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ALert: क्या आप भी ऑफिस में 7-8 घंटे बैठे रहते हैं? तो जरूर पढ़ें ये रिपोर्ट, वरना बढ़ सकती है आपकी मुसीबत

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Sun, 15 Feb 2026 08:20 PM IST
सार

शारीरिक निष्क्रियता दुनियाभर में होने वाली समय से पहले मौतों के प्रमुख कारणों में से एक है। जब शरीर लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहता है, तो खून का संचार प्रभावित हो जाता है, जिससे ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की सप्लाई प्रभावित होती है। आइए जानते हैं इसके और क्या-क्या नुकसान हैं?

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लंबे समय तक बैठकर काम करने के नुकसान - फोटो : Freepik.com

लाइफस्टाइल की गड़बड़ी को दुनियाभर में तेजी से बढ़ती गंभीर क्रॉनिक बीमारियों का प्रमुख कारण माना जाता है। हम जो कुछ खाते-पीते हैं, जिस तरह से दिनभर की दिनचर्या रहती है इन सबका सेहत पर सीधा असर होता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, सेंडेंटरी लाइफस्टाइल यानी लंबे समय तक बैठे रहना, शारीरिक गतिविधियां कम होना सेहत के लिए बड़ी समस्याओं का कारण है। 



ऑफिस में लगातार बैठकर काम करना हमारी दिनचर्या का आम हिस्सा बन चुका है। कई अध्ययन इस बात को लेकर अलर्ट करते रहे हैं कि दिनभर में 7-8 घंटे तक बैठे रहना डायबिटीज, हृदय रोग और ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं के खतरे को बढ़ाने वाला हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कंप्यूटर-लैपटॉप और मोबाइल स्क्रीन के सामने घंटों बैठकर काम करने से न केवल मांसपेशियों और रीढ़ की हड्डी पर दबाव पड़ता है, बल्कि यह मेटाबॉलिज्म को भी धीमा कर देता है। जो लोग रोजाना 7–8 घंटे या उससे ज्यादा समय तक लगातार बैठे रहते हैं, क्रॉनिक बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, काम के दौरान थोड़ी-थोड़ी देर पर उठकर घूमना जरूरी है।

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ज्यादा बैठने के नुकसान - फोटो : freepik.com

शारीरिक निष्क्रियता और इसके खतरे

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, शारीरिक निष्क्रियता दुनिया भर में होने वाली समय से पहले मौतों के प्रमुख कारणों में से एक है। जब शरीर लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहता है, तो खून का संचार प्रभावित हो जाता है, जिससे ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की सप्लाई प्रभावित होती है। यही वजह है कि ऑफिस में काम करते समय छोटे-छोटे ब्रेक लेना सिर्फ आराम के लिए नहीं, बल्कि सेहत की सुरक्षा के लिए भी बेहद जरूरी है।

लगातार बैठे रहने से कैलोरी बर्न कम हो जाती है, जिससे शरीर में फैट जमा होने लगता है। लंबे समय तक बैठने वालों में टाइप-2 डायबिटीज और हार्ट डिजीज का जोखिम ज्यादा होता है, भले ही आप रोद व्यायाम क्यों न करते हों।

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कंधे-कमर में दर्द का खतरा - फोटो : Adobe Stock

लंबे समय तक बैठे रहने के और क्या नुकसान हैं?

लंबे समय तक बैठे रहना आपकी सेहत को कई तरह से प्रभावित करने वाली हो सकती है।
 

  • गलत पोस्चर में घंटों बैठना रीढ़ की हड्डी पर दबाव डालता है। इससे पीठ दर्द, सर्वाइकल पेन और कंधों में जकड़न की समस्या आम हो जाती है।
  • लगातार बैठे रहने से शरीर का मेटाबॉलिक रेट कम होता है। इससे वजन बढ़ने और पेट के आसपास चर्बी जमा होने लगती है।
  • शारीरिक गतिविधि की कमी का असर दिमाग पर भी पड़ता है। लंबे समय तक एक जगह बैठे रहने से तनाव, चिड़चिड़ापन और एंग्जायटी बढ़ सकती है।
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स्ट्रेस और मेंटल हेल्थ की समस्या - फोटो : Adobe stock photos

मानसिक स्वास्थ्य पर हो सकता है असर

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, लगातार काम करते रहने से न सिर्फ शारीरिक, बल्कि मानसिक समस्याएं भी हो सकती हैं इसलिए बीच में ब्रेक जरूरी है।

कई लोग काम के दबाव के कारण ब्रेक लेना भूल जाते हैं और लगातार देर तक काम करते रहते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं। कि लगातार काम करने की आदत मस्तिष्क के लिए अच्छी नहीं है, इससे शारीरिक के साथ-साथ मानसिक समस्याएं भी हो सकती है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की साल 2000 से 2016 की ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट के अनुसार, जो लोग हफ्ते में 55 घंटे से ज्यादा काम करते हैं, उन्हें मानसिक तनाव हो सकता है, हृदय रोग का खतरा बढ़ सकता है, स्टेस हार्मोन बढ़ने के कारण उनमें अनिद्रा की समस्या भी हो सकती है। जब दिमाग थक जाता है, तो चिड़चिड़ापन महसूस होता है, काम में मन नहीं लगता और तनाव महसूस होता है। यह समस्या समय के साथ एग्जाइटी डिसऑर्डर में बदल सकती है। 

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काम से छोटा ब्रेक लें - फोटो : Freepik.com

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. प्रदीप कुमार शैलत कहते हैं, 90 मिनट काम करें, फिर 20 मिनट का ब्रेक जरूर लें। ब्रेक में बाहर टहलें, गहरी सांस लें या फिर हल्का संगीत सुने इससे स्ट्रेस हार्मोन नहीं बढ़ते हैं और मोटिवेशन बना रहता है। लगातार काम करने से आप न खुद पर ध्यान दे पाते हैं, न सामाजिक संबंध बना पाते हैं और न ही आराम कर पाते हैं। इससे मन में नकारात्मक विचार आने लगते हैं और व्यक्ति तनाव या अवसाद का शिकार होने लगता है। ब्रेक की कमी से स्लीप पैटर्न भी खराब होने लगता है और मूड डिसआर्डर हो सकते हैं।





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नोट: यह लेख डॉक्टर्स का सलाह और मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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