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Jharkhand: विश्व आदिवासी दिवस पर रांची में सिनेमा का जलवा, पर्दे पर दिखी आदिवासी संस्कृति और पहचान
Tue, 11 Aug 2026 12:19 PM IST
आशुतोष प्रताप सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: आशुतोष प्रताप सिंह
Updated Tue, 11 Aug 2026 12:19 PM IST
सार
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रांची में दो दिवसीय फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया, जिसमें आदिवासी फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग, मास्टरक्लास और परिचर्चा हुई। झारखंड फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान की स्थापना की दिशा में इसे महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
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अवार्ड लेते हुए कलाकार
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर राजधानी रांची में सिनेमा, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों का अनूठा संगम देखने को मिला। झारखंड फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के तहत दो दिवसीय फिल्म फेस्टिवल, मास्टरक्लास, आदिवासी फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग और परिचर्चा का आयोजन किया गया। दो दिनों तक चले इस आयोजन में फिल्में केवल पर्दे पर नहीं दिखीं, बल्कि उनके जरिए आदिवासी संस्कृति, पहचान, परंपरा, भाषा और समाज से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गंभीर संवाद भी हुआ।
सिनेमा के जरिए संस्कृति और पहचान पर संवाद
फिल्म फेस्टिवल ने फिल्म विद्यार्थियों, फिल्म निर्माताओं, कलाकारों, सिनेप्रेमियों और सिनेमा से जुड़े लोगों को एक साझा मंच उपलब्ध कराया। लंबे समय से झारखंड में सिनेमा के लिए एक मजबूत और रचनात्मक मंच की जरूरत महसूस की जाती रही है। ऐसे में यह आयोजन सिनेप्रेमियों के लिए खास अवसर बनकर सामने आया, जहां उन्हें फिल्में देखने के साथ-साथ उनके निर्माण, कथ्य और सामाजिक सरोकारों पर विचार-विमर्श करने का मौका मिला।
आदिवासी जीवन और संस्कृति पर केंद्रित फिल्मों की स्क्रीनिंग
दो दिनों तक चले फिल्म फेस्टिवल में आदिवासी जीवन, संस्कृति और समाज की विविधता को केंद्र में रखने वाली फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग की गई। स्क्रीनिंग के बाद फिल्मों के कथ्य और विषय को लेकर चर्चा और संवाद भी आयोजित किए गए, जिसने कार्यक्रम को और सार्थक बनाया। दर्शकों और फिल्मकारों के बीच हुए संवाद से यह बात सामने आई कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज की स्मृतियों, संघर्षों, सवालों और सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम भी है।
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आदिवासी समाज को समझने की कोशिश बना आयोजन का अहम हिस्सा
फिल्म फेस्टिवल का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष फिल्मों के माध्यम से आदिवासी समाज और उसकी विविधता को समझने की कोशिश रही। फिल्मों में दिखाई गई कहानियों और विषयों ने दर्शकों को आदिवासी जीवन, संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक चुनौतियों को करीब से समझने का अवसर दिया।
मास्टरक्लास में विद्यार्थियों ने सीखी फिल्म निर्माण की बारीकियां
मास्टरक्लास के दौरान विद्यार्थियों और सिनेप्रेमियों को फिल्म निर्माण की बारीकियों, कहानी कहने की कला और सिनेमा के सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों से परिचित कराया गया। प्रतिभागियों ने फिल्मकारों और विशेषज्ञों के साथ संवाद करते हुए सिनेमा से जुड़े विभिन्न पहलुओं को समझा। मास्टरक्लास में फिल्म निर्माण से लेकर कहानी को प्रभावी तरीके से पर्दे पर प्रस्तुत करने और सिनेमा के सामाजिक प्रभाव जैसे विषयों पर चर्चा हुई। इससे फिल्म विद्यार्थियों को अपने सवाल पूछने और विशेषज्ञों से सीधे सीखने का अवसर मिला।
दर्शकों की सक्रिय भागीदारी ने कार्यक्रम को बनाया जीवंत
दो दिवसीय आयोजन की खास बात यह रही कि इसने रांची के सिनेप्रेमियों को एक साझा मंच प्रदान किया। फिल्मों की स्क्रीनिंग के दौरान दर्शकों का उत्साह देखने को मिला। स्क्रीनिंग के बाद हुई परिचर्चाओं में दर्शकों की सक्रिय भागीदारी ने पूरे कार्यक्रम को जीवंत बनाए रखा। फिल्मों को लेकर दर्शकों और फिल्मकारों के बीच हुए संवाद ने आयोजन को केवल स्क्रीनिंग तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसे विचार और विमर्श का मंच बना दिया।
झारखंड में सिनेमा की नई संभावनाओं की उम्मीद
फिल्म देखने पहुंचे दर्शकों, विद्यार्थियों और सिनेमा से जुड़े लोगों ने इस तरह के आयोजनों को झारखंड में सिनेमा की नई संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनका मानना है कि ऐसे आयोजन स्थानीय प्रतिभाओं को मंच देने के साथ-साथ राज्य में फिल्म संस्कृति को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।
