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साहित्य उत्सवः पहले दिन युद्ध, स्त्री विमर्श और एआई के दौर में लेखन पर हुआ मंथन
Thu, 29 Oct 2026 05:40 PM IST
अर्जुन रिछारिया
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: अर्जुन रिछारिया
Updated Thu, 29 Oct 2026 05:40 PM IST
सार
इंदौर में आज तीन दिवसीय साहित्य उत्सव का भव्य शुभारंभ हुआ। इसमें एआई के प्रभाव, स्त्री अभिव्यक्ति, पौराणिक कथाओं के पुनर्व्याख्यान और गद्य-पद्य की जुगलबंदी पर देश के शीर्ष साहित्यकारों ने संवाद किया।
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साहित्य उत्सव
- फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
विस्तार
इंदौर में तीन दिवसीय साहित्य उत्सव की आज से शुरुआत हुई। देशभर से कई भाषाओं के लेखक संपादक इस मंच को साझा कर रहे हैं। उद्घाटन अवसर पर साहित्य, कला और संस्कृति जगत की कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं। माधव कौशिक, महापौर पुष्यमित्र भार्गव, पद्मश्री शीन काफ निजाम, वाणी त्रिपाठी टिक्कू, उदय प्रकाश, ज्योति जैन, निखिल दवे, विश्वास व्यास और अरुण माहेश्वरी सहित अन्य अतिथियों ने उत्सव में सहभागिता की। शिव शेखर शुक्ल का वीडियो संदेश भी प्रसारित किया गया। उद्घाटन सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रकाश ने ‘युद्ध के विरुद्ध’ विषय पर बीज वक्तव्य दिया। सत्र का संचालन अदिति माहेश्वरी ने किया।
चर्चा के केंद्र में रहे समाज के ज्वलंत मुद्दे
उत्सव के पहले दिन साहित्य की बदलती भूमिका, समकालीन लेखन, स्त्री की अभिव्यक्ति और पौराणिक कथाओं की नए संदर्भों में व्याख्या जैसे विषय चर्चा के केंद्र में रहे। दोपहर में आयोजित ‘एआई युग में लेखक और संपादक की भूमिका’ सत्र ज्ञानरंजन की स्मृति को समर्पित रहा। इसमें माधव कौशिक, उर्मिला शिरीष और सत्य व्यास ने हिस्सा लिया, जबकि संवाद रोहिणी कुमारी ने किया। चर्चा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव के बीच लेखक और संपादक की जिम्मेदारी, रचनात्मकता की मौलिकता तथा साहित्य के भविष्य से जुड़े सवालों पर विचार किया गया। इसके बाद ‘स्त्रियां घर लौटती हैं’ विषय पर आयोजित सत्र चंद्रकान्त देवताले की स्मृति को समर्पित रहा। इसमें विवेक चतुर्वेदी, उदय प्रकाश, हेमंत देवलेकर और मालिनी गौतम ने सहभागिता की। सत्र का संचालन संतोष द्विवेदी ने किया। वक्ताओं ने साहित्य में स्त्री की उपस्थिति, घर के बदलते अर्थ और समकालीन रचनाओं में स्त्री अनुभवों की अभिव्यक्ति पर चर्चा की।
संवाद से मिले सार्थक सुझाव
पहले दिन के अगले सत्र में ‘लेखन की यात्रा, सत्य व्यास की जुबानी’ के माध्यम से लेखक सत्य व्यास ने अपनी रचनात्मक यात्रा, लेखन के अनुभवों और साहित्यिक दृष्टि से जुड़े विभिन्न पहलुओं को साझा किया। संवाद का संचालन अदिति माहेश्वरी ने किया। इसके बाद ‘पौराणिक कथाओं का पुनः पाठ’ विषय पर अक्षत गुप्ता और सौम्या कुलश्रेष्ठ के बीच संवाद हुआ। इसमें पौराणिक आख्यानों की समकालीन प्रासंगिकता, उनके भीतर निहित जीवन-दृष्टि और आधुनिक समाज के संदर्भ में उनकी पुनर्व्याख्या पर विचार रखे गए। धर्मवीर भारती की स्मृति को समर्पित ‘मतलब हिन्दू, असम्भव सारांश: गद्य और पद्य की जुगलबंदी’ सत्र में अम्बर पाण्डेय और आशुतोष दुबे ने सहभागिता की। उत्पल बनर्जी के संचालन में हुए इस संवाद में गद्य और पद्य के आपसी संबंधों तथा साहित्यिक अभिव्यक्ति के विविध रूपों पर चर्चा हुई। साहित्य उत्सव 2026 के पहले दिन का समापन कालजयी लेखिका अमृता प्रीतम को समर्पित ‘मैं तैनूं फिर मिलांगी’ सत्र से हुआ। इसमें सौम्या कुलश्रेष्ठ और हरीश बुधवानी ने संगीत के माध्यम से अमृता प्रीतम की साहित्यिक संवेदना और उनकी रचनाओं को प्रस्तुत किया। इस अवसर पर अमिया कुंवर की कृति ‘इमरोजनामा’ के अंग्रेजी अनुवाद के आवरण का अनावरण माधव कौशिक और अक्षत गुप्ता ने किया। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद सौम्या कुलश्रेष्ठ ने किया है।
