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MP News: टाइगर स्टेट में बाघों की मौत का आंकड़ा सबसे ज्यादा, 111 में 40 MP में; रिजर्व से बाहर भी बड़ा खतरा

Wed, 29 Jul 2026 06:41 AM IST
Anand Pawar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: Anand Pawar Updated Wed, 29 Jul 2026 06:41 AM IST
सार

देश में बाघों की मौत के आंकड़ों में मध्यप्रदेश सबसे ऊपर है। एनटीसीए के आकड़ों के अनुसार 19 जुलाई तक देश में 111 बाघों की मौत दर्ज हुई, इनमें 40 मामले अकेले मध्यप्रदेश के हैं। 

 

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MP News: 'Tiger State' records highest number of tiger deaths 40 out of 111; significant threat exists outside
सांकेतिक - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्य प्रदेश को देश में सबसे ज्यादा बाघों वाला राज्य होने का गौरव हासिल है, लेकिन बाघों की मौत का आंकड़ा भी अब चिंता बढ़ाने वाला है। एनटीसीए के आंकड़ों के मुताबिक इस वर्ष 19 जुलाई 2026 तक देश में 111 बाघों की मौत दर्ज हुई है। इनमें सबसे ज्यादा 40 मौतें मध्य प्रदेश में हुई हैं। यानी देश में हुई बाघों की मौतों में से करीब 36 फीसदी सिर्फ मध्य प्रदेश में हुई हैं। महाराष्ट्र 25 मौतों के साथ दूसरे और तमिलनाडु नौ मौतों के साथ तीसरे स्थान पर है।

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महाराष्ट्र से 15 और तमिलनाडु से चार गुना ज्यादा मौतें
राज्यवार आंकड़े देखें तो मध्य प्रदेश में 40 मौतों के मुकाबले महाराष्ट्र में 25, तमिलनाडु में 9, कर्नाटक में 7 और असम में 5 बाघों की मौत दर्ज हुई है। इस तरह मध्य प्रदेश में बाघों की मौतें महाराष्ट्र से 15 अधिक और तमिलनाडु की तुलना में चार गुना से भी ज्यादा हैं। यह आंकड़ा इसलिए भी अहम है क्योंकि मध्य प्रदेश में बाघों की बड़ी आबादी टाइगर रिजर्व के भीतर ही नहीं, बल्कि उनके आसपास के जंगलों और दूसरे वन क्षेत्रों में भी फैल रही है।
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40 में 16 मौतें टाइगर रिजर्व के बाहर
आंकड़ों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मध्य प्रदेश में हुई 40 मौतों में 24 बाघ टाइगर रिजर्व के अंदर और 16 की मौत रिजर्व के बाहर दर्ज हुई है। यानी प्रदेश में करीब 40 फीसदी मौतें टाइगर रिजर्व की सीमा से बाहर हुईं। रिजर्व के बाहर दर्ज मामलों में नर्मदापुरम, सीहोर, शहडोल, छिंदवाड़ा, बुरहानपुर, उमरिया, बालाघाट, सिवनी, नरसिंहपुर और सतना जैसे क्षेत्र शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर जनवरी में नर्मदापुरम और सीहोर, फरवरी में शहडोल, मार्च में छिंदवाड़ा, अप्रैल में बालाघाट-सिवनी-उमरिया और जून-जुलाई में नरसिंहपुर, सतना तथा अन्य क्षेत्रों में मौतें दर्ज हुईं। वहीं रिजर्व के भीतर बांधवगढ़, कान्हा, पेंच, पन्ना, सतपुड़ा, संजय-डुबरी, रातापानी और वीरांगना दुर्गावती जैसे टाइगर रिजर्व में मौतें दर्ज हुई हैं।

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बाघ बढ़े तो आपसी संघर्ष भी बढ़ा
वन विभाग के उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक 2025 में बाघों की मौत के 53 मामले दर्ज हुए, जबकि 2026 में मई तक 29 मौतों की रिपोर्ट सामने दी है।  2025 के रिकॉर्ड में बाघों की मौत का एक बड़ा कारण आपसी संघर्ष रहा। बांधवगढ़, कान्हा, पेच, सतपुड़ा और संजय जैसे क्षेत्रों में बाघों के बीच संघर्ष के मामले सामने आए। आपसी संघर्ष के 17, करंट से 7, प्राकृतिक रूप से 6, अज्ञात 5, ट्रेन हादसा 2, बीमारी/ संक्रमण तीन के आसपास और हादसे से अन्य की मौत हुई है। वहीं, 2026 के शुरुआत चार माह में 29 बाघों की मौत दर्ज की गई है। वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार 22 मौतें प्राकृतिक एवं अन्य कारणों से और 7 मौतें शिकार के कारण दर्ज है।   शिकार के सात मामलों में छह बाघों की मौत करंट से हुई, जबकि एक मामला सीधा शिकार से जुड़ा है। प्राकृतिक और अन्य कारणों से सात बाघों की मौत आपसी संघर्ष से हुई है। 

