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Indore News: मंडियों में गेहूं खरीदी के बीच कैंटीन पर ताले, महंगी गैस से किसानों की 5 रु. वाली थाली बंद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: Arjun Richhariya
Updated Sat, 11 Apr 2026 07:04 AM IST
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सार
Indore News: इंदौर की लक्ष्मीबाई नगर और छावनी अनाज मंडी में किसानों को पांच रुपए में भोजन देने वाली योजना पिछले दो वर्षों से बंद पड़ी है। महंगाई और कैंटीन के भारी किराए के कारण कोई भी ठेकेदार टेंडर लेने को तैयार नहीं है।
छावनी अनाज मंडी की कैंटीन बंद है।
- फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
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विस्तार
इंदौर की लक्ष्मीबाई नगर और छावनी अनाज मंडी में गेहूं खरीदी शुरू हो चुकी है। बड़ी संख्या में आसपास के गांवों से किसान मंडियों में आ रहे हैं। यहां आने वाले किसानों तथा हम्मालों को मात्र पांच रुपए में भरपेट पौष्टिक भोजन उपलब्ध करवाने वाली महत्वपूर्ण योजना पिछले दो वर्षों से बंद पड़ी है। मंडी प्रशासन इन दोनों प्रमुख स्थानों पर कैंटीन संचालित करने के लिए लंबे समय से नए कॉन्ट्रैक्टर की तलाश कर रहा है, परंतु अब तक कोई भी स्थायी संचालक नहीं मिल सका है।
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प्रशासन द्वारा कई बार टेंडर की प्रक्रिया दोहराई गई, लेकिन या तो किसी भी ठेकेदार ने इसमें रुचि नहीं दिखाई या फिर आर्थिक एवं संचालन से जुड़ी समस्याओं के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। इस स्थिति के कारण मंडी में आने वाले हजारों किसानों को मिलने वाली सस्ती भोजन की सुविधा पूरी तरह प्रभावित हो रही है। वर्तमान में लक्ष्मीबाई नगर मंडी में जनसहयोग के माध्यम से कुछ भोजन उपलब्ध करवाया जा रहा है, जिसमें मंडी के व्यापारियों द्वारा आटा, तेल और मसाले दान किए जाते हैं जिससे पूड़ी-सब्जी तैयार होती है, जबकि छावनी मंडी में तो ऐसी कोई वैकल्पिक सुविधा भी मौजूद नहीं है।
कमर्शियल गैस टंकी से लेकर सब्जी तक महंगी हुई
सरकारी नियमों के अनुसार किसानों के लिए शुरू की गई इस योजना के अंतर्गत कृषि उपज मंडियों में अपनी फसल बेचने आने वाले किसानों, उनके सहायकों और वहां कार्यरत हम्मालों को सिर्फ पांच रुपए में भोजन दिया जाता है। योजना के तहत भोजन का मेन्यू भी निर्धारित है, जिसमें पांच रुपए के बदले छह पुड़ी व सब्जी अथवा छह रोटी, सब्जी और दाल देने का नियम है। लक्ष्मीबाई नगर और छावनी मंडी में इस व्यवस्था के तहत कैंटीन के साथ-साथ विश्राम गृह और शुद्ध पेयजल की सुविधा भी शामिल थी। इस योजना में एक थाली की कुल लागत 20 रुपए तय की गई थी, जिसमें 15 रुपए का भुगतान मंडी प्रशासन द्वारा और शेष पांच रुपए किसान द्वारा दिए जाते थे। हालांकि, कैंटीन संचालकों का तर्क है कि बढ़ती महंगाई के इस दौर में इतनी कम राशि में गुणवत्तापूर्ण भोजन देना संभव नहीं है। गैस, सब्जी और अनाज के दाम बढ़ने के कारण 20 रुपए में थाली उपलब्ध कराना अब व्यावहारिक नहीं रहा, यही वजह है कि कॉन्ट्रैक्टर इस काम के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।
प्रति थाली बजट बढ़ाने का प्रस्ताव भोपाल स्तर से निरस्त हुआ
मंडी प्रशासन ने स्वीकार किया है कि 20 रुपए प्रति थाली की राशि कम होने से भोजन की गुणवत्ता बनाए रखना मुश्किल होता है। इसी समस्या को देखते हुए प्रशासन ने प्रति थाली की राशि को बढ़ाकर 35 रुपए करने का एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर भोपाल मुख्यालय भेजा था। प्रशासन का मानना था कि भुगतान की राशि बढ़ने से कैंटीन संचालक काम करने के लिए प्रेरित होंगे, लेकिन राज्य सरकार ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया जिससे समाधान की उम्मीदों को झटका लगा है।
प्रबंधन द्वारा पांच बार निविदाएं जारी की गई
मंडी प्रशासन ने दोनों मंडियों में कैंटीन संचालन हेतु वर्ष 2024 में 30 सितंबर, 16 अक्टूबर और 14 दिसंबर को टेंडर जारी किए थे, लेकिन किसी ने भी रुचि नहीं दिखाई। इसके बाद वर्ष 2025 में भी 4 और 22 अक्टूबर को पुनः टेंडर बुलाए गए, पर स्थिति जस की तस बनी रही। हाल ही में एक संचालक ने कार्य करने की इच्छा जताई है, लेकिन उसने कमर्शियल गैस की बढ़ती कीमतों और अन्य आर्थिक समस्याओं का हवाला देते हुए कुछ शर्तें रखी हैं। जब तक इन तकनीकी और आर्थिक समस्याओं का निराकरण नहीं होता, तब तक कैंटीन का सुचारू संचालन शुरू होना कठिन नजर आ रहा है।
