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Coronavirus Test: क्या कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट गलत भी आ सकती है? शोध में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

Tue, 08 Sep 2020 12:44 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Tue, 08 Sep 2020 12:44 PM IST
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Coronavirus new study Information about covid 19 test report
(प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

वैज्ञानिकों का कहना है कि मानव शरीर में कोरोना वायरस का टेस्ट करने का जो सबसे महत्वपूर्ण तरीका है वो इतना संवेदनशील है कि इसमें पहले हुए संक्रमण के मृत वायरस या उनके टुकड़े भी मिल सकते हैं। वो मानते हैं कि कोरोना वायरस से व्यक्ति करीब एक सप्ताह तक संक्रमित रहता है, लेकिन इसके बाद भी कई सप्ताह तक उसका कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आ सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका कारण ये भी हो सकता है कि कोरोना महामारी के पैमाने पर जिन आंकड़ों की बात हो रही है वो अनुमान से अधिक हों। हालांकि कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि कोरोना की जांच के लिए एक भरोसेमंद जांच का तरीका कैसे निकाला जाए जिसमें संक्रमण का हर मामला दर्ज हो सके, ये अब तक तय नहीं हो सका है। 

Coronavirus new study Information about covid 19 test report
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पीटीआई

इस शोध में शामिल एक शोधकर्ता प्रोफेसर कार्ल हेनेगन कहते हैं टेस्ट के नए तरीके में जोर वायरस के मिलने या न मिलने पर न होकर एक कट-ऑफ पॉइंट पर यानी एक निश्चित बिंदु पर होना चाहिए जो ये इशारा करे कि उस मात्रा में कम वायरस के होने से टेस्ट का नतीजा नेगेटिव आ सकता है। वो मानते हैं कोरोना वायरस के टेस्ट में पुराने वायरस के अंश या टुकड़े मिलना एक तरह ये समझाने में मदद करता है कि संक्रमण के मामले क्यों लगातार बढ़ रहे हैं जबकि अस्पतालों में पहुंच रहे लोगों की संख्या लगातार कम हो रही है।  

Coronavirus new study Information about covid 19 test report
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ एविडेन्स बेस्ड मेडिसिन ने इस संबंध में 25 स्टडी से मिले सबूतों की समीक्षा की, पॉजिटिव टेस्ट में मिले वायरस के नमूनों को पेट्री डिश में डालकर देखा गया कि क्या वायरस की संख्या वहां बढ़ रही है? इस तरीके को वैज्ञानिक 'वाइरल कल्चरिंग' कहते हैं जो ये बता सकता है कि जो टेस्ट किया गया है उसमें ऐसा एक्टिव वायरस मिला है जो अपनी संख्या बढ़ाने में सक्षम है या फिर मृत वायरस या उसके टुकड़े मिले हैं जिन्हें लेबोरेट्री में ग्रो नहीं किया जा सकता। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पीटीआई

बीबीसी स्वास्थ्य संवाददाता निक ट्रिगल का विश्लेषण

महामारी की शुरूआत के दौर से ही वैज्ञानिक वायरस टेस्ट से जुड़ी इस मुश्किल के बारे में जानते हैं और ये एक बार फिर दर्शाता है कि क्यों कोविड-19 के जो आंकड़े सामने आ रहे हैं वो सही आंकड़े नहीं हैं, लेकिन इससे फर्क क्या पड़ता है? महामारी की शुरुआत में आंकड़े कम उपलब्ध थे, लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरता गया अधिक आंकड़े मिलते गए। टेस्टिंग और नंबर को लेकर बड़ी मात्रा में आ रही जानकारी से कंफ्यूजन बढ़ा है। 

लेकिन ये बात सच है कि पूरे ब्रिटेन में देखें को कोरोना संक्रमण के मामले कई यूरोपीय देशों की तुलना में कम है। जहां तक बात स्थानीय स्तर पर संक्रमण के फैलने की है मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि उसे रोकने में हम कामयाब हुए हैं और ये तब है जब गर्मियां आने के साथ लॉकडाउन में थोड़ी बहुत ढील दी जानी शुरू हो गई है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगे क्या होगा, सर्दियों के दिन आने वाले हैं और स्कूलों में भी बच्चों की पढ़ाई शुरू हो रही है। 

ब्रिटेन में स्वास्थ्यकर्मी ये मान रहे हैं कि देश फिलहाल मजबूत स्थिति में है और ऐसा लग रहा है कि आने वाले महीनों में संक्रमण के अधिक मामलों से अब बचा जा सकता है। लेकिन इसे लेकर सरकार और लोग सभी सावधानी भी बरत रहे हैं, क्योंकि माना जा रहा है कि इसे गंभीरता से न लेने पर महामारी का एक और दौर शुरू हो सकता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पीटीआई

कोविड-19 का टेस्ट कैसे होता है?

बताया जाता है कोरोना वायरस टेस्टिंग का एक कारगर तरीका पीससीआर स्वैब टेस्ट है, जिसमें कैमिकल के इस्तेमाल से वायरस के जेनेटिक मटीरियल को पहचानने की कोशिश की जाती है और फिर इसका अध्ययन किया जाता है। पर्याप्त वायरस मिलने से पहले लेबोरेटरी में परीक्षण नमूने को कई चक्रों से होकर गुजरना पड़ता है। कितनी बार में वायरस बरामद किया गया ये बताता है कि शरीर में कितनी मात्रा में वायरस है, वायरस के अंश हैं या फिर पूरा का पूरा वायरस है। ये इस बात की ओर भी इशारा करता है कि जो वायरस शरीर में है वो कितना संक्रामक है। माना जाता है कि अगर टेस्ट करते वक्त वायरस पाने के लिए अधिक बार कोशिश हुई तो उस वायरस के लेबोरेटरी में बढ़ने की गुंजाइश कम होती है।  

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