SIT जांच में खुलासे: सरकारी स्कूलों में कैसे पहुंचीं अलगाववादी किताबें? जांच एजेंसियों के रडार पर पूरा नेटवर्क
एसआईटी जांच में सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में मिली विवादित किताबों के मामले में राजनीतिक संरक्षण और व्यापक साजिश की आशंका जताई गई है।अब तक आठ अधिकारियों को निलंबित और एक संविदा कर्मचारी की सेवा समाप्त की गई है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में विवादित किताबों के मामले में एसआईटी के हाथ लगे साक्ष्य और आरोपी प्रकाशकों से पूछताछ में जो पता चला है उसके अनुसार अलगाववादी किताबों को राजनीतिक संरक्षण में लिखा गया है।
इसके पीछे व्यापक साजिश की आशंका है। सूत्रों के अनुसार इन किताबों के बहाने जम्मू-कश्मीर का माहौल एक बार फिर खराब करने की तैयारी थी लेकिन ताबड़तोड़ कार्रवाई से योजना सफल नहीं हो सकी। इस मामले में अब तक की कार्रवाई निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों तक ही सीमित रही है।
आठ अधिकारियों को निलंबित किया जा चुका है और एक संविदा कर्मचारी की सेवा समाप्त कर दी गई है लेकिन पूरी खरीद प्रक्रिया और निगरानी से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। विभागीय सूत्रों के अनुसार किताबों के चयन, खरीद, वितरण और स्कूलों तक पहुंचाने की प्रक्रिया कई स्तरों पर होती है।
इसके बावजूद कार्रवाई सिर्फ उन अधिकारियों और कर्मचारियों पर हुई, जो निचले स्तर पर जिम्मेदारी निभा रहे थे। ऐसे में विभाग के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि पूरी प्रक्रिया की निगरानी करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की जांच कब होगी।
समग्र शिक्षा की लाइब्रेरी व्यवस्था में किताबों के चयन और खरीद के साथ-साथ उनके वितरण और स्कूलों में पहुंचने के बाद निगरानी की जिम्मेदारी भी तय है। मुख्य शिक्षा अधिकारी और अन्य संबंधित अधिकारी समय-समय पर निरीक्षण कर पुस्तक सामग्री का सत्यापन करते हैं। ऐसे में यदि यह व्यवस्था ठीक से लागू होती तो विवादित किताबें स्कूलों की लाइब्रेरी में नहीं पहुंचतीं। ऐसे मामले में केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर देने से पूरी जिम्मेदारी तय नहीं मानी जा सकती।
एक अधिकारी के राजनीतिक रिश्तों की चर्चा
विभागीय सूत्रों का दावा है कि मामले से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के राजनीतिक और पारिवारिक संबंधों के कारण उनके खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। सूत्रों के अनुसार अधिकारी का ससुराल पक्ष एक बड़े राजनीतिक घराने से जुड़ा है। अधिकारी की पत्नी के भाई चेयरमैन भी रहे हैं। ससुर राजनीतिक पहुंच वाले हैं। एक प्रभावशाली लोकसभा सांसद से भी नजदीकी बताई जा रही है। विभागीय हलकों में चर्चा है कि इन्हीं संबंधों के कारण जांच का दायरा शीर्ष स्तर तक नहीं पहुंच पाया। इस अधिकारी को एक मंत्री का भी खास माना जाता है।
अब रिपोर्ट पर टिकी सबकी निगाह
विवाद सामने आने के बाद सरकार ने जम्मू और कश्मीर संभाग में 10-10 सदस्यीय सत्यापन समितियां बनाई हैं। ये समितियां स्कूलों की लाइब्रेरी में मौजूद किताबों की जांच कर रही हैं और उन्हें 30 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट देनी है। विभाग के सूत्रों का कहना है कि अब सबकी नजर इसी रिपोर्ट पर है। इससे साफ होगा कि जांच केवल निचले स्तर तक सीमित रहती है या वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी इसके दायरे में आती है।
सीआई के प्रकाशकों से सवाल...कंटेंट कहां से मिला, पढ़ा था तो आपत्ति क्यों नहीं जताई ?
अलगाववादियों के महिमामंडन के आरोपों से जुड़ी किताबों के मामले में काउंटर इंटेलिजेंस (सीआई) ने सोमवार को गिरफ्तार तीन प्रकाशकों से मंगलवार को दूसरे दिन भी पूछताछ की। अधिकारियों ने किताबों के कंटेंट, उसके स्रोत व प्रकाशन प्रक्रिया से जुड़े सवालों के जवाब लिए। प्रकाशकों से पूछा गया कि कंटेंट कहां से मिला, पढ़ा था तो आपत्ति क्यों नहीं जताई? इस पर प्रकाशक चुप्पी साध गए। सूत्रों के अनुसार मामले में शिक्षा विभाग के एक कद्दावर अधिकारी का भी जुड़ाव सामने आ रहा है।
ऐसे में अगर राजनीतिक संरक्षण नहीं मिला तो जल्द ही उनकी भी गिरफ्तारी हो सकती है। सूत्रों के अनुसार ओबरॉय बुक सर्विस के इंद्रपाल तथा नोएडा स्थित डोमिनेंट पब्लिशर्स के अमरदीप सिंह और गिरीश अरोड़ा से पूछताछ की गई। आरोपियों से पुस्तकों के प्रकाशन, संपादन, अनुमोदन और मुद्रण प्रक्रिया से जुड़े अन्य सवाल भी पूछे गए। पूछताछ करीब पांच घंटे तक चली, जिसमें जांच टीम ने एक-एक बिंदु पर जवाब दर्ज किए। अब तक प्राप्त जानकारी और दस्तावेज के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया जा रहा है। जरूरत पड़ने पर मामले में अन्य संबंधित व्यक्तियों से भी पूछताछ की जा सकती है।