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Jabalpur News: पॉक्सो मामले में फर्जी उम्र सर्वे रिपोर्ट पर हाईकोर्ट सख्त, जांच के दिए आदेश
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Fri, 16 Jan 2026 08:07 AM IST
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सार
पॉक्सो मामले में आरोपी को बचाने के लिए पेश की गई उम्र संबंधी सर्वे रिपोर्ट को हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया फर्जी माना है। युगलपीठ ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पर झूठे दस्तावेज प्रस्तुत करने की आशंका जताते हुए 30 दिन में जांच और दोष सिद्ध होने पर कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए।
जबलपुर हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पॉक्सो एक्ट में आरोपी को बचाने के लिए बनाई गई उम्र संबंधित सर्वे रिपोर्ट को दस्तावेज के रूप से प्रस्तुत किये जाने को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन ने अपने आदेश में कहा है कि पहली नजर में ऐसा प्रतीक होता है कि बचाव पक्ष की मदद से लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने न्यायालय के समक्ष झूठे सबूत पेश किये हैं। युगलपीठ ने डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम ऑफिसर छतरपुर को निर्देशित किया है कि संबंधित महिला आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की भूमिका के संबंध में जांच करें। जांच में कथित सर्वे रिपोर्ट फर्जी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।
छतरपुर निवासी अनिल अग्निहोत्री की तरफ से दायर अपील में कहा गया था कि जिला न्यायालय के विषेष न्यायाधीश द्वारा साल 2023 में पॉक्सो, बलात्कार और अपहरण के तहत दोषी करार देते हुए अधिकतम आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया है। अपीलकर्ता की तरफ आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के द्वारा साल 2005 में किये गए सर्वे रिपोर्ट को दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करते हुए तर्क दिया गया कि उस समय पीड़िता की उम्र तीन साल थी। इस हिसाब से घटना के समय पीड़ित की उम्र 18 साल से अधिक थी और बालिग थी। विषेष न्यायाधीश ने पीड़ित को नाबालिग मानते हुए पॉक्सो एक्ट के तहत आजीवन कारावास की सजा से दंडित करने में गलती की है।
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युगलपीठ ने दस्तावेज का अवलोकन करते हुए पाया कि सर्वे के कवर पेज, जिसमें पंजीयन क्रमांक एक लिखा है, उसमें आंगनबाड़ी सहायिका या सेक्टर सुपरवाइजर का नाम और उनका पता नहीं है। इसके अलावा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मालती अहिरवार के हस्ताक्षर नहीं हैं। जन्म की तारीख का दस नम्बर का कॉलम खाली है। पहली नजर में ऐसा लग रहा है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कोर्ट के सामने झूठे सबूत दे रही थी। उसका सर्टिफिकेट भी विरोधाभासों से भरा है। युगलपीठ ने सुनवाई के बाद उक्त आदेश जारी किये। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि जांच तीस दिनों में की जाये।
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छतरपुर निवासी अनिल अग्निहोत्री की तरफ से दायर अपील में कहा गया था कि जिला न्यायालय के विषेष न्यायाधीश द्वारा साल 2023 में पॉक्सो, बलात्कार और अपहरण के तहत दोषी करार देते हुए अधिकतम आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया है। अपीलकर्ता की तरफ आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के द्वारा साल 2005 में किये गए सर्वे रिपोर्ट को दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करते हुए तर्क दिया गया कि उस समय पीड़िता की उम्र तीन साल थी। इस हिसाब से घटना के समय पीड़ित की उम्र 18 साल से अधिक थी और बालिग थी। विषेष न्यायाधीश ने पीड़ित को नाबालिग मानते हुए पॉक्सो एक्ट के तहत आजीवन कारावास की सजा से दंडित करने में गलती की है।
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युगलपीठ ने दस्तावेज का अवलोकन करते हुए पाया कि सर्वे के कवर पेज, जिसमें पंजीयन क्रमांक एक लिखा है, उसमें आंगनबाड़ी सहायिका या सेक्टर सुपरवाइजर का नाम और उनका पता नहीं है। इसके अलावा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मालती अहिरवार के हस्ताक्षर नहीं हैं। जन्म की तारीख का दस नम्बर का कॉलम खाली है। पहली नजर में ऐसा लग रहा है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कोर्ट के सामने झूठे सबूत दे रही थी। उसका सर्टिफिकेट भी विरोधाभासों से भरा है। युगलपीठ ने सुनवाई के बाद उक्त आदेश जारी किये। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि जांच तीस दिनों में की जाये।
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