कार्यक्रम ने यह भी दिखाया कि झारखंड में फिल्मों और फिल्म निर्माण को लेकर उत्साह मौजूद है। साथ ही यहां ऐसा दर्शक वर्ग भी है, जो सार्थक और विषयपरक सिनेमा को देखने, समझने और उस पर चर्चा करने के लिए तैयार है। दो दिवसीय फिल्म फेस्टिवल ने विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रांची में सिनेमा को संस्कृति, पहचान और सामाजिक संवाद से जोड़ने का काम किया और झारखंड में एक मजबूत फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान की जरूरत तथा संभावनाओं को भी रेखांकित किया।
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सिनेमा के जरिए संस्कृति और पहचान पर संवाद
फिल्म फेस्टिवल ने फिल्म विद्यार्थियों, फिल्म निर्माताओं, कलाकारों, सिनेप्रेमियों और सिनेमा से जुड़े लोगों को एक साझा मंच उपलब्ध कराया। लंबे समय से झारखंड में सिनेमा के लिए एक मजबूत और रचनात्मक मंच की जरूरत महसूस की जाती रही है। ऐसे में यह आयोजन सिनेप्रेमियों के लिए खास अवसर बनकर सामने आया, जहां उन्हें फिल्में देखने के साथ-साथ उनके निर्माण, कथ्य और सामाजिक सरोकारों पर विचार-विमर्श करने का मौका मिला।
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आदिवासी जीवन और संस्कृति पर केंद्रित फिल्मों की स्क्रीनिंग
दो दिनों तक चले फिल्म फेस्टिवल में आदिवासी जीवन, संस्कृति और समाज की विविधता को केंद्र में रखने वाली फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग की गई। स्क्रीनिंग के बाद फिल्मों के कथ्य और विषय को लेकर चर्चा और संवाद भी आयोजित किए गए, जिसने कार्यक्रम को और सार्थक बनाया। दर्शकों और फिल्मकारों के बीच हुए संवाद से यह बात सामने आई कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज की स्मृतियों, संघर्षों, सवालों और सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम भी है।
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आदिवासी समाज को समझने की कोशिश बना आयोजन का अहम हिस्सा
फिल्म फेस्टिवल का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष फिल्मों के माध्यम से आदिवासी समाज और उसकी विविधता को समझने की कोशिश रही। फिल्मों में दिखाई गई कहानियों और विषयों ने दर्शकों को आदिवासी जीवन, संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक चुनौतियों को करीब से समझने का अवसर दिया।
मास्टरक्लास में विद्यार्थियों ने सीखी फिल्म निर्माण की बारीकियां
मास्टरक्लास के दौरान विद्यार्थियों और सिनेप्रेमियों को फिल्म निर्माण की बारीकियों, कहानी कहने की कला और सिनेमा के सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों से परिचित कराया गया। प्रतिभागियों ने फिल्मकारों और विशेषज्ञों के साथ संवाद करते हुए सिनेमा से जुड़े विभिन्न पहलुओं को समझा। मास्टरक्लास में फिल्म निर्माण से लेकर कहानी को प्रभावी तरीके से पर्दे पर प्रस्तुत करने और सिनेमा के सामाजिक प्रभाव जैसे विषयों पर चर्चा हुई। इससे फिल्म विद्यार्थियों को अपने सवाल पूछने और विशेषज्ञों से सीधे सीखने का अवसर मिला।
दर्शकों की सक्रिय भागीदारी ने कार्यक्रम को बनाया जीवंत
दो दिवसीय आयोजन की खास बात यह रही कि इसने रांची के सिनेप्रेमियों को एक साझा मंच प्रदान किया। फिल्मों की स्क्रीनिंग के दौरान दर्शकों का उत्साह देखने को मिला। स्क्रीनिंग के बाद हुई परिचर्चाओं में दर्शकों की सक्रिय भागीदारी ने पूरे कार्यक्रम को जीवंत बनाए रखा। फिल्मों को लेकर दर्शकों और फिल्मकारों के बीच हुए संवाद ने आयोजन को केवल स्क्रीनिंग तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसे विचार और विमर्श का मंच बना दिया।
झारखंड में सिनेमा की नई संभावनाओं की उम्मीद
फिल्म देखने पहुंचे दर्शकों, विद्यार्थियों और सिनेमा से जुड़े लोगों ने इस तरह के आयोजनों को झारखंड में सिनेमा की नई संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनका मानना है कि ऐसे आयोजन स्थानीय प्रतिभाओं को मंच देने के साथ-साथ राज्य में फिल्म संस्कृति को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।
कार्यक्रम ने यह भी दिखाया कि झारखंड में फिल्मों और फिल्म निर्माण को लेकर उत्साह मौजूद है। साथ ही यहां ऐसा दर्शक वर्ग भी है, जो सार्थक और विषयपरक सिनेमा को देखने, समझने और उस पर चर्चा करने के लिए तैयार है। दो दिवसीय फिल्म फेस्टिवल ने विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रांची में सिनेमा को संस्कृति, पहचान और सामाजिक संवाद से जोड़ने का काम किया और झारखंड में एक मजबूत फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान की जरूरत तथा संभावनाओं को भी रेखांकित किया।