Indore News: एमपी की शिक्षा व्यवस्था पर हाई कोर्ट का केंद्र-राज्य को अल्टीमेटम
प्रदेश में लगभग चालीस फीसदी शिक्षकों के पद खाली हैं और हजारों स्कूल जर्जर भवनों, बिना बिजली, शौचालय व शुद्ध पेयजल के संचालित हो रहे हैं।
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अधिकारों का हनन और शिक्षा संकट
यह जनहित याचिका सेंधवा के सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता बीएल जैन द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट अभिषेक तुगनावत ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था इस समय बेहद गंभीर संकट से गुजर रही है। सरकारी उदासीनता के चलते लाखों विद्यार्थियों को भारतीय संविधान और शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत मिलने वाली मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं, जो सीधे तौर पर उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।
शिक्षकों की कमी का चौंकाने वाला आंकड़ा
सुनवाई के दौरान कोर्ट को प्रदेश में शिक्षकों की कमी के चौंकाने वाले आंकड़ों से अवगत कराया गया। याचिका के अनुसार, मध्य प्रदेश में स्वीकृत दो लाख नवासी हजार शिक्षकों के पदों में से वर्तमान में 1 लाख 15 हजार पद रिक्त पड़े हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि लगभग चालीस प्रतिशत पद खाली हैं। इससे भी बदतर स्थिति यह है कि प्रदेश के 1895 स्कूल ऐसे हैं, जहां बच्चों को पढ़ाने के लिए एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है और ये स्कूल पूरी तरह शिक्षक विहीन हैं।
कैग रिपोर्ट में बुनियादी सुविधाओं की पोल खुली
याचिका में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की वर्ष दो हजार पच्चीस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए सरकारी दावों की पोल खोली गई है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के कुल 83,514 स्कूलों में से लगभग पांच हजार स्कूलों के भवन पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं और वहां पढ़ना बच्चों के लिए असुरक्षित है। इसके अलावा तीन हजार चार सौ स्कूलों में शौचालय की सुविधा नहीं है, जबकि लगभग दस हजार स्कूल बिजली जैसी बुनियादी जरूरत से वंचित हैं।
झोपड़ियों में भविष्य तलाशते नौनिहाल
इतना ही नहीं, सुरक्षा के लिहाज से चालीस हजार स्कूलों में बाउंड्रीवाल तक नहीं है और हजारों विद्यालयों में बच्चों के लिए शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं है। स्थिति इतनी दयनीय है कि कई स्कूल आज के आधुनिक दौर में भी झोपड़ियों में संचालित हो रहे हैं। कोर्ट ने इन सभी तथ्यों को गंभीरता से लेते हुए दोनों सरकारों को निर्धारित समय सीमा के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
