Indore:खुशबू जो रह गई यादों में, इंदौर के प्रशांत के पोहे की दुकान 77 साल बाद बंद
प्रशांत के पोहे ने इंदौर को सबसे पहले पोहे के स्वाद से परिचित कराया था। अब राजवाड़ा की वह मशहूर दुकान बंद हो गई है। उस दुकान के बगैर कई ग्राहकों को अपनी सुबह अधूरी लग रही है। पोहे के बजाए वहां अब कपड़ों की दुकान खुल गई है।
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इंदौर में स्वाद की कई गलियां हैं, जहां सुबह की शुरुआत भाप से उठते पोहे की खुशबू से होती थी। कटे हुए कोथमीर और पोहे पर बिखरी बारीक सेव इंदौरियों के कदम रोकने को मजबूर कर देती थी। उन्हीं खुशबुओं में बसती थी एक पहचान..प्रशांत के पोहे। अब राजवाड़ा की तरफ कदम बढ़ते हैं, तो कुछ अधूरा-सा लगता है।
दुकान के जिस काउंटर पर विनोद जोशी मराठी लहजे में अपने कर्मचारियों को ऑर्डर देते थे, वहीं अब सन्नाटा पसरा है। दुकान के शटर से कटी हुई धनिया की महक और नींबू की हल्की-सी खुशबू आया करती थी, लेकिन अब वहां कपड़े टंगे नजर आते हैं। प्रशांत के पोहे की यह दुकान बंद हो गई है और उसकी जगह अब रेडीमेड कपड़ों की दुकान खुल गई है।
दुकान क्यों बंद की गई, इसे लेकर जोशी परिवार के लोगों से बात की गई, लेकिन उनका कहना है कि यह परिवार का निजी फैसला है। दुकान का मालिकाना हक अभी भी जोशी परिवार के पास ही है और उन्होंने इसे एक अन्य व्यक्ति को किराए पर दे दिया है।
कुछ दिन पहले जब पोहे की दुकान बंद हुई, तो ग्राहकों को लगा कि एलपीजी संकट के कारण पोहे नहीं मिल रहे हैं, लेकिन जब वहां दूसरी दुकान का बोर्ड लगा दिखा, तो ग्राहक मायूस हो गए। हालांकि प्रशांत के पोहे की एक दुकान मेडिकल कॉलेज के सामने अभी भी है, लेकिन राजवाड़ा वाली दुकान से लोगों का भावनात्मक रिश्ता था। कई ग्राहक तो रोज यहां नाश्ता करने आते थे।
77 साल पहले खुली थी पोहे की पहली दुकान
इंदौर में वर्ष 1949 में प्रशांत के पोहे की दुकान अन्ना जोशी ने शुरू की थी। वे महाराष्ट्र से पढ़ाई के लिए अपनी बुआ के यहां आए थे। पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्होंने बुआ से एक हजार रुपये लेकर यह दुकान शुरू की। उस समय इंदौर में मिलों का दौर था और सुबह हजारों श्रमिक काम पर जाते थे। अन्ना जोशी ने सोचा कि श्रमिकों को सुबह जल्दी नाश्ता मिलना चाहिए, इसलिए उन्होंने यह दुकान खोली थी।

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