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बदलते समय की चुनौतियों पर भी हुआ मंथन
उत्सव के पहले दिन विभिन्न सत्रों के माध्यम से साहित्य के पारंपरिक स्वरूप और बदलते समय की चुनौतियों के बीच संवाद की जरूरत को रेखांकित किया गया। इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा, “इंदौर में वाणी साहित्य उत्सव जैसे आयोजन का होना बेहद स्वागतयोग्य है। ऐसे आयोजन शहर के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इंदौर की पहचान केवल स्वच्छता और खानपान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपनी साहित्यिक समृद्धि और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। इस तरह के उत्सव शहर की साहित्यिक पहचान को और मजबूत करने के साथ ही नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने का काम करते हैं।” लेखक माधव कौशिक ने बताया कि, “बदलते समय में तकनीक साहित्य और लेखन की दुनिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक को केवल चुनौती के रूप में देखने के बजाय लेखकों को इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से समझना और अपनाना चाहिए। समय के साथ बदलाव को स्वीकार करते हुए अपनी रचनात्मकता और मौलिकता को बनाए रखना जरूरी है। तकनीक का सकारात्मक उपयोग साहित्य को नए पाठकों तक पहुंचाने और लेखन की संभावनाओं को विस्तार देने में मदद कर सकता है।”
चर्चा के केंद्र में जेन जी भी आए
रंगकर्मी एवं लेखिका वाणी त्रिपाठी टिक्कू, “साहित्य बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर उम्र के व्यक्ति के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। साहित्य पर चर्चा करना और उसे जीवन का हिस्सा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। मुझे खुशी है कि वाणी प्रकाशन ऐसा आयोजन लेकर आया है, जो जेन-जी से लेकर मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्गों तक सभी पीढ़ियों को महत्व देता है। इस तरह के आयोजन अलग-अलग पीढ़ियों को एक मंच पर लाकर साहित्य से जोड़ने और उनके बीच संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण अवसर देते हैं।”
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चर्चा के केंद्र में रहे समाज के ज्वलंत मुद्दे
उत्सव के पहले दिन साहित्य की बदलती भूमिका, समकालीन लेखन, स्त्री की अभिव्यक्ति और पौराणिक कथाओं की नए संदर्भों में व्याख्या जैसे विषय चर्चा के केंद्र में रहे। दोपहर में आयोजित ‘एआई युग में लेखक और संपादक की भूमिका’ सत्र ज्ञानरंजन की स्मृति को समर्पित रहा। इसमें माधव कौशिक, उर्मिला शिरीष और सत्य व्यास ने हिस्सा लिया, जबकि संवाद रोहिणी कुमारी ने किया। चर्चा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव के बीच लेखक और संपादक की जिम्मेदारी, रचनात्मकता की मौलिकता तथा साहित्य के भविष्य से जुड़े सवालों पर विचार किया गया। इसके बाद ‘स्त्रियां घर लौटती हैं’ विषय पर आयोजित सत्र चंद्रकान्त देवताले की स्मृति को समर्पित रहा। इसमें विवेक चतुर्वेदी, उदय प्रकाश, हेमंत देवलेकर और मालिनी गौतम ने सहभागिता की। सत्र का संचालन संतोष द्विवेदी ने किया। वक्ताओं ने साहित्य में स्त्री की उपस्थिति, घर के बदलते अर्थ और समकालीन रचनाओं में स्त्री अनुभवों की अभिव्यक्ति पर चर्चा की।