भारी किराया और कम आमदनी बनी संचालक न मिलने की मुख्य वजह
कैंटीन संचालकों के पीछे हटने का एक बड़ा कारण मंडियों का भारी किराया भी है। लक्ष्मीबाई नगर मंडी में कैंटीन चलाने वाले को लगभग 28 हजार रुपए मासिक किराया देना पड़ता है, जबकि वहां प्रतिदिन औसतन 250-300 किसान ही भोजन करते हैं, जिससे खर्च निकालना मुश्किल होता है। छावनी मंडी में तो स्थिति और भी खराब है क्योंकि वहां का मासिक किराया 62 हजार रुपए है। कम भुगतान और संचालन के भारी खर्च के कारण कोई भी नया संचालक जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।
मंडी में प्रतिदिन आते हैं सैकड़ों किसानों
लक्ष्मीबाई नगर मंडी में प्रतिदिन 300 से अधिक किसान अपनी उपज लेकर पहुंचते हैं। इनमें से अधिकांश किसान दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों से आते हैं और उन्हें पूरा दिन मंडी की कार्यवाही में रुकना पड़ता है। ऐसी में सस्ती और सुलभ भोजन सुविधा उनके लिए अत्यंत आवश्यक है। मंडी सचिव ओमप्रकाश खेड़े ने स्पष्ट किया कि पिछले दो वर्षों से कोई स्थायी संचालक नहीं मिला है। वर्तमान में गंजबासौदा की एक एजेंसी ने टेंडर में रुचि दिखाई है, लेकिन गैस की बढ़ती कीमतों की वजह से उनकी कुछ आपत्तियां हैं जिस पर अभी चर्चा की जा रही है।
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कमर्शियल गैस टंकी से लेकर सब्जी तक महंगी हुई
सरकारी नियमों के अनुसार किसानों के लिए शुरू की गई इस योजना के अंतर्गत कृषि उपज मंडियों में अपनी फसल बेचने आने वाले किसानों, उनके सहायकों और वहां कार्यरत हम्मालों को सिर्फ पांच रुपए में भोजन दिया जाता है। योजना के तहत भोजन का मेन्यू भी निर्धारित है, जिसमें पांच रुपए के बदले छह पुड़ी व सब्जी अथवा छह रोटी, सब्जी और दाल देने का नियम है। लक्ष्मीबाई नगर और छावनी मंडी में इस व्यवस्था के तहत कैंटीन के साथ-साथ विश्राम गृह और शुद्ध पेयजल की सुविधा भी शामिल थी। इस योजना में एक थाली की कुल लागत 20 रुपए तय की गई थी, जिसमें 15 रुपए का भुगतान मंडी प्रशासन द्वारा और शेष पांच रुपए किसान द्वारा दिए जाते थे। हालांकि, कैंटीन संचालकों का तर्क है कि बढ़ती महंगाई के इस दौर में इतनी कम राशि में गुणवत्तापूर्ण भोजन देना संभव नहीं है। गैस, सब्जी और अनाज के दाम बढ़ने के कारण 20 रुपए में थाली उपलब्ध कराना अब व्यावहारिक नहीं रहा, यही वजह है कि कॉन्ट्रैक्टर इस काम के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।
प्रति थाली बजट बढ़ाने का प्रस्ताव भोपाल स्तर से निरस्त हुआ
मंडी प्रशासन ने स्वीकार किया है कि 20 रुपए प्रति थाली की राशि कम होने से भोजन की गुणवत्ता बनाए रखना मुश्किल होता है। इसी समस्या को देखते हुए प्रशासन ने प्रति थाली की राशि को बढ़ाकर 35 रुपए करने का एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर भोपाल मुख्यालय भेजा था। प्रशासन का मानना था कि भुगतान की राशि बढ़ने से कैंटीन संचालक काम करने के लिए प्रेरित होंगे, लेकिन राज्य सरकार ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया जिससे समाधान की उम्मीदों को झटका लगा है।
प्रबंधन द्वारा पांच बार निविदाएं जारी की गई
मंडी प्रशासन ने दोनों मंडियों में कैंटीन संचालन हेतु वर्ष 2024 में 30 सितंबर, 16 अक्टूबर और 14 दिसंबर को टेंडर जारी किए थे, लेकिन किसी ने भी रुचि नहीं दिखाई। इसके बाद वर्ष 2025 में भी 4 और 22 अक्टूबर को पुनः टेंडर बुलाए गए, पर स्थिति जस की तस बनी रही। हाल ही में एक संचालक ने कार्य करने की इच्छा जताई है, लेकिन उसने कमर्शियल गैस की बढ़ती कीमतों और अन्य आर्थिक समस्याओं का हवाला देते हुए कुछ शर्तें रखी हैं। जब तक इन तकनीकी और आर्थिक समस्याओं का निराकरण नहीं होता, तब तक कैंटीन का सुचारू संचालन शुरू होना कठिन नजर आ रहा है।
भारी किराया और कम आमदनी बनी संचालक न मिलने की मुख्य वजह
कैंटीन संचालकों के पीछे हटने का एक बड़ा कारण मंडियों का भारी किराया भी है। लक्ष्मीबाई नगर मंडी में कैंटीन चलाने वाले को लगभग 28 हजार रुपए मासिक किराया देना पड़ता है, जबकि वहां प्रतिदिन औसतन 250-300 किसान ही भोजन करते हैं, जिससे खर्च निकालना मुश्किल होता है। छावनी मंडी में तो स्थिति और भी खराब है क्योंकि वहां का मासिक किराया 62 हजार रुपए है। कम भुगतान और संचालन के भारी खर्च के कारण कोई भी नया संचालक जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।
मंडी में प्रतिदिन आते हैं सैकड़ों किसानों
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