Mental Health: एंग्जाइटी-डिप्रेशन से लड़ाई में गधे बने ‘हैप्पीनेस थेरेपिस्ट', मरीजों को मिल रहा दवा जैसा आराम
पेरिस में मेंटल हेल्थ की समस्याओं के शिकार लोगों की थेरेपी के लिए गधों का इस्तेमाल किया जा रहा है। 'एनिमल मेडिसिन' वाले इस नए फॉर्मूले से कई मरीजों को आराम भी मिल रहा है।एंग्जाइटी-डिप्रेशन से राहत पाने के इस अनोखे तरीके की दुनियाभर में खूब चर्चा है।
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डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और कैंसर जैसी बीमारियों की तो अक्सर चर्चा होती रहती है, पर क्या आप मेंटल हेल्थ की समस्याओं पर भी उतना भी ध्यान दे पाते हैं?
आंकड़े बताते हैं कि मानसिक रोगों के मामले बीते दशकों में चुपचाप ही सही, पर इतनी तेजी से बढ़े हैं कि अब दुनिया में हर सातवें व्यक्ति को किसी न किसी तरह की मानसिक बीमारी का शिकार पाया जा रहा है। द लैंसेट में प्रकाशित एक नई वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में करीब 120 करोड़ लोग किसी न किसी मानसिक विकार से प्रभावित हैं। हाल के दशकों में इस समस्या का खतरा और भी तेजी से बढ़ा है।
इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्युएशन (आईएचएमई) और यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया ये अध्ययन 1990 से 2023 के बीच 204 देशों के आंकड़ों पर आधारित है।
- इसके मुताबिक साल 1990 से 2023 के बीच (34 वर्षों में) मानसिक विकारों से प्रभावित लोगों की संख्या दोगुनी हो चुकी है।
- अध्ययन में 12 प्रमुख मानसिक विकारों का मूल्यांकन किया गया, जिनमें एंग्जाइटी और मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर प्रमुख हैं।
विशेषज्ञों की चिंता ये है कि अब भी बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग हैं जो मेंटल हेल्थ की समस्याओं का शिकार तो हैं पर उन्हें इस बारे में जानकारी ही नहीं है।
क्यों बढ़ रही है मानसिक रोगियों की संख्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया पर लाइक्स बटोरनी वाली सोच, प्रतिस्पर्धा, भविष्य की अनिश्चितता जैसी स्थितियां युवाओं के मानसिक तनाव का प्रमुख कारण हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस आयु में मानसिक समस्याओं की पहचान और उपचार नहीं हो पाता, तो इसका असर लंबे समय तक व्यक्ति के जीवन, शिक्षा और रोजगार पर पड़ सकता है।
- यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित क्षेत्रों में भी मानसिक विकारों का भारी बोझ है।
- 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों में मानसिक बीमारियों का बोझ सबसे अधिक है।
- यह वह उम्र होती है जब युवा शिक्षा, करियर और सामाजिक संबंधों की दिशा तय कर रहे होते हैं, लेकिन इसी दौर में अवसाद और चिंता संबंधी विकार तेजी से बढ़ रहे हैं।
मानसिक रोगियों के इलाज का रोचक तरीका
मेडिकल साइंस की प्रगति और कारगर दवाओं-थेरेपी ने मानसिक रोगों के इलाज को अब काफी आसान बना दिया है। इसी क्रम में पेरिस के एक मनोरोग अस्पताल में, मरीजों की थेरेपी के लिए गधों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
