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Indore News: टमाटर, गिलकी व लौकी जैसी सब्जियों के दाम छू रहे आसमान, मानसून में देरी से बिगड़ गया रसोई का बजट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: Arjun Richhariya
Updated Fri, 19 Jun 2026 06:56 AM IST
सार
मध्यप्रदेश में मानसून के आगमन में देरी और भीषण गर्मी के चलते हरी सब्जियों के उत्पादन और आवक में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे इंदौर सहित पूरे प्रदेश में टमाटर, गिलकी और लौकी जैसी सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं।
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भीषण गर्मी से कम हुआ सब्जियों का उत्पादन।
- फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
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विस्तार
भीषण गर्मी और मानसून की कछुआ चाल ने मध्यप्रदेश में आम जनजीवन को बुरी तरह से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इस मौसमी संकट की सबसे सीधी गाज रसोई के बजट पर गिरी है, जिससे हरी सब्जियों की आवक में भारी कमी आई है और उनके दाम आसमान छूने लगे हैं। मंडियों में गिलकी, लौकी, टमाटर, पालक और बैंगन जैसी रोजमर्रा की सब्जियों की आवक बहुत कम हो गई है, जिसके चलते बाजार में कीमतों का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर भाग रहा है।
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टमाटर हुआ लाल, गिलकी-लोकी-पालक भी महंगी
चोइथराम मंडी के सब्जी व्यापारी राजेश जोशी कहते हैं कि सब्जियों की महंगाई का सबसे गहरा असर टमाटर पर देखने को मिल रहा है, जिसकी कीमतें अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं। रिटेल बाजारों में टमाटर की कीमतें 60 रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर को छू चुकी हैं, जिससे मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों की थाली से टमाटर पूरी तरह गायब होने की कगार पर पहुंच गया है। टमाटर के साथ-साथ बाजार में गिलकी 60 रुपए, लौकी 40 से 50 रुपए, पालक 40 से 50 रुपए और बैंगन भी 60 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहे हैं। कृषि और बाजार के जानकारों का स्पष्ट कहना है कि मौसम के मिजाज में चल रही इस अनिश्चितता के कारण आने वाले कुछ दिनों तक सब्जियों के दामों में यह उतार-चढ़ाव इसी तरह बना रहेगा।
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पड़ोसी राज्यों से होने वाली सप्लाई ठप
आपूर्ति श्रृंखला में आई इस बड़ी बाधा का मुख्य कारण पड़ोसी राज्यों से होने वाली सप्लाई का अचानक ठप पड़ना और खेतों में खड़ी फसलों का बड़े पैमाने पर नष्ट होना माना जा रहा है। आमतौर पर ग्रीष्मकाल के इस विशेष सीजन में मध्यप्रदेश के मालवा निमाड़ सहित अन्य प्रमुख हिस्सों में राजस्थान से भारी मात्रा में सब्जियां आती हैं, लेकिन इस साल भीषण तपिश के कारण कई इलाकों में सब्जियों की फसलें अपने निर्धारित समय से एक सप्ताह पहले ही पूरी तरह सूखकर समाप्त हो गई हैं। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि राजस्थान से प्रदेश की बड़ी मंडियों में आने वाले मालवाहक वाहनों के पहिए पूरी तरह थम गए हैं।
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मानसून की लेटलतीफी से फसल खराब
