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Jammu News: अंबारा में लगा मेला, लोगों ने लिया बुआ तृप्ता का आशीर्वाद
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श्रद्धालुओं के लिए लगाया लंगर, सुरक्षा के रहे कड़े प्रबंध
संवाद न्यूज एजेंसी
अखनूर। चैत्र नवरात्र पर अंबारा स्थित बुआ तृप्ता देवस्थान में वार्षिक मेला सोमवार को संपन्न हुआ। इसमें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मुंबई समेत विभिन्न राज्यों से श्रद्धालुओं ने पहुंचकर बुआ तृप्ता के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। विधायक मोहन लाल ने देवस्थान में पूजा-अर्चना की। मेले में झूले और मनोरंजन के साधन विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। विभिन्न दुकानों पर पारंपरिक वस्त्र, धार्मिक सामग्री, मिठाइयां और सजावटी सामान की खूब खरीदारी हुई। श्रद्धालुओं के लिए भंडारा भी लगाया गया। नायब तहसीलदार अशोक कुमार के नेतृत्व में सुरक्षा और व्यवस्थाओं के पुख्ता इंतजाम किए गए। एसडीपीओ वरिंदर गुप्ता, थाना प्रभारी अखनूर राजेश जसरोटिया, थाना प्रभारी घरोटा राजेश वर्मा सहित अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे। मेले में विभिन्न समुदायों और 22 जातियों के लोग एक साथ शामिल होकर बुआ तृप्ता के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। चिनाब नदी के निकट स्थित यह प्राचीन देवस्थान आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है।
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600 वर्ष पुराना है मेले का इतिहास
बुआ तृप्ता मेला 600 वर्ष पुरानी परंपरा का प्रतीक है। इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व गहरा है। लोक मान्यताओं के अनुसार यह मेला पंवार राजवंश के राजा जगदेव सिंह से जुड़ा हुआ है जिनकी कुलदेवी बुआ तृप्ता थीं। बुआ तृप्ता रामगढ़ क्षेत्र की एक अत्यंत सुसंस्कृत व धार्मिक महिला थीं जिनका विवाह नाद ब्राह्मण समुदाय के युवक से हुआ था जो पंवार राजवंश के राजा नील देव के कुल पुरोहित थे। कथाओं के अनुसार दरबार से जुड़ी अफवाहों और परिस्थितियों के चलते एक दिन उनके पति को राजा के दरबार में बुलाया गया। जाते समय उन्होंने बुआ तृप्ता से संभावित संकट की आशंका जताई। अचानक फैली अफवाहों और बाजार में मची अफरा-तफरी को उनके अनिष्ट से जोड़कर बुआ तृप्ता ने सती होकर अपना जीवन समाप्त कर लिया। जब उनके पति सकुशल लौटे तो इस घटना से पूरा क्षेत्र शोकाकुल हो गया। लोक विश्वास है कि उनके तप, त्याग और बलिदान के कारण बुआ तृप्ता को देवी स्वरूप माना जाने लगा।
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अखनूर। चैत्र नवरात्र पर अंबारा स्थित बुआ तृप्ता देवस्थान में वार्षिक मेला सोमवार को संपन्न हुआ। इसमें पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मुंबई समेत विभिन्न राज्यों से श्रद्धालुओं ने पहुंचकर बुआ तृप्ता के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। विधायक मोहन लाल ने देवस्थान में पूजा-अर्चना की। मेले में झूले और मनोरंजन के साधन विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। विभिन्न दुकानों पर पारंपरिक वस्त्र, धार्मिक सामग्री, मिठाइयां और सजावटी सामान की खूब खरीदारी हुई। श्रद्धालुओं के लिए भंडारा भी लगाया गया। नायब तहसीलदार अशोक कुमार के नेतृत्व में सुरक्षा और व्यवस्थाओं के पुख्ता इंतजाम किए गए। एसडीपीओ वरिंदर गुप्ता, थाना प्रभारी अखनूर राजेश जसरोटिया, थाना प्रभारी घरोटा राजेश वर्मा सहित अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे। मेले में विभिन्न समुदायों और 22 जातियों के लोग एक साथ शामिल होकर बुआ तृप्ता के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। चिनाब नदी के निकट स्थित यह प्राचीन देवस्थान आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है।
600 वर्ष पुराना है मेले का इतिहास
बुआ तृप्ता मेला 600 वर्ष पुरानी परंपरा का प्रतीक है। इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व गहरा है। लोक मान्यताओं के अनुसार यह मेला पंवार राजवंश के राजा जगदेव सिंह से जुड़ा हुआ है जिनकी कुलदेवी बुआ तृप्ता थीं। बुआ तृप्ता रामगढ़ क्षेत्र की एक अत्यंत सुसंस्कृत व धार्मिक महिला थीं जिनका विवाह नाद ब्राह्मण समुदाय के युवक से हुआ था जो पंवार राजवंश के राजा नील देव के कुल पुरोहित थे। कथाओं के अनुसार दरबार से जुड़ी अफवाहों और परिस्थितियों के चलते एक दिन उनके पति को राजा के दरबार में बुलाया गया। जाते समय उन्होंने बुआ तृप्ता से संभावित संकट की आशंका जताई। अचानक फैली अफवाहों और बाजार में मची अफरा-तफरी को उनके अनिष्ट से जोड़कर बुआ तृप्ता ने सती होकर अपना जीवन समाप्त कर लिया। जब उनके पति सकुशल लौटे तो इस घटना से पूरा क्षेत्र शोकाकुल हो गया। लोक विश्वास है कि उनके तप, त्याग और बलिदान के कारण बुआ तृप्ता को देवी स्वरूप माना जाने लगा।
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