सिस्टम का कारनामा: '126 साल की बेटी' को न्याय दिलाने एक वर्ष से भटक रहा आदिवासी पिता, जिम्मेदार जांच में अटके
सीहोर जिले की भैरुंदा तहसील में शिक्षा विभाग की लापरवाही से 15 वर्षीय आदिवासी छात्रा ममता बारेला को रिकॉर्ड में 126 वर्ष का दिखा दिया गया। गलत जन्मतिथि व अंकसूची त्रुटियों से छात्रा छात्रवृत्ति व योजनाओं से वंचित है, जांच जारी है।
सीहोर जिले की भैरुंदा तहसील में शिक्षा विभाग की लापरवाही से 15 वर्षीय आदिवासी छात्रा ममता बारेला को रिकॉर्ड में 126 वर्ष का दिखा दिया गया। गलत जन्मतिथि व अंकसूची त्रुटियों से छात्रा छात्रवृत्ति व योजनाओं से वंचित है, जांच जारी है।
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डिजिटल इंडिया, पढ़ेगा इंडिया-बढ़ेगा इंडिया जैसे बड़े-बड़े नारों के बीच मध्यप्रदेश के सीहोर जिले से चौंकाने वाला मामला सामने आया। यह मामला सरकारी सिस्टम की जमीनी हकीकत को उजागर करता है। भैरुंदा तहसील में शिक्षा विभाग की लापरवाही ने 15 साल की आदिवासी छात्रा को कागजों में 126 साल की बुजुर्ग बना दिया। शासकीय स्कूल की एक गलती ने न केवल छात्रा की पहचान पर सवाल खड़े कर दिए, बल्कि उसके भविष्य को भी अधर में लटका दिया है।
भैरुंदा तहसील के ग्राम इटावा खुर्द निवासी तेर सिंह बरेला की पुत्री ममता बारेला शासकीय हायर सेकंडरी स्कूल पिपलानी में कक्षा 9वीं की छात्रा है। सत्र 2024-25 की हालिया अंकसूची में उसकी जन्मतिथि अंकों में 00-01-1900 और शब्दों में 30 दिसंबर 1899 दर्ज कर दी गई। जबकि वास्तविकता यह है कि ममता का जन्म 3 जून 2009 को हुआ था। स्कूल रिकॉर्ड में उसे एक सदी से भी अधिक पुराना दिखा दिया गया, जिससे वह सरकारी दस्तावेजों में दादी की भी दादी बन गई।
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जन्म प्रमाण पत्र अटका, योजनाओं से वंचित हुई छात्रा
गलत जन्मतिथि का सीधा असर ममता के जीवन पर पड़ा है। जन्मतिथि की त्रुटि के कारण उसका डिजिटल बर्थ सर्टिफिकेट पोर्टल से बार-बार रिजेक्ट हो रहा है। जन्म प्रमाण पत्र के बिना न तो छात्रवृत्ति मिल पा रही है और न ही सरकारी योजनाओं का लाभ। जिस उम्र में बच्चे पढ़ाई और सपनों में व्यस्त होते हैं, उस उम्र में ममता और उसका पिता अपनी पहचान साबित करने के लिए सिस्टम से लड़ रहे हैं। एक प्रशासनिक गलती ने छात्रा को सामाजिक और शैक्षणिक दोनों रूप से हाशिए पर धकेल दिया है।
ममता की मार्कशीट सिर्फ जन्मतिथि की गलती तक सीमित नहीं है। दस्तावेजों पर नजर डालें तो परिणामों में भी गंभीर विसंगतियां सामने आती हैं। मार्कशीट के अनुसार छात्रा को थ्योरी के सभी मुख्य विषयों में अनुपस्थित दिखाया गया है, जबकि इसके बावजूद प्रैक्टिकल और पुराने वेटेज के आधार पर 50 अंक जोड़कर उसे फेल घोषित कर दिया गया। पिता ने बताया कि छात्रा प्रेक्टिकल के लिए भी नहीं गई थी। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने बिना जांच-पड़ताल के ही दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए। इस लापरवाही ने छात्रा के पूरे शैक्षणिक सत्र को खतरे में डाल दिया है।
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एक साल से दफ्तरों के चक्कर, पिता की नहीं सुनवाई
गरीब आदिवासी पिता तेर सिंह बरेला पिछले एक साल से स्कूल, विकासखंड कार्यालय और शिक्षा विभाग के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। उन्होंने विकासखंड शिक्षा अधिकारी, एसडीएम को ज्ञापन सौंपकर प्राचार्य और अन्य दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। तेर सिंह का कहना है कि हर बार उन्हें आश्वासन मिलता है, लेकिन सुधार आज तक नहीं हुआ। जानकारों का कहना है कि यदि यह त्रुटि पोर्टल के माध्यम से हुई है तो जिला शिक्षा केंद्र के स्तर पर इसे सुधारा जा सकता है, लेकिन देरी छात्रा के भविष्य को और नुकसान पहुंचा सकती है।
आदिवासी बेटी का भविष्य खराब, आंदोलन की चेतावनी
मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के आदिवासी विभाग महासचिव सुमित नर्रे ने इस मामले को लापरवाही की पराकाष्ठा बताया है। उन्होंने कहा कि जिस बेटी का जन्म 2009 में हुआ, उसे स्कूल ने 1899 की छात्रा बना दिया, यह आदिवासी परिवारों के प्रति सिस्टम की संवेदनहीनता दर्शाता है। नर्रे ने तहसीलदार और जिला शिक्षा अधिकारी से तत्काल सुधार और दोषी प्राचार्य व परीक्षा प्रभारी पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द सुधार नहीं हुआ तो रानी दुर्गावती सेना और कांग्रेस आदिवासी विभाग उग्र आंदोलन करेगा। वहीं विकासखंड शिक्षा अधिकारी साक्षी जैन ने बताया कि शिकायत मिलने के बाद जांच के निर्देश दिए गए हैं और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी।

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