राजस्थान की तरफ से सप्लाई पूरी तरह बंद होने के बाद मध्यप्रदेश की थोक मंडियां अब पूरी तरह से महाराष्ट्र की फसलों के भरोसे टिक गई हैं। मौजूदा समय में प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर सहित कई अन्य बड़े शहरों में महाराष्ट्र के कन्नड़, चालीसगांव, संभाजी नगर और कलवन जैसे क्षेत्रों से सब्जियां मंगवाई जा रही हैं, मगर वहां के जमीनी हालात भी बेहद चिंताजनक बने हुए हैं। महाराष्ट्र में पड़ रही रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने सब्जियों के पौधों को झुलसा कर रख दिया है, जिसके कारण वहां भी कुल उत्पादन अपने न्यूनतम स्तर पर आ चुका है। मौसम की इस भीषण मार की वजह से विशेष रूप से टमाटर उगाने वाले किसानों को इस साल भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
इंदौर मंडी में बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी भारी पड़ रहा
देश और मध्य भारत की सबसे बड़ी फल और सब्जी मंडियों में शुमार इंदौर मंडी के कुप्रबंधन ने इस संकट काल में व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं की तकलीफों को दोगुना कर दिया है। मंडी के आढ़तियों और स्थानीय थोक व्यापारियों का गंभीर आरोप है कि यहां से हर दिन करोड़ों रुपए का टर्नओवर होने के बावजूद मंडी प्रशासन द्वारा सब्जियों को सुरक्षित रखने के लिए कोई भी बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं किया गया है। पूरे मंडी प्रांगण में न तो हरी सब्जियों को चिलचिलाती धूप से बचाने के लिए शेड की व्यवस्था है और न ही सब्जियों के कैरेट्स को सलीके से रखने की कोई तय जगह है। खुले आसमान के नीचे तीखी धूप में रखी रहने के कारण कीमती सब्जियां बहुत तेजी से सड़कर कचरा हो रही हैं। व्यापारियों का दावा है कि अगर मंडी प्रबंधन इस गंभीर विषय पर तत्परता दिखाते हुए शेड का निर्माण करवाए और रखरखाव की सही व्यवस्था दे, तो बड़े पैमाने पर होने वाली सब्जियों की बर्बादी को रोका जा सकता है, जिससे आम जनता को भी महंगाई से थोड़ी राहत मिल सकेगी। हालांकि, जमीनी हकीकत यही है कि जब तक सूबे में मानसूनी बारिश पूरी तरह से सक्रिय नहीं हो जाती, तब तक आसमान छूती कीमतों से निजात मिलने की उम्मीद न के बराबर है।
मांग के मुकाबले आवक आधी से भी बेहद कम
सब्जियों की आवक का यह अभूतपूर्व संकट इंदौर की चोइथराम मंडी में पूरी तरह साफ देखा जा सकता है। सामान्य दिनों में जहां इंदौर की इस प्रमुख मंडी में रोजाना सौ से दो सौ गाड़ियां सब्जियों की खपत होती थी, वहीं इन दिनों महज बीस से पच्चीस गाड़ियां ही मंडी के अंदर पहुंच पा रही हैं। इस सीमित आवक और बाजार में लगातार बनी हुई भारी मांग के समीकरण ने कीमतों में यह भयंकर उछाल पैदा किया है। इसके विपरीत, इस समय देश में हरी सब्जियों की सबसे बेहतरीन और प्रीमियम क्वालिटी दक्षिण भारत के कोलार, अनंतपुरम और बेंगलुरु जैसे इलाकों में उत्पादित हो रही है, लेकिन वहां की सब्जियां अधिक दाम मिलने के कारण दिल्ली, मुंबई, पुणे, पंजाब और चंडीगढ़ जैसे बड़े महानगरों की तरफ डायवर्ट की जा रही हैं। पिछले चार-पांच साल से हर सीजन में सब्जियों के दामों में अचानक आने वाली इस बेतहाशा तेजी से जहां एक तरफ आम उपभोक्ता त्रस्त हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के अन्नदाता भी इस मौजूदा बाजार व्यवस्था को लेकर गहरे संशय में हैं। किसानों का दर्द है कि फसल खराब होने का पूरा जोखिम और नुकसान तो सिर्फ उन्हें झेलना पड़ता है, लेकिन जब बाजार में कीमतें अचानक आसमान छूती हैं, तो उस मुनाफे का असली फायदा बिचौलिए और आढ़तिए डकार जाते हैं, जबकि खून-पसीना बहाने वाले मूल उत्पादक किसान को उसकी लागत राशि भी बमुश्किल मिल पाती है।
