Jharkhand: OTT से फीचर फिल्म तक, झारखंड आदिवासी महोत्सव में सिनेमा की बारीकियों पर खुलकर हुई चर्चा
झारखंड सरकार द्वारा आयोजित झारखंड आदिवासी महोत्सव के दूसरे दिन मोरहाबादी मैदान स्थित वीर बुधु भगत सभागार में लघु और एनिमेशन फिल्मों की स्क्रीनिंग के साथ फिल्म निर्माण पर विशेष मास्टरक्लास और पैनल डिस्कशन हुआ।
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विस्तार
झारखंड सरकार की ओर से आयोजित झारखंड आदिवासी महोत्सव के दूसरे दिन सोमवार को मोरहाबादी मैदान स्थित वीर बुधु भगत सभागार में लघु एवं एनिमेशन फिल्मों की स्क्रीनिंग के साथ फिल्म निर्माण पर विशेष पैनल डिस्कशन और मास्टरक्लास का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड में फिल्म निर्माण की संभावनाओं, तकनीकी प्रशिक्षण, स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर देने और राज्य की अपनी सिनेमाई पहचान विकसित करने पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि झारखंड के सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत उसकी अपनी मिट्टी, भाषाएं, संस्कृति, लोककथाएं और कहानियां हैं।
फिल्म स्क्रीनिंग के साथ मास्टरक्लास और पैनल डिस्कशन
फिल्म स्क्रीनिंग के साथ आयोजित मास्टरक्लास और पैनल डिस्कशन ने युवा फिल्मकारों, विद्यार्थियों और सिनेमा में रुचि रखने वाले दर्शकों को फिल्म निर्माण के रचनात्मक और तकनीकी पक्षों को करीब से समझने का अवसर दिया।
पैनल में सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट के हेड इंद्रनील मुखर्जी, सुदीप्तो भट्टाचार्य और फिल्म निर्देशक निरंजन कुजूर शामिल रहे। तीनों विशेषज्ञों ने फिल्म निर्माण से जुड़े विभिन्न रचनात्मक पक्षों, प्रोडक्शन, निर्देशन और एडिटिंग के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
कल्याणी खत्री ने पूछे फिल्म निर्माण से जुड़े सवाल
कल्याणी खत्री ने पैनलिस्टों से फिल्म निर्माण की प्रक्रिया से जुड़े कई व्यावहारिक और तकनीकी सवाल पूछे। चर्चा के दौरान यह जानने की कोशिश की गई कि झारखंड में फिल्म निर्माण की शुरुआत कैसे की जाए, कहानी का चुनाव किस आधार पर हो और क्या बिना औपचारिक प्रशिक्षण के भी फिल्म बनाई जा सकती है।
इसके अलावा प्रकाश और प्राकृतिक रोशनी के इस्तेमाल, अभिनय में भावनाओं की सीमा तय करने, अभिनेता और निर्देशक के बीच रचनात्मक तालमेल विकसित करने तथा ओटीटी और फीचर फिल्मों की एडिटिंग में अंतर जैसे विषयों पर भी सवाल किए गए। पैनलिस्टों ने अपने अनुभवों के आधार पर इन सवालों के जवाब दिए और फिल्म निर्माण को लेकर दर्शकों की जिज्ञासाओं को दूर किया।
‘फिल्म बनाने के लिए प्रशिक्षण से ज्यादा जरूरी है अपनी कहानी और दृष्टि’
फिल्म निर्माण में प्रशिक्षण की भूमिका पर चर्चा करते हुए सुदीप्तो भट्टाचार्य ने कहा कि फिल्म बनाने के लिए हमेशा औपचारिक प्रशिक्षण जरूरी नहीं है। बिना संस्थागत प्रशिक्षण के भी अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट सोच और अपनी कहानी को समझने की क्षमता जरूरी है।
उन्होंने कहा कि ऐसे कई फिल्मकार हैं, जिन्होंने औपचारिक रूप से फिल्म निर्माण की ट्रेनिंग नहीं ली, लेकिन उनकी डॉक्यूमेंट्री और फिल्मों में जीवन को देखने की गहरी दृष्टि दिखाई देती है। उनके अनुसार, प्रशिक्षण तकनीकी दक्षता बढ़ाता है, लेकिन फिल्मकार की संवेदना, दृष्टि और कहानी कहने की क्षमता उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है।
प्राकृतिक रोशनी से लेकर एलईडी तक बदली फिल्म निर्माण की दुनिया