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संवाद से मिले सार्थक सुझाव
पहले दिन के अगले सत्र में ‘लेखन की यात्रा, सत्य व्यास की जुबानी’ के माध्यम से लेखक सत्य व्यास ने अपनी रचनात्मक यात्रा, लेखन के अनुभवों और साहित्यिक दृष्टि से जुड़े विभिन्न पहलुओं को साझा किया। संवाद का संचालन अदिति माहेश्वरी ने किया। इसके बाद ‘पौराणिक कथाओं का पुनः पाठ’ विषय पर अक्षत गुप्ता और सौम्या कुलश्रेष्ठ के बीच संवाद हुआ। इसमें पौराणिक आख्यानों की समकालीन प्रासंगिकता, उनके भीतर निहित जीवन-दृष्टि और आधुनिक समाज के संदर्भ में उनकी पुनर्व्याख्या पर विचार रखे गए। धर्मवीर भारती की स्मृति को समर्पित ‘मतलब हिन्दू, असम्भव सारांश: गद्य और पद्य की जुगलबंदी’ सत्र में अम्बर पाण्डेय और आशुतोष दुबे ने सहभागिता की। उत्पल बनर्जी के संचालन में हुए इस संवाद में गद्य और पद्य के आपसी संबंधों तथा साहित्यिक अभिव्यक्ति के विविध रूपों पर चर्चा हुई। साहित्य उत्सव 2026 के पहले दिन का समापन कालजयी लेखिका अमृता प्रीतम को समर्पित ‘मैं तैनूं फिर मिलांगी’ सत्र से हुआ। इसमें सौम्या कुलश्रेष्ठ और हरीश बुधवानी ने संगीत के माध्यम से अमृता प्रीतम की साहित्यिक संवेदना और उनकी रचनाओं को प्रस्तुत किया। इस अवसर पर अमिया कुंवर की कृति ‘इमरोजनामा’ के अंग्रेजी अनुवाद के आवरण का अनावरण माधव कौशिक और अक्षत गुप्ता ने किया। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद सौम्या कुलश्रेष्ठ ने किया है।
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बदलते समय की चुनौतियों पर भी हुआ मंथन
उत्सव के पहले दिन विभिन्न सत्रों के माध्यम से साहित्य के पारंपरिक स्वरूप और बदलते समय की चुनौतियों के बीच संवाद की जरूरत को रेखांकित किया गया। इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा, “इंदौर में वाणी साहित्य उत्सव जैसे आयोजन का होना बेहद स्वागतयोग्य है। ऐसे आयोजन शहर के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इंदौर की पहचान केवल स्वच्छता और खानपान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपनी साहित्यिक समृद्धि और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। इस तरह के उत्सव शहर की साहित्यिक पहचान को और मजबूत करने के साथ ही नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने का काम करते हैं।” लेखक माधव कौशिक ने बताया कि, “बदलते समय में तकनीक साहित्य और लेखन की दुनिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक को केवल चुनौती के रूप में देखने के बजाय लेखकों को इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से समझना और अपनाना चाहिए। समय के साथ बदलाव को स्वीकार करते हुए अपनी रचनात्मकता और मौलिकता को बनाए रखना जरूरी है। तकनीक का सकारात्मक उपयोग साहित्य को नए पाठकों तक पहुंचाने और लेखन की संभावनाओं को विस्तार देने में मदद कर सकता है।”
चर्चा के केंद्र में जेन जी भी आए
रंगकर्मी एवं लेखिका वाणी त्रिपाठी टिक्कू, “साहित्य बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर उम्र के व्यक्ति के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। साहित्य पर चर्चा करना और उसे जीवन का हिस्सा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। मुझे खुशी है कि वाणी प्रकाशन ऐसा आयोजन लेकर आया है, जो जेन-जी से लेकर मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्गों तक सभी पीढ़ियों को महत्व देता है। इस तरह के आयोजन अलग-अलग पीढ़ियों को एक मंच पर लाकर साहित्य से जोड़ने और उनके बीच संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण अवसर देते हैं।”
