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MP News: साक्ष्य दर्ज होने के बाद DNA रिपोर्ट आने पर शिकायतकर्ता से दोबारा जिरह का अधिकार नहीं- हाईकोर्ट
Thu, 02 Jul 2026 09:32 PM IST
जबलपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Thu, 02 Jul 2026 09:32 PM IST
सार
हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन के साक्ष्य दर्ज होने के बाद डीएनए रिपोर्ट मिलने मात्र से शिकायतकर्ता को दोबारा जिरह के लिए बुलाने का अधिकार आरोपी को नहीं मिलता। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 311 का उपयोग कमियां पूरी करने के लिए नहीं किया जा सकता और याचिका खारिज कर दी।
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मप्र हाईकोर्ट
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विस्तार
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने अपने महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्य दर्ज होने के बाद यदि डीएनए रिपोर्ट प्राप्त होती है, तो मात्र इस आधार पर शिकायतकर्ता को दोबारा जिरह के लिए बुलाने का अधिकार आरोपी को नहीं मिल जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 311 का उपयोग ठोस और आवश्यक कारणों के बिना मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता।
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एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी का आवेदन निरस्त किए जाने के आदेश को सही ठहराते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। बता दें कि छतरपुर निवासी गोली उर्फ करण अहिरवार की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि उसके खिलाफ लंबित दुष्कर्म प्रकरण में पीड़िता के मुख्य बयान और जिरह पूरी होने के बाद डीएनए रिपोर्ट प्राप्त हुई। इसके बाद उसने डीएनए रिपोर्ट के संबंध में पीड़िता से दोबारा जिरह करने के लिए ट्रायल कोर्ट में सीआरपीसी की धारा 311 के तहत आवेदन प्रस्तुत किया था। ट्रायल कोर्ट द्वारा आवेदन खारिज किए जाने के बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि उसे अपना बचाव और बेगुनाही साबित करने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए।
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राज्य शासन की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि ट्रायल कोर्ट में पीड़िता का मुख्य परीक्षण और विस्तृत प्रतिपरीक्षण (क्रॉस-एग्जामिनेशन) पहले ही पूरा हो चुका है। इसके अलावा फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) के वैज्ञानिक का भी प्रतिपरीक्षण किया जा चुका है। इसलिए सीआरपीसी की धारा 311 का उपयोग किसी पक्ष को अपने मामले की कमियां दूर करने का अवसर देने के लिए नहीं किया जा सकता।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि डीएनए रिपोर्ट शिकायतकर्ता महिला द्वारा तैयार नहीं की गई है और उसे इस रिपोर्ट के वैज्ञानिक पहलुओं की कोई विशेष जानकारी नहीं है। डीएनए रिपोर्ट वैज्ञानिक परीक्षण पर आधारित विशेषज्ञ की राय होती है। आरोपी पक्ष विशेषज्ञ का प्रतिपरीक्षण पहले ही कर चुका है। याचिकाकर्ता यह भी स्पष्ट नहीं कर सका कि सत्य तक पहुंचने के लिए शिकायतकर्ता से ऐसे कौन-से वैज्ञानिक या महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे जाने आवश्यक हैं। अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 311 का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