फिल्मों में लाइटिंग के इस्तेमाल को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में पैनलिस्टों ने कहा कि किसी दृश्य में प्राकृतिक प्रकाश का इस्तेमाल करना है या कृत्रिम रोशनी का, यह कहानी, दृश्य और निर्देशक की रचनात्मक जरूरत पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक प्रकाश की अपनी खूबसूरती और स्वाभाविकता है। इसलिए कई फिल्मकार आज भी कहानी की जरूरत के अनुसार प्राकृतिक रोशनी को प्राथमिकता देते हैं। चर्चा में यह बात सामने आई कि तकनीक केवल एक साधन है, जबकि किसी दृश्य को प्रभावशाली बनाने का निर्णय फिल्मकार की दृष्टि करती है।
भावनाओं का संतुलन सिनेमा की बड़ी चुनौती
फिल्म में भावनात्मक दृश्यों को लेकर कल्याणी खत्री के सवाल पर पैनलिस्टों ने इसे पाककला से जोड़कर समझाया। उनका कहना था कि जिस तरह भोजन में यह समझना जरूरी है कि कौन-सा मसाला कितना और किस समय डालना है, उसी तरह सिनेमा में भी यह समझना जरूरी है कि किसी दृश्य में भावनाओं की मात्रा कितनी होनी चाहिए और कहां उसे रोक देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि फिल्म में इमोशन केवल अभिनेता के अभिनय से पैदा नहीं होता। निर्देशन, एडिटिंग, कलर, साउंड, म्यूजिक और दर्शक की मनोदशा मिलकर किसी दृश्य के भावनात्मक प्रभाव को तय करते हैं। दर्शक को भावनाओं से जोड़ना जरूरी है, लेकिन भावनाओं की अति फिल्म को बोझिल भी बना सकती है।
‘अपनी मिट्टी की महक वाली कहानियां लिखना चाहता हूं’
फिल्म की कहानी और स्क्रिप्ट के चयन को लेकर पूछे गए सवाल पर फिल्म निर्देशक निरंजन कुजूर ने कहा कि उनके लिए कहानी का सबसे महत्वपूर्ण आधार वह चीज है, जो उन्हें भीतर से प्रभावित करती है। झारखंड की संस्कृति, समाज और अपनी जमीन से जुड़े अनुभव उन्हें कहानी लिखने के लिए प्रेरित करते हैं।
उन्होंने कहा कि वह ऐसी कहानियां लिखना और प्रोड्यूस करना पसंद करते हैं, जिनमें अपनी संस्कृति और मिट्टी की महक हो। कुरुख जैसी क्षेत्रीय भाषाओं और आदिवासी जीवन से जुड़े विषयों को सिनेमा में स्थान देना उनके रचनात्मक काम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के अवसरों ने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया, लेकिन वापस लौटकर उन्होंने अपनी जमीन और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी कहानियों पर काम करने को प्राथमिकता दी।
अभिनेता और निर्देशक के बीच समझ से बेहतर होता है अभिनय
अभिनेता के मूड और उसकी क्षमता को निर्देशक किस तरह समझता है, इस सवाल पर पैनलिस्टों ने कहा कि यह एक दिन में विकसित होने वाली प्रक्रिया नहीं है। इसकी शुरुआत कास्टिंग के समय से ही हो जाती है। अभिनेता की ऊर्जा, उसकी अभिव्यक्ति और व्यक्तित्व को देखकर निर्देशक यह समझने की कोशिश करता है कि किस भूमिका और परिस्थिति में उससे बेहतर काम लिया जा सकता है। शूटिंग के दौरान लगातार संवाद और साथ काम करने से अभिनेता और निर्देशक के बीच रचनात्मक समझ विकसित होती है। यही तालमेल अभिनय को अधिक सहज और प्रभावी बनाता है।
OTT और फीचर फिल्मों की एडिटिंग अलग
ओटीटी और फीचर फिल्मों की एडिटिंग के अंतर पर चर्चा करते हुए पैनलिस्टों ने बताया कि दोनों माध्यमों की अपनी अलग जरूरतें हैं। ओटीटी में दर्शक का ध्यान लगातार बनाए रखना बड़ी चुनौती होती है। इसलिए कट, साउंड, म्यूजिक और अन्य तकनीकी प्रभावों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत अलग तरीके से किया जाता है।
वहीं फीचर फिल्म में दर्शक लंबे समय तक एक निरंतर सिनेमाई अनुभव का हिस्सा बना रहता है। इसलिए उसमें कहानी, अभिनय, लाइटिंग, एडिटिंग, साउंड और म्यूजिक को एक समग्र अनुभव के रूप में विकसित किया जाता है। वक्ताओं के अनुसार, ओटीटी और फीचर फिल्मों के लिए स्क्रिप्टिंग से लेकर एडिटिंग और साउंड डिजाइन तक की पूरी रचनात्मक प्रक्रिया में अंतर होता है।
बदलते सिनेमा में समाज की बदलती तस्वीर
