Indore: इंदौर की हरियाली हाशिए पर, 14 के बजाए 9 प्रतिशत बची, आसपास के जंगल भी हुए कम
इंदौर को कभी शब-ए-मालवा की ताजगी और हरियाली के लिए जाना जाता था, अब विकास के चलते हरे-भरेपन को खोता जा रहा है। मास्टर प्लान में तय 14 प्रतिशत हरियाली अब केवल 9 प्रतिशत के आसपास रह गई है। शहर फैला, लेकिन हरियाली सिकुड़ रही है।
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इंदौर की हरियाली विकास की कीमत चुका रही है। शहर जितना फैल रहा है, हरियाली उतनी ही सिमट रही है। मास्टर प्लान में हरियाली 14% है, लेकिन हकीकत में 9% भी नहीं बची है। इसका असर भी देखने को मिल रहा है। गर्मी के दिनों में रात का तापमान भी बढ़ा हुआ रहता है और इस बार मई माह में कई दिन का तापमान 40 डिग्री तक रहा। अब शहर में “शब-ए-मालवा” की तासीर खत्म हो गई है। शामें सुहानी नहीं रही।
इंदौर में सरकारी विभागों ने हरियाली के नाम पर हमेशा समझौता किया। इंदौर विकास प्राधिकरण, वन विभाग और नगर निगम हर साल हरियाली के लिए करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, लेकिन उसका असर जमीन पर नजर नहीं आता। 50 साल पहले आए शहर के पहले मास्टर प्लान में दो क्षेत्रीय उद्यान और 14 नगर उद्यान प्रस्तावित थे, लेकिन आठ नगर उद्यान भी पूरे नहीं बन पाए। मेघदूत उपवन जरूर बना, लेकिन पिपलियापाला उद्यान भी अधूरा ही रहा। बिलावानी, पिपलियापाला, सिरपुर जैसे ग्रीन बेल्ट में बस्तियां और मकान बन गए और अब उन्हें उजाड़ा नहीं जा सकता। समय रहते अफसरों ने ग्रीन बेल्ट में अतिक्रमण रोका होता तो आज शहर के कई हिस्से हरे-भरे रहते।
ट्रांसप्लांट भी हुए फेल
सरकारी विभागों ने बीआरटीएस, फीडर मार्गों और ब्रिजों में बाधक पेड़ों के ट्रांसप्लांट पर लाखों रुपये खर्च किए, लेकिन उन पेड़ों पर बाद में ध्यान नहीं दिया गया। इस कारण ट्रांसप्लांट असफल रहा। डेढ़ साल पहले इंदौर के रेवती रेंज क्षेत्र में 12 लाख पेड़ लगाने का विश्व रिकॉर्ड बना, लेकिन उन्हें बड़ा होने में समय लगेगा।
लगातार हो रही पेड़ों की कटाई
शहर में बीआरटीएस के नाम पर दस साल पहले 3,000 से ज्यादा पेड़ काटे गए। फिर ब्रिज, मेट्रो और सड़क चौड़ीकरण के नाम पर पेड़ कटे। इंदौर और आसपास के हिस्सों में दस साल में 1,00,000 से ज्यादा पेड़ काटे गए हैं। इंदौर-खंडवा रोड के छह लेन निर्माण के लिए 9,000 से ज्यादा पेड़ काटे जा चुके हैं। इसके अलावा, इंदौर-बुधनी रेल लाइन के लिए भी पेड़ों और तालाबों पर असर पड़ा। आने वाले वर्षों में इंदौर-ओंकारेश्वर और इंदौर-मनमाड़ लाइन के लिए लाखों पेड़ काटे जाएंगे।
ग्रीन बेल्ट का सीमांकन होना था
जब शहर का पहला मास्टर प्लान बना, तब शहर के ग्रीन बेल्ट का सीमांकन होना चाहिए था और वहां बसाहट को सख्ती से रोका जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मास्टर प्लान में ग्रीन कवरेज एरिया 14% रखा गया था, लेकिन अब केवल 9% बचा है। शहर की हरियाली बढ़ाना बेहद जरूरी है।
— जयवंत होलकर, मास्टर प्लान विशेषज्ञ

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