह हर कदम बेटे का फर्ज निभाती रही, आतंकियों ने जब शुभम को गोली मारी थी, तब ऐशन्या भी वहीं थी जो कुछ उसने सहा, उसने पूरे देश को झकझोर दिया, उसने खुद को संभाला, हमारे हौसले को डगमाने नहीं दिया वह बहू नहीं, हमारी बेटी है। हर हालात में साथ खड़ी रहती है। हमारे चेहरे पर उदासी नहीं आने देती। मगर यह भी सच है जब तक सांसें हैं, ताउम्र टीस मिटेगी नहीं। 

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'जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए'

One Year Since the Pahalgam Terror Attack Families Have Not Forgotten the Wounds in jammu
ले. विनय नरवाल के परिजन - फोटो : अमर उजाला

ले. विनय नरवाल के पिता राजेश नरवाल पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र उठते ही कहते हैं, देखिए! हमारे खून में देश सेवा का जज्बा है। हमारे परिवार के कई सदस्यों ने किसी न किसी रूप में देश की सेवा की है और कर रहे हैं। मेरे बेटे ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया, पर वो यूं चला जाएगा पता नहीं था। मेरे पिता चौधरी हवा सिंह 80 साल के हो चुके हैं। मां बिरमी देवी 79 वर्ष की हैं। पिता और मां कहते हैं कि आज भी घर में उनको पोते विनय की आवाज सुनाई देती है। पूछने पर वे कहते हैं, आवाज लगाता सुनाई देता है...। इतना कहते-कहते राजेश नरवाल का गला रुंध आता है। फोन पर बातचीत के दौरान उनकी रुंधी आवाज उस दर्द की टीस को बखूबी बयां कर देती है।

पहलगाम हमले के बाद बायसरन घाटी में पति के शव के पास बैठी एक युवती की जो तस्वीर वायरल हुई थी, वो राजेश नरवाल के बेटे ले. विनय नरवाल और उनकी बहू हिमांशी की थी। राजेश कहते हैं कि बहू ने एकेडमिक क्षेत्र में अपने कॅरिअर को आगे बढ़ाने का फैसला लिया उसे सरकार से मदद भी मिली है। मेरी बेटी पढ़ाई कर रही है। मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती पत्नी आशा और बूढ़े माता-पिता को संभालने की है। उसकी (बेटे) याद किसी के मन से जाती नहीं है। यादें तो ताउम्र यूं ही रहेंगी। जम्मू-कश्मीर को आतंकमुक्त बनाने के लिए हमें इस तरह की घटनाओं से सबक लेने की जरूरत है। ऑफबीट स्थलों की सुरक्षा को कड़ा करना होगा। अभियान चलाकर आतंकियों का अब सफाया कर देना चाहिए।

कैसे समझाएं उनको...दादा-दादी को आज भी लगता है कि पोता उन्हें आवाज दे रहा है, राजेश नरवाल  (ले. विनय नरवाल के पिता)

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यतीश परमार के परिजन - फोटो : अमर उजाला

22 अप्रैल, 2025 के दोपहर तीन बजे एक वीडियो वायरल हुआ। इसमें मेरा भतीजा सुमित परमार दिखा। उसने वही कपड़े पहने थे जो जाने से पहले मैंने उसे दिलाए थे। उस वक्त हमें यही मालूम था कि आतंकियों ने हमला किया है। थोड़ी देर में पता चला कि मेरे बड़े भाई यतीश परमार और भतीजा घायल हैं। अस्पताल में भर्ती हैं। शाम होते-होते मौत की खबर मिली। अमित एक झटके में उस दिन के पूरे घटनाक्रम को ऐसे बता जाते हैं, जैसे कोई रील रीप्ले कर दी गई हो। कहते हैं, मैं समझ ही नहीं पाया था कि घर में कैसे बताऊं। पिता 70 साल के बुजुर्ग हैं, उनके सामने कहने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। यह कहते-कहते अमित चुप हो गए। फिर रुंधे गले से कहा, कुछ वक्त बाद आपसे बात करूंगा, अभी कुछ कह पाने की हिम्मत नहीं हो पा रही है। आंसू थमने और उस बुरी याद से खुद को निकालने में उन्हें पूरा एक दिन लग गया। अगले दिन कॉल किया, तो बताया कि भाभी काजल बेन तो अब तक सदमे में हैं। दो बेटे थे। एक तो उसी हमले में चला गया, दूसरा लैब टेक्नीशियन है।

अमित कहते हैं कि मोरारी बापू की कथा में हिस्सा लेने भावनगर से बड़ी संख्या में लोग श्रीनगर गए थे। वहां से पहलगाम चले गए। भाभी आज भी उस घटना को याद कर सिहर उठती हैं। कहती हैं, मोदी को जाकर बताओ, मोदी को जाकर बताओ (पीएम मोदी का नाम लेकर आतंकियों ने गोलियां बरसाईं थीं) आज भी मेरे कानों में गूंजता है। दोबारा कोई ऐसा दुस्साहस न करने पाए, हमें कुछ इस तरह से इंतजाम करने होंगे।  बूढ़े पिता को क्या बताएं...भाभी के कानों में आज भी आतंकियों की वो बात गूंजती रहती है, अमित परमार (स्व. यतीश परमार के भाई)

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