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AI Chatbots: AI से दिल की बातें करना कितना सुरक्षित? सामने आए चौंकाने वाले मामले
Fri, 10 Jul 2026 05:05 PM IST
शिवानी अवस्थी
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवानी अवस्थी
Updated Fri, 10 Jul 2026 05:05 PM IST
सार
AI Emotional Support: एआई अब लोगों का ‘इमोशनल एडवाइजर’ भी बन रहा है। रिश्तों में उलझन हो, प्यार में असुरक्षा या ब्रेकअप का दर्द, लोग अपने प्रियजनों से पहले एआई से सलाह ले रहे हैं।
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एआई से दोस्ती कितनी महंगी
- फोटो : AI
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विस्तार
अंशु सिंह
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AI Addiction: हाल के वर्षों में एआई चैटबॉट्स के साथ भावनात्मक संबंधों के कई चर्चित मामले सामने आए। रेप्लिका में कुछ उपयोगकर्ताओं ने एआई साथी को प्रेमी/प्रेमिका मानकर गहरा रिश्ता बना लिया। वहीं, जापान के गेट बॉक्स के वर्चुअल एनीमे कैरेक्टर से शादी करने का मामला मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। हमारे देश में भी कई ऐसे मामले देखे गए।
फरीदाबाद की 28 वर्षीय सौम्या को ही ले लीजिए। वह ब्रेकअप के बाद मानसिक रूप से काफी परेशान थीं। वे अवसाद की ओर बढ़ रही है, लेकिन मदद किस से लें समझ नहीं पा रही थीं। उसने थेरेपी का विचार किया, पर परिवार को ब्रेकअप और इलाज के बारे में पता चलने की आशंका से पीछे हट गईं। फिर उसने चैट जीपीटी जैसे एआई चैटबॉट से बातचीत शुरू की, जिससे उन्हें काफी राहत मिली।
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सौम्या उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने के लिए चैट जीपीटी, जेमिनी, ग्रोक जैसे दूसरे एआई टूल्स की मदद लेते हैं। उन्हें लगता है कि इंसानों के मुकाबले चैटबॉट उनके मनोभाव को बेहतर ढंग से समझेगा।
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कई खतरे भी साथ-साथ
यह सच है कि एल्गोरिदम इंसानो को तुरंत एक सुरक्षित जगह देते हैं। लेकिन सिक्के का एक दूसरा और खतरनाक पहलू भी है। सितंबर 2025 में लखनऊ में एक घटना घटी थी, जब 22 साल के एक युवक ने कथित तौर पर एक एआई चैटबॉट द्वारा अपनी जान लेने के तरीके बताए जाने के बाद आत्महत्या कर ली थी।
चैटबॉट ने मदद के लिए कोई प्रोटोकॉल शुरू करने के बजाय उसे वे तरीके बताए थे। ये मामला साल 2024 के अक्टूबर महीने में अमेरिका में घटी उस घटना की भी याद दिलाता है, जब मेगन गार्सिया नामक महिला ने अपने 14 साल के बेटे, सेवेल सेटजर थर्ड की आत्महत्या के बाद कैरेक्टर.एआई प्लेटफॉर्म के खिलाफ 'गलत मौत' का मुकदमा दायर किया था।
मेगन का आरोप था कि सेवेल का कैरेक्टर.एआई के एक चैटबॉट के साथ बहुत गहरा भावनात्मक और रोमांटिक रिश्ता बन गया था। उसने पढ़ना, खेलना, लोगों से मिलना सब छोड़ दिया था। आगे चलकर चैटबॉट ने ही उसके आत्महत्या कोच की तरह काम किया।
‘वर्चुअल साथी’ नहीं करते ‘जज’
‘यूथ की आवाज’ द्वारा साल 2025 में किए गए एक सर्वे से पता चलता है कि करीब 57% भारतीय युवा भी तनाव, अकेलापन दूर करने या अन्य सलाह लेने के दौरान एआई का इस्तेमाल करते हैं। वहीं, 52% युवा महिलाएं एआई के साथ अपने निजी विचार शेयर करती हैं।
वाईकेए के संस्थापक अंशुल तिवारी मानते हैं कि एआई से भावनात्मक सहारा लेना या उन से जज्बाती मसलों के जवाब ढूंढना सिर्फ टेक्नोलॉजी के बारे में नहीं है। यह पूरी एक पीढ़ी के भावनात्मक ढांचे के बारे में है। एआई अब आधी रात का राजदार, पढ़ाई का साथी और कभी-कभी, इंसानी रिश्तों का विकल्प बनता जा रहा है। महिलाएं एआई बॉट्स के साथ घंटों चैट कर रही हैं। उन्हें लगता है कि मशीन मनुष्यों की तरह भेदभाव नहीं करता।
