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पेंच की ‘लंगड़ी बाघिन’ का अंत: 18 साल तक जंगल पर रहा राज, 10 शावकों को जन्म देकर बनी मिसाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सिवनी
Published by: सिवनी ब्यूरो
Updated Sun, 08 Mar 2026 04:47 PM IST
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सार
पेंच टाइगर रिजर्व की चर्चित 18 वर्षीय ‘लंगड़ी बाघिन’ (PN-20) का शव कर्माझिरी रेंज में मिला। जन्मजात विकृति के बावजूद उसने लंबे समय तक जंगल में वर्चस्व बनाए रखा और 10 शावकों को जन्म देकर बाघों की संख्या बढ़ाने में योगदान दिया। पोस्टमार्टम के बाद वन विभाग ने उसका अंतिम संस्कार किया।
पेंच टाइगर रिजर्व की सबसे बुजुर्ग बाघिन की मौत हो गई।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित प्रसिद्ध पेंच टाइगर रिजर्व की सबसे चर्चित और उम्रदराज बाघिन ‘लंगड़ी बाघिन’ (PN-20) ने आखिरकार दुनिया को अलविदा कह दिया। करीब 18 वर्ष की आयु तक जंगल में अपना वर्चस्व बनाए रखने वाली इस बाघिन का शव कर्माझिरी रेंज के मुनारा क्षेत्र में मिला। सूचना मिलने के बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की गाइडलाइंस के अनुसार पोस्टमार्टम कर पूरे सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया गया।
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वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार लंगड़ी बाघिन को 6 मार्च 2026 को आखिरी बार जंगल में देखा गया था। इसके बाद 7 मार्च की सुबह कर्माझिरी रेंज के मुनारा कैम्प के पास उसका शव पड़ा मिला। मामले की जानकारी मिलते ही वन विभाग की टीम ने पूरे इलाके को घेरकर जांच शुरू की और वरिष्ठ वन्यजीव पशु चिकित्सकों को मौके पर बुलाया गया। विशेषज्ञ डॉक्टरों ने मौके पर ही बाघिन का पोस्टमार्टम कर मौत के कारणों की जांच की।
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वन अधिकारियों ने बताया कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के नियमों के अनुसार किसी भी वन्यजीव की मौत के बाद उसके अंगों की तस्करी या दुरुपयोग को रोकने के लिए विधिवत पोस्टमार्टम करना अनिवार्य होता है। पोस्टमार्टम के बाद वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी में चिता बनाकर बाघिन का अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान वन कर्मचारियों ने उसे श्रद्धांजलि भी अर्पित की।
जन्मजात विकृति के बावजूद अद्भुत जीवन
लंगड़ी बाघिन को यह नाम उसके पैरों में जन्म से मौजूद विकृति के कारण मिला था। चलते समय वह हल्का असंतुलित रहती थी, लेकिन इसके बावजूद उसने जंगल में अपने साहस और क्षमता का परिचय दिया। शिकार करने और अपने क्षेत्र की रक्षा करने में वह बेहद कुशल थी। यही वजह रही कि वह लंबे समय तक पेंच के जंगलों में प्रभावी रूप से अपना क्षेत्र बनाए रखने में सफल रही।
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10 शावकों की मां बनकर बढ़ाई पेंच की आबादी
वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार इस बाघिन ने अपने जीवनकाल में कुल 10 शावकों को जन्म दिया था। उसके कई शावक बड़े होकर पेंच के अलग-अलग इलाकों में अपना इलाका स्थापित कर चुके हैं। इस तरह उसने पेंच के जंगलों में बाघों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार यह बाघिन पेंच के उस प्रसिद्ध ‘सुपर मॉम’ परिवार से भी जुड़ी हुई थी, जिसके कई सदस्य आज भी जंगल में मौजूद हैं।
पेंच की सबसे लोकप्रिय बाघिनों में थी शामिल
लंगड़ी बाघिन पेंच