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शंकराचार्य विवाद: 'परंपरा गुरु-शिष्य की है, सरकारी मुहर की नहीं', स्वामी सदानंद सरस्वती ने सरकार को दी नसीहत

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नरसिंहपुर Published by: नरसिंहपुर ब्यूरो Updated Sun, 25 Jan 2026 11:13 AM IST
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सार

Shankaracharya Controversy : माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से दुर्व्यवहार पर द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कड़ा विरोध जताया। उन्होंने अभिषेक की वैधता बताते हुए प्रशासन पर धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप का आरोप लगाया और सत्ता के अहंकार से चेतावनी दी। समाज से संयम और सम्मान की अपील की।

Shankaracharya Controversy: Swami Sadanand Saraswati Statement Advice to Government MP News in Hindi
शंकराचार्य सदानंद सरस्वती महाराज। - फोटो : अमर उजाला
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माघ मेले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुए दुर्व्यवहार का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने इस घटना पर कड़ा रोष व्यक्त करते हुए सरकार और प्रशासन को आड़े हाथ लिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शंकराचार्य की परंपरा गुरु-शिष्य प्रणाली पर टिकी है, किसी प्रशासनिक आदेश या सरकारी मुहर पर नहीं।
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'मैं स्वयं अभिषेक का साक्षी रहा हूं'
शनिवार को मुक्तानंद संस्कृत पाठशाला के जीर्णोद्धार समारोह में पहुंचे शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का शृंगेरी पीठ में विधिवत अभिषेक हुआ है और वे स्वयं इसके साक्षी रहे हैं। उन्होंने कहा, हमारे गुरु ने केवल दो शिष्यों को संन्यास दिया एक मैं और दूसरे अविमुक्तेश्वरानंद। ऐसे में उनकी वैधता पर सवाल उठाना न केवल अज्ञानता है, बल्कि हमारी धार्मिक परंपराओं में सीधा हस्तक्षेप है। उन्होंने कहा 'सरकार का काम हमारी धार्मिक विरासत में दखल देना नहीं, बल्कि उसकी रक्षा करना है। यदि तंत्र अपनी मर्यादा भूलेगा, तो समाज उसे स्वीकार नहीं करेगा।'
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सत्ता के अहंकार पर प्रहार
प्रशासनिक रवैये को निंदनीय बताते हुए उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि 'सत्ता कभी स्थायी नहीं होती।' सत्ता के मद में चूर होकर लिए गए निर्णय अंततः समाज में बदनामी का कारण बनते हैं। माघ मेले में किसी ब्राह्मण बालक या साधु-संत को गंगा स्नान से रोकना अक्षम्य है।

शंकराचार्य की बड़ी बातें
परंपरा सर्वोपरि:
प्रशासन को यह तय करने का कोई संवैधानिक या धार्मिक अधिकार नहीं कि कौन शंकराचार्य है।
जनभावना का सम्मान: लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता के वोट से चुने जाते हैं, उन्हें आस्था और संस्कृति का संरक्षण करना चाहिए, न कि उसे चोट पहुंचानी चाहिए।
अभिषेक की वैधता: शृंगेरी पीठ में हुए अभिषेक के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पहचान पर सवाल उठाना निराधार है।

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