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बढ़ती संख्या के साथ बढ़ी चुनौती
मौतों का यह पैटर्न संरक्षण व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या बाघों की बढ़ती आबादी के लिए सिर्फ टाइगर रिजर्व सुरक्षित रखना पर्याप्त है? युवा और वयस्क बाघ नए इलाके की तलाश में रिजर्व से बाहर निकलते हैं। ऐसे में उनके लिए सुरक्षित कॉरिडोर, आसपास के वन क्षेत्र और मानव बस्तियों के बीच संघर्ष को कम करना बेहद जरूरी हो जाता है। टाइगर डे पर मध्य प्रदेश के सामने अब चुनौती सिर्फ बाघों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखने की है। 785 बाघों वाला यह राज्य अगर टाइगर स्टेट का दर्जा कायम रखना चाहता है तो रिजर्व के बाहर बाघों की सुरक्षा भी संरक्षण नीति का उतना ही बड़ा हिस्सा बनानी होगी।


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करंट और इंसानी दखल भी बड़ी चुनौती
वन विभाग के रिकॉर्ड में बिजली के करंट से बाघों की मौत के कई मामले दर्ज हैं। जंगल से बाहर निकलने वाले बाघों के लिए बिजली के तार, फेंसिंग, सड़क, रेलवे और मानव बस्तियां नए खतरे बन रहे हैं। एनटीसीए भी बाघों के संरक्षण में कॉरिडोर, मानव-वन्यजीव संघर्ष और जंगलों के विखंडन को महत्वपूर्ण चुनौती मानता है।

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रिजर्व के बाहर भी सुरक्षा जरूरी
अब बाघों का संरक्षण सिर्फ टाइगर रिजर्व की सीमा तक सीमित नहीं रह सकता। एनटीसीए के 2012-2025 के आंकड़ों के मुताबिक देश में दर्ज बाघ मृत्यु घटनाओं में 47.5% मौतें टाइगर रिजर्व के बाहर हुईं। यही बात मध्यप्रदेश के लिए भी अहम है। बाघों की बढ़ती संख्या के साथ युवा बाघ नए क्षेत्र की तलाश में जंगल से बाहर निकलते हैं। ऐसे में कॉरिडोर और बफर क्षेत्र की सुरक्षा संरक्षण की अगली बड़ी चुनौती बन जाती है।

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ई-सर्विलांस और एआई आधारित कैमरों से बाघों के मूवमेंट पर रख रहे नजर 
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य जीव) डॉ. समीता राजौरा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय टाइगर डे से पहले वन विभाग ने मध्य प्रदेश में बाघ संरक्षण और मानव-बाघ संघर्ष रोकने के लिए तकनीक और जनभागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रहा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा लंबे समय से अपनाई जा रही प्रभावी प्रबंधन व्यवस्था और स्थानीय लोगों के सहयोग से मिला है।

अब बाघों की बढ़ती संख्या के साथ उनके लिए बेहतर हैबिटेट विकसित करने और ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी काम किया जा रहा है। राजौरा ने बताया कि फसलों की सुरक्षा के लिए लगाए गए बिजली के तार और फंदे कई बार बाघ-तेंदुओं की मौत का कारण बनते हैं। इसके विकल्प के तौर पर सोलर झटका मशीनों को बढ़ावा देने पर विचार हो रहा है। वहीं, भोपाल समेत संवेदनशील क्षेत्रों में ई-सर्विलांस और एआई आधारित कैमरों से बाघों की मूवमेंट पर नजर रखी जा रही है, ताकि समय रहते ग्रामीणों को अलर्ट किया जा सके।

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लापरवाही को समय पर ठीक नहीं करने से स्थिति गंभीर 
वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने दावा किया कि मध्य प्रदेश में इस वर्ष अब तक 45 बाघों की मौत हो चुकी है। इनमें 11 मामले शिकार से जुड़े हैं, जबकि सात बाघों के शिकार की पुष्टि हुई है और चार मामलों में उनके अंग बरामद किए गए हैं। पिछले वर्ष प्रदेश में 55 बाघों की मौत हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि लंबे समय से अधिकारियों की कथित लापरवाही के कारण बाघों के शिकार के मामले बढ़े हैं। साथ ही, बाघ संरक्षण को लेकर बरती जा रही कथित असंवेदनशीलता भी चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि बाघों की लगातार हो रही मौतें प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

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देश में बाघों की मौतें (19 जुलाई 2026 तक)

राज्य बाघों की मौतें
मध्य प्रदेश 40
महाराष्ट्र 25
तमिलनाडु 9
कर्नाटक 7
असम 5
अन्य राज्य 25
कुल 111
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