- अस्पताल परिसर में कृषि और हरे-भरे जंगल वाला शांत वातावरण बनाया गया है। यहां मरीज गधों को सैर पर ले जाते हैं और उनकी देखभाल में कुछ समय बिताते हैं।
- 60 साल की मरीज नथाली कहती हैं, ये थेरेपी बिल्कुल उसी तरह से है जैसा आप दवा लेकर खुद को रिलैक्स महसूस करते हैं।
- नथाली कहती हैं, मैं इसे 'एनिमल मेडिसिन' कहूंगी, इससे राहत मिलती है। आप बाकी सब चीजों के बारे में सोचना बंद कर देते हैं, बिल्कुल वैसा ही जैसा मेंटल हेल्थ की दवाओं को लेने के बाद एहसास होता है।
'एनिमल मेडिसिन'- गधे दूर कर रहे एंग्जाइटी-डिप्रेशन
रिपोर्ट के मुताबिक, मरीज अपने इलाज के हिस्से के तौर पर इन सेशन में मुफ्त में शामिल होते हैं। इसका खर्च फ्रांस का पब्लिक हेल्थ सिस्टम उठाता है।
- इस सेशन में शामिल होने वालों के लिए एक गधे को असाइन किया जाता है। समय के साथ, वे एक-दूसरे के स्वभाव से परिचित हो जाते हैं।
- एनिमल थेरेपी यूनिट की नर्स, ऑड्रे सेफर ने बताया कि कुछ ही सेशन के बाद नथाली और अन्य मरीजों की हालत में काफी सुधार हुआ।
- शुरुआत में, नथाली व्हील चेयर (शारीरिक रूप से कमजोर लोगों के लिए) से बाहर नहीं निकलती थी। लेकिन धीरे-धीरे, हिम्मत मिलने पर, वह बाहर निकलने लगीं।
- एक 52 वर्षीय मरीज जेरोम ने बताया कि यह प्रोग्राम अकेलापन कम करने में मदद करता है। यह आपको रोजमर्रा के इलाज और दवाइयों से बाहर निकलने में भी मदद करता है।
कैसे काम करती है ये थेरेपी?
मनोचिकित्सा में विशेषज्ञता रखने वाली नर्स एरमेलिंडा कहती हैं, एनिमल थेरेपी मानसिक रोग वालों के लिए बहुत फायदेमंद हो सकती है। उनके पति ने थेरेपी के काम के लिए गधों को प्रशिक्षित किया।
नर्स एरमेलिंडा कहती हैं, गधे शांत और सौम्य जानवर होते हैं, जो आम तौर पर इंसानों के काफी करीब होते हैं। एक बार जब वे इन मेल-जोल में शामिल हो जाते हैं, तो वे मरीजों के साथ बहुत अच्छा जुड़ाव बना लेते हैं।
- 2022 से, एनिमल थेरेपी प्रोग्राम को अस्पताल में एक हेल्थ केयर यूनिट के तौर पर आधिकारिक दर्जा मिल गया है।
- बाद में इस प्रोग्राम का विस्तार हुआ है और अब इसमें गिनी पिग, मुर्गियां, कबूतर, बकरियां, कछुए और खरगोश भी शामिल हैं।
- मरीजों की स्थिति और उनकी जरूरतों और पसंद के हिसाब से सेशन तैयार किए जाते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ये सेशन एंग्जाइटी, डिप्रेशन, ऑटिज्म, सिजोफ्रेनिया या दूसरी बीमारी वाले मरीजों की मदद करने के लिए खासतौर पर डिजाइन किए गए हैं। ये सेशन इमोशनल कंट्रोल, बातचीत, सामाजिक मेलजोल और आत्म-सम्मान को बेहतर बनाने में भी मदद करते हैं।
इस थेरेपी के विशेषज्ञ कहते हैं, ये उपाय किसी डॉक्टरी इलाज या दवाओं को रिप्लेस तो नहीं करता है लेकिन मरीजों को उनके खोए हुए आत्मविश्वास और अपनी अहमियत का एहसास वापस पाने में मदद कर सकता है। मानसिक रोग के शिकार लोगों की स्थिति में सुधार के तौर पर इतना भी, काफी ज्यादा माना जा सकता है।
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स्रोत:
'Animal medicine': Therapy donkeys help patients at French psychiatric hospital
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