दुबई के सट्टा किंग की नहीं चली: सतीश सनपाल की FIR रद्द करने वाली याचिकाएं हाईकोर्ट ने ठुकराईं, अब आगे क्या?
दुबई से कथित सट्टा रैकेट संचालित करने के आरोपी सतीश सनपाल को हाईकोर्ट से झटका लगा। कोर्ट ने जबलपुर के चार थानों में दर्ज करीब आधा दर्जन एफआईआर रद्द करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी की मौके पर मौजूदगी जरूरी नहीं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
दुबई से सट्टा कारोबार संचालित करने के मास्टरमाइंड होने के आरोप में जबलपुर के चार थानों में दर्ज करीब आधा दर्जन एफआईआर निरस्त कराने की मांग को लेकर सतीश सनपाल ने हाईकोर्ट की शरण ली थी। हाईकोर्ट के जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने सुनवाई के बाद सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे अपराधों में छापेमारी की जगह पर आरोपी की शारीरिक मौजूदगी उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए जरूरी शर्त नहीं है। जांच के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्यों का मूल्यांकन ट्रायल कोर्ट में किया जाना आवश्यक है। दुबई में रहने वाले सतीश सनपाल की ओर से करीब आधा दर्जन याचिकाएं दायर की गई थीं। इसके अलावा अलग-अलग मामलों में चार अन्य सह आरोपियों ने भी एफआईआर निरस्त करने की मांग करते हुए याचिकाएं दायर की थीं।
सतीश सनपाल की ओर से दायर याचिकाओं में कहा गया था कि छापेमारी के दौरान गिरफ्तार आरोपियों के धारा 161 के तहत दर्ज बयानों के आधार पर उसे कथित सट्टेबाजी रैकेट का मास्टरमाइंड और अपराध में शामिल बताया गया है। आरोप यह भी है कि उसने अपने और अन्य लोगों के नाम पर फर्जी शेल कंपनियां खोलीं और उनमें भारी लेनदेन कर सरकार के साथ धोखाधड़ी की। याचिका में कहा गया कि उसे गलत तरीके से उन कंपनियों का डायरेक्टर बताया गया है, जबकि ये कंपनियां वास्तव में मौजूद हैं और कानून के अनुसार रिटर्न दाखिल करती हैं।
पढ़ें: बिना ओटीपी आरक्षक के खाते से 36 हजार उड़ाए, तरीका जानकर रह जाएंगे हैरान
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि जांच के दौरान ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे कथित सट्टेबाजी गतिविधियों में उसकी सक्रिय भागीदारी, साजिश, वित्तीय लेनदेन या बातचीत साबित हो सके। वह दुबई में रहता है और घटना के समय भारत में मौजूद नहीं था। अभियोजन पक्ष ने जिन चैट का हवाला दिया है, उनमें याचिकाकर्ता या उससे जुड़े किसी मोबाइल नंबर का उल्लेख नहीं है।
याचिका में और क्या कहा गया?
याचिका में यह भी कहा गया कि सह आरोपी के मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच में उसके खिलाफ कोई आपत्तिजनक सबूत नहीं मिला। उसके बैंक खाते से कोई लेनदेन नहीं हुआ और न ही उसके पास से कोई रकम बरामद की गई। कथित सट्टेबाजी गतिविधियों से उसे जोड़ने वाला कोई मनी ट्रेल, इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन, चैट, ईमेल या अन्य ठोस सबूत भी नहीं है।
वहीं, शासकीय अधिवक्ता ने याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि उचित जांच के बाद याचिकाकर्ता की संलिप्तता दर्शाने वाली पर्याप्त सामग्री एकत्र की गई है। मामले में चार्जशीट न्यायालय में दाखिल हो चुकी है और उसके खिलाफ प्रथम दृष्टया अपराध बनता है। एकलपीठ ने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता का तर्क है कि एफआईआर दर्ज होने के समय वह दुबई में रहता था और भारत में मौजूद नहीं था। चार्जशीट में बताई गई कंपनियों से उसका कोई संबंध नहीं था और उसके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री भी बरामद नहीं हुई।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन की चार्जशीट के अनुसार जांच के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्य कथित सट्टेबाजी गतिविधियों में याचिकाकर्ता की भागीदारी की ओर इशारा करते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि वह वर्ष 2020 से दुबई में रह रहा था और मार्च 2020 के बाद भारत नहीं आया। हालांकि, कथित अपराध ऐसे नहीं हैं, जिनमें छापेमारी की जगह पर आरोपी की शारीरिक मौजूदगी ही उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए जरूरी हो। कोर्ट ने कहा कि यह ऐसा मामला है, जिसका फैसला ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
