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Sibling Economy: क्या आपके घर में भी चलती है सिब्लिंग इकोनॉमी? बच्चों की ये आदत बना सकती है उन्हें स्मार्ट
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवानी अवस्थी
Updated Mon, 16 Feb 2026 01:52 PM IST
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सार
Sibling Economy Kya Hai: बच्चे खुद अपने भविष्य को सवारें, बस आप उन्हें सही दिशा दिखाएं तो सब कितना सरल हो जाएगा न? सिब्लिंग इकोनॉमी एक ऐसा ही तरीका है, जिसे आप जाने-अंजाने नजरअंदाज करती हैं।
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- फोटो : Adobe
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विस्तार
Kids Ban Rahe Hain Money Smart: आपका बेटा बेटी से साइकिल लेने के लिए उसे बदले में अपना वीडियो गेम थमा देता है। रात में वही भाई होमवर्क समझाने के लिए बहन से चॉकलेट का कुछ हिस्सा मांगता है। वहीं एक-दूसरे की गलतियों को छिपाने के लिए वे एक-दूसरे से पॉकेट मनी का कुछ हिस्सा मांग लेते हैं। आपको यह गलत लग सकता है, लेकिन बाल मनोवैज्ञानिक इसे सिब्लिंग इकोनॉमी का हिस्सा मानते हैं।
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क्या है सिब्लिंग इकोनॉमी?
यह एक ऐसा कॉन्सेप्ट है, जो भले ही किताबों में बड़े शब्दों में न लिखा हो, लेकिन लगभग हर भारतीय घर में वर्षों से चलता आ रहा है। इसका मतलब है भाई-बहनों के बीच छोटे-छोटे घरेलू सौदे, आपसी समझौते और लेन-देन। खिलौने शेयर करना, किताबों का आदान-प्रदान, टीवी टाइम या पॉकेट मनी पर सहमति बनाना इसके उदाहरण हैं। ये छोटे लेन-देन बच्चों को यह सिखाते हैं कि हर चीज की अहमियत होती है और हर फैसले का परिणाम।
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अध्ययन क्या कहता है
बाल मनोविज्ञान से जुड़े कई अध्ययन बताते हैं कि जो बच्चे बचपन में नेगोशिएशन (मोलभाव) और शेयरिंग करते हैं, वे भविष्य में बेहतर ढंग से निर्णय ले पाते हैं। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार, इससे बच्चों में सामाजिक और वित्तीय क्षमताएं विकसित होती हैं। वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के अनुसार, भाई-बहनों के बीच का तालमेल उनमें सहानुभूति की भावना को मजबूत करता है, जो उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है।
मिलती हैं कई सीख
सिब्लिंग इकोनॉमी से बच्चे कम उम्र में ही पैसे और समय की अहमियत समझ पाते हैं। अध्ययन बताता है कि 10-12 साल की उम्र में वित्तीय फैसले लेने वाले बच्चे भविष्य में आर्थिक तनाव बेहतर ढंग से संभाल पाते हैं। यह आदत उनमें जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता भी बढ़ाती है। साथ ही भाई-बहनों के बीच के समझौते उनके बीच के संवाद को बढ़ाते हैं, जिससे झगड़े कम होते हैं और आपसी सहयोग बढ़ता है।
रियल लाइफ स्किल्स
आज के समय में जब बच्चे अधिकतर समय मोबाइल और स्क्रीन पर बिताते हैं, सिब्लिंग इकोनॉमी उन्हें रियल लाइफ स्किल्स सिखाने का आसान तरीका बन सकती है। छोटे घरेलू सौदे बच्चों में बातचीत, समझौता, धैर्य और सहयोग जैसी आदतें विकसित करते हैं, जो किसी किताब या एप से नहीं मिलतीं। यह सिर्फ घर का छोटा सिस्टम नहीं, बल्कि भविष्य की नींव है।
आपकी भूमिका अहम
इसमें माता-पिता की भूमिका बहुत अहम होती है। अगर माता-पिता हर छोटे झगड़े या सौदे में दखल देंगे तो बच्चों को सीखने का मौका कभी नहीं मिलेगा, लेकिन अगर आप बच्चों को सीमाओं के भीतर खुद फैसले लेने देंगी और जरूरत पड़ने पर मदद करेंगी तो सिब्लिंग इकोनॉमी सकारात्मक रूप ले लेगी।
जीवन कौशल का विकास
बाल मनोवैज्ञानिक गार्गी मालगुड़ी बताती हैं, सिब्लिंग इकोनॉमी की शुरुआत भले ही चीजों की अदला-बदली या पसंदीदा वस्तु पाने से हो, लेकिन धीरे-धीरे यह बच्चों में बजट मैनेजमेंट की समझ विकसित करती है। भाई-बहन के बीच बातचीत, समझौते और सहयोग से आपसी रिश्ते मजबूत होते हैं।
बच्चे एक-दूसरे की भावनाओं को समझना सीखते हैं, जिससे उनकी इमोशनल इंटेलिजेंस बढ़ती है। वे सही और गलत भावनाओं में फर्क करना सीखते हैं और संतुलित सोच के साथ निर्णय लेते हैं। इससे आगे चलकर उनमें धैर्य, सहनशीलता, समस्या-समाधान और अप्रत्याशित खर्चों को मैनेज करने जैसे महत्वपूर्ण जीवन कौशल विकसित होते हैं, जो उन्हें भविष्य में बेहतर तालमेल बनाने में मदद करते हैं।