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प्रोजेक्ट चीता की बड़ी कामयाबी: प्रभास-पावक ने गांधीसागर में पूरे किए 365 दिन, जंगल में कायम किया दबदबा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मंदसौर Published by: मंदसौर ब्यूरो Updated Tue, 21 Apr 2026 01:04 PM IST
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सार

गांधीसागर अभयारण्य में प्रभास और पावक ने 365 दिन पूरे कर 150 से ज्यादा शिकार किए हैं, 1460 किमी क्षेत्र तय किया और वजन भी बढ़ाया है। दोनों का तालमेल, रणनीति और अनुकूलन प्रोजेक्ट चीता की बड़ी सफलता साबित हुआ है।

Major Success for Project Cheetah Prabhas and Pavak Complete 365 Days at Gandhi Sagar News in hindi
प्रभास और पावक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

भारत के महत्वाकांक्षी ‘प्रोजेक्ट चीता’ की सफलता की कहानी ने एक और ऐतिहासिक पड़ाव हासिल किया है। दक्षिण अफ्रीका से आए चीता भाई प्रभास और पावक ने गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में अपने सफल 365 दिन पूरे कर लिए हैं। यह सिर्फ एक साल का सफर नहीं, बल्कि जंगल के अनुशासन, भाईचारे और सर्वाइवल की एक रोमांचक गाथा बन चुका है।

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इन 365 दिनों में दोनों चीतों के प्रदर्शन ने वन्यजीव विशेषज्ञों को भी प्रभावित किया है। प्रभास और पावक ने 150 से अधिक सफल शिकार किए हैं, जो उनकी तेजी और अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है। उन्होंने जंगल के भीतर 1460 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर अपना इलाका स्थापित किया है। साथ ही गांधीसागर की अनुकूल जलवायु के कारण उनके वजन में करीब 4 किलो की वृद्धि दर्ज की गई है, जो उनके बेहतर स्वास्थ्य का संकेत है।

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प्रभास और पावक का भारत में आगमन 18 फरवरी 2023 को हुआ था। शुरुआत में उन्हें कूनो नेशनल पार्क में रखा गया, जहां उन्होंने लगभग दो वर्षों तक भारतीय परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाला। इसके बाद गांधीसागर में खुले वातावरण ने उनकी फुर्ती और आक्रामकता को और निखार दिया।


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वन विभाग के अनुसार, दोनों भाइयों के बीच शानदार तालमेल देखने को मिला है, जिसे ‘कोएलिशन’ का बेहतरीन उदाहरण माना जा रहा है। भोजन या आराम के दौरान वे अक्सर अपनी पीठ एक-दूसरे से जोड़कर बैठते हैं, जिससे चारों दिशाओं पर नजर बनाए रखते हैं। शिकार के समय भी उनकी रणनीति बेहद सटीक होती है। एक चीता शिकार को थकाता है, जबकि दूसरा मौके पर घात लगाकर उसे पकड़ लेता है। यदि किसी एक की गति धीमी पड़ती है, तो दूसरा उसका साथ नहीं छोड़ता, जो उनके गहरे भरोसे को दर्शाता है।

उनकी सेहत का एक बड़ा कारण उनका साफ-सफाई का व्यवहार भी है। वन टीम ने ‘एलोग्रूमिंग’ (एक-दूसरे को साफ करना) और ‘ऑटोग्रूमिंग’ (खुद की सफाई) जैसी आदतों को भी दर्ज किया है। उनकी जीभ पर मौजूद केराटिनाइज्ड पैपिला कंघी की तरह काम करती है, जिससे उनका शरीर साफ और संक्रमण से सुरक्षित रहता है।

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