फिल्मों और ओटीटी में बढ़ती अश्लीलता, हिंसा और आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई। पैनलिस्टों ने कहा कि सिनेमा को समाज का आईना माना जाता है और समाज में होने वाले बदलावों का प्रभाव फिल्मों पर भी दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों के विस्तार के साथ अभिव्यक्ति का दायरा बढ़ा है और दर्शकों की पसंद भी बदली है। वहीं महिलाओं की बदलती सामाजिक भूमिका और फेमिनिज्म के प्रभाव ने भी फिल्मों की विषयवस्तु को प्रभावित किया है। इन बदलावों को केवल मनोरंजन के नजरिये से देखने के बजाय समाज की बदलती मानसिकता और संबंधों के प्रतिबिंब के रूप में भी समझने की जरूरत है।
क्षेत्रीय भाषाएं बन सकती हैं झारखंडी सिनेमा की ताकत
पैनल में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि झारखंड की क्षेत्रीय भाषाएं, लोककथाएं, आदिवासी जीवन, प्रकृति, इतिहास और समकालीन सामाजिक सरोकार यहां के सिनेमा को देश के अन्य हिस्सों से अलग पहचान दे सकते हैं। स्थानीय भाषाओं में फिल्म निर्माण से न केवल सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होगा, बल्कि स्थानीय लेखकों, कलाकारों, निर्देशकों, निर्माताओं, संपादकों और तकनीशियनों के लिए रोजगार और रचनात्मक अवसर भी बढ़ेंगे। पैनलिस्टों ने कहा कि झारखंड को यदि एक मजबूत फिल्म हब के रूप में विकसित करना है तो स्थानीय प्रतिभाओं को प्रशिक्षण, तकनीकी संसाधन, वित्तीय सहयोग और अपनी फिल्मों को प्रदर्शित करने के अवसर देने होंगे।
‘अपनी मिट्टी और कहानियों को सिनेमा की भाषा देने की जरूरत’
कार्यक्रम में हुई चर्चा का मूल संदेश स्पष्ट रहा कि झारखंड के सिनेमा को अपनी पहचान बाहर से आयात करने की जरूरत नहीं है। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी अपनी मिट्टी, भाषाएं, संस्कृति और कहानियां हैं। जरूरत इन कहानियों को कैमरे की नजर और सिनेमा की भाषा देने की है। विशेषज्ञों के अनुसार, यही प्रयास झारखंड को देश के प्रमुख फिल्म निर्माण केंद्रों में एक विशिष्ट पहचान दिला सकता है।
‘XENO’, ‘PRIYO AMI’ समेत कई फिल्मों की स्क्रीनिंग
कार्यक्रम के दौरान एनिमेशन फिल्म ‘XENO’ और ‘PRIYO AMI’ सहित कई लघु एवं एनिमेशन फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। ‘PRIYO AMI’ का निर्देशन सुचना साहा ने किया है। इसके अलावा ‘What Are You Searching’, ‘Look at the Sky’ और ‘Tou-Tai’ जैसी फिल्मों की भी स्क्रीनिंग हुई। इन फिल्मों के जरिए अलग-अलग विषयों और रचनात्मक दृष्टिकोणों को दर्शकों के सामने रखा गया।
क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों ने दिखाई झारखंड की सांस्कृतिक विविधता
झारखंड की क्षेत्रीय भाषाओं में बनी ‘Sohrai’ (हिंदी), ‘Miyad Arah Gaada’ (मुंडारी), ‘Gadi Lohardaga Mail’ (हिंदी) और ‘Aabua Paika Kabu Baegya’ (मुंडारी) जैसी फिल्मों को भी दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया। इन फिल्मों के माध्यम से झारखंड की स्थानीय संस्कृति, भाषाई विविधता, सामाजिक जीवन, परंपराओं और समकालीन सरोकारों को सिनेमाई अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया गया। खासकर क्षेत्रीय भाषाओं में बनी फिल्मों की स्क्रीनिंग ने यह रेखांकित किया कि झारखंड की भाषाएं और सांस्कृतिक विरासत सिनेमा के लिए महज विषय नहीं, बल्कि उसकी विशिष्ट पहचान का आधार बन सकती हैं।
कई गणमान्य लोग रहे मौजूद
कार्यक्रम में सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट के प्रभारी कुलपति शुक्रांतो मजूमदार, शिलादित्य सान्याल, नीलांजन बनर्जी, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की संयुक्त सचिव मोनिका टूटी, संयुक्त निदेशक आनंद, उप निदेशक सैयद राशिद अख्तर, फिल्म निर्देशक बीजू टोप्पो सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का मंच संचालन भारती ओझा ने किया। कार्यक्रम में मौजूद विद्यार्थियों, युवा फिल्मकारों और सिनेमा प्रेमियों ने पैनल डिस्कशन और फिल्म स्क्रीनिंग में उत्साहपूर्वक भाग लिया।