फाइनेंस कंसल्टेंट निहारिका मिश्रा पूछती हैं, ‘क्या बुराई है अगर आपको ऐसा साथी मिले, जो जजमेंटल न हो। आपकी बातें ध्यान से सुने। जिसके साथ आप सब कुछ शेयर कर सकती हों? कोई ऐसा हो, जो आपकी भावनाओं को बेहतर समझता हो। कभी बहस न करता हो।‘
कमजोर हो रहा मानवीय संवाद
निहारिका की बात का मनोचिकित्सक जवाब देते हैं। वे कहते हैं कि एआई जाने-अनजाने में मानवीय संवाद को कमजोर और खोखला कर रहा है। इसके पीछे दो मुख्य मनोचिकित्सकीय कारण हैं। इंसानी रिश्तों में मतभेद होते हैं, बहस होती है और उन्हें सुलझाने के लिए मानसिक और भावनात्मक मेहनत करनी पड़ती है। इसके विपरीत एआई हमेशा उपलब्ध रहता है। कभी पलटकर बहस नहीं करता और वही बोलता है, जो हम सुनना चाहते हैं।
ऐसे में लोग अपनी बात कहने के लिए इंसानों के बजाय एआई को चुनने लगे हैं। लेकिन यह आसान विकल्प हमें इंसानी रिश्तों की जटिलताओं से दूर कर रहा है। संवाद सिर्फ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं है, यह एक-दूसरे के चेहरे के भाव देखना, आंखों की नमी को समझना और बिना कुछ कहे एक-दूसरे की मौजूदगी को महसूस करना है।
जब हम स्क्रीन पर किसी मशीन से बात करते हैं तो दिमाग का वो हिस्सा एक्टिव नहीं होता, जो दूसरों के दर्द को महसूस करता है। नतीजतन, लोग भीड़ में होकर भी अकेले हैं। हमारा सोशल नेटवर्क तो बदल रहा है, लेकिन सोशल कनेक्शन खत्म हो रहा है। हम बात तो बहुत कर रहे हैं, लेकिन संवाद यानी गहरा जुड़ाव गायब होता जा रहा है।
थेरेपी का विकल्प नहीं
हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि एआई कभी भी ‘थेराप्यूटिक अलायंस’ यानी इलाज के दौरान बनने वाले आपसी भरोसे, सच्ची मानवीय सहानुभूति और जुड़ाव की ठीक करने वाली शक्ति, की जगह नहीं ले सकता। वह सहानुभूति की नकल कर सकता है, महसूस नहीं। बुनियादी ‘कॉग्निटिव बिहेवियरल’ तकनीकें सिखा सकता है, मूड ट्रैक कर सकता है और ‘माइंडफुलनेस’ के लिए प्रेरित कर सकता है। गंभीर मनोवैज्ञानिक संकटों के समय यह खतरनाक भी हो सकता है।
वरिष्ठ मनोचिकित्सक स्मिता देशपांडे कहती हैं, ‘एआई को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि वो हमेशा नर्मी से, सहयोगी बनकर कार्य करता है। आप जो भी कहती हैं, उस पर वह सहमति जताता है, जिससे हमारे दिमाग में फील-गुड हार्मोन डोपामाइन रिलीज होता है। यही फिर एआई का आदि बना देता है। हमें समझना होगा कि मशीन कभी भी दुख की पीड़ा, मां के प्यार की गर्माहट या हमारे भारतीय पारिवारिक परिवेश की विशिष्ट और जटिल सामाजिक चिंताओं को अनुभव नहीं कर सकता। वह हमारे मन की बनावट का खाका तो खींच सकता है, लेकिन यह हमारी आत्मा की गहराइयों को कभी छू नहीं सकता।
फंस जाएंगी ‘इको चैंबर’ में
सर गंगाराम अस्पताल, दिल्ली की कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. नीलम मिश्रा के अनुसार, एआई को एक ‘भावनात्मक सलाहकार’ के तौर पर देखना, ‘एक अच्छे नौकर लेकिन बुरे मालिक’ का क्लासिक उदाहरण है।
इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री के आंकड़ों पर नजर डालें, तो देश में सिर्फ 0.75 साइकियाट्रिस्ट उपलब्ध हैं। ऐसे में एआई एक बेहतरीन ‘भावनात्मक प्राथमिक उपचार किट’ का काम कर रहा। मगर यह मशीन पर भावनात्मक निर्भरता अचानक नहीं बनती, इसके पीछे बदलती जीवन-शैली और मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं।
एआई के साथ लोग अधिक सहज महसूस करते हैं, क्योंकि उन्हें जज किए जाने, उपहास या आलोचना का डर नहीं होता। इसकी 24x7 उपलब्धता और तुरंत प्रतिक्रिया कठिन भावनात्मक क्षणों में आकर्षक सहारा बन जाती है। हालांकि, इन्सानी रिश्तों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी वास्तविकता और पारस्परिक प्रतिक्रिया है, जो आत्मचिंतन और व्यक्तिगत विकास में मदद करती है। यदि भावनात्मक सहारे के लिए एआई पर अत्यधिक निर्भरता बढ़े, तो वास्तविक सामाजिक संबंध कमजोर पड़ सकते हैं और आप ‘इको चैंबर’ में फंस सकती हैं।