MP: 'बालिग की पसंद सर्वोपरि', हाईकोर्ट बोला- मां की भावना या पिता के अहंकार पर नहीं चलेगा कानून
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद की जगह और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी वयस्क को अवैध रूप से हिरासत में नहीं रखा गया है, तो उसकी कस्टडी माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति को नहीं सौंपी जा सकती।
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद की जगह और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि जब तक किसी वयस्क पर कोई दबाव या गैरकानूनी रोक-टोक नहीं है, तब तक अदालतें अभिभावक की भूमिका नहीं निभा सकतीं और न ही उसकी कस्टडी माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति को सौंपने का आदेश दे सकती हैं।
मां ने बेटी को भगाकर ले जाने का लगाया था आरोप
मामला रांझी के गोकलपुर क्षेत्र का है। यहां रहने वाली एक महिला ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि रितिक चौधरी उसकी बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है। याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस को युवती को अदालत में पेश करने के निर्देश दिए थे।
युवती ने कोर्ट में कही अपनी बात
सुनवाई के दौरान पुलिस युवती को अदालत में लेकर पहुंची। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने युवती से अकेले में बातचीत की। युवती ने अदालत को बताया कि वह बालिग है और अपनी इच्छा से रितिक चौधरी के साथ गई है। उसने यह भी कहा कि वह उसी के साथ रहना चाहती है और अपने माता-पिता के पास वापस नहीं जाना चाहती। युवती ने साफ किया कि उस पर किसी तरह का दबाव या अनुचित प्रभाव नहीं डाला गया है।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से कहीं रह रहा है और उसे अवैध रूप से हिरासत में नहीं रखा गया है, तो संवैधानिक अदालत उसकी कस्टडी किसी अन्य व्यक्ति, यहां तक कि उसके माता-पिता को भी नहीं सौंप सकती।
अदालत ने यह भी कहा कि न्यायालयों को मां की भावनाओं या पिता के अहंकार से प्रेरित होकर 'सुपर गार्जियन' की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका केवल उन्हीं मामलों में लागू होती है, जहां किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया हो।
याचिका का किया निराकरण
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निराकरण करते हुए उसे खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में दोहराया कि बालिग व्यक्ति को अपने जीवन से जुड़े फैसले स्वयं लेने का संवैधानिक अधिकार है।
