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Jharkhand News: असम में अलग राह, क्या झारखंड में टूटेगा साथ? झामुमो-कांग्रेस आमने-सामने
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: राँची ब्यूरो
Updated Tue, 24 Mar 2026 08:34 PM IST
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सार
असम विधानसभा चुनाव के बाद झामुमो और कांग्रेस के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। सीट बंटवारे पर सहमति नहीं बनने के कारण झामुमो ने 21 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए, जिससे गठबंधन में दरार के संकेत मिल रहे हैं।
असम चुनाव के लिए टिकट देते JMM के नेता
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
असम विधानसभा चुनाव के बाद झारखंड की राजनीति में हलचल तेज होती नजर आ रही है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस के बीच बढ़ते मतभेद अब बड़े सियासी बदलाव का संकेत दे रहे हैं। दोनों दलों के बीच असम में सीट बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बन पाई, जिसका असर गठबंधन पर साफ दिखाई दे रहा है।
सीट बंटवारे पर नहीं बनी बात
जानकारी के मुताबिक, असम चुनाव में झामुमो ने 21 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। इनमें ज्यादातर सीटें आदिवासी बहुल इलाकों की हैं। कांग्रेस जहां झामुमो को सीमित सीटें देने के पक्ष में थी, वहीं झामुमो ने अपने संगठन और जनाधार के भरोसे अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया।
आदिवासी वोट बैंक पर झामुमो की नजर
बताया जा रहा है कि झामुमो ने पहले से ही असम में अपनी जमीन तैयार कर ली थी। पार्टी की रणनीति आदिवासी वोट बैंक को साधने पर केंद्रित रही, जिसके चलते उसने गठबंधन से अलग राह अपनाई। इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की भूमिका काफी अहम मानी जा रही है। उनके नेतृत्व में झामुमो ने आक्रामक रुख अपनाया और गठबंधन की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। इस फैसले के बाद कांग्रेस खेमे में बेचैनी बढ़ गई है।
झारखंड की राजनीति पर पड़ सकता है असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि असम का यह विवाद झारखंड की राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है। अगर दोनों दलों के रिश्ते और बिगड़ते हैं, तो राज्य में गठबंधन कमजोर पड़ सकता है। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी के साथ किसी तरह की सेटिंग के आरोपों को लेकर अभी तक कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। फिलहाल इसे केवल राजनीतिक अटकलें ही माना जा रहा है। कुल मिलाकर, असम चुनाव के बाद झारखंड में सियासी “खेला” होने की चर्चा तेज हो गई है। अब देखना होगा कि आने वाले समय में झामुमो और कांग्रेस साथ बने रहते हैं या दोनों की राहें अलग हो जाती हैं।
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सीट बंटवारे पर नहीं बनी बात
जानकारी के मुताबिक, असम चुनाव में झामुमो ने 21 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। इनमें ज्यादातर सीटें आदिवासी बहुल इलाकों की हैं। कांग्रेस जहां झामुमो को सीमित सीटें देने के पक्ष में थी, वहीं झामुमो ने अपने संगठन और जनाधार के भरोसे अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया।
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आदिवासी वोट बैंक पर झामुमो की नजर
बताया जा रहा है कि झामुमो ने पहले से ही असम में अपनी जमीन तैयार कर ली थी। पार्टी की रणनीति आदिवासी वोट बैंक को साधने पर केंद्रित रही, जिसके चलते उसने गठबंधन से अलग राह अपनाई। इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की भूमिका काफी अहम मानी जा रही है। उनके नेतृत्व में झामुमो ने आक्रामक रुख अपनाया और गठबंधन की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। इस फैसले के बाद कांग्रेस खेमे में बेचैनी बढ़ गई है।
झारखंड की राजनीति पर पड़ सकता है असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि असम का यह विवाद झारखंड की राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है। अगर दोनों दलों के रिश्ते और बिगड़ते हैं, तो राज्य में गठबंधन कमजोर पड़ सकता है। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी के साथ किसी तरह की सेटिंग के आरोपों को लेकर अभी तक कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। फिलहाल इसे केवल राजनीतिक अटकलें ही माना जा रहा है। कुल मिलाकर, असम चुनाव के बाद झारखंड में सियासी “खेला” होने की चर्चा तेज हो गई है। अब देखना होगा कि आने वाले समय में झामुमो और कांग्रेस साथ बने रहते हैं या दोनों की राहें अलग हो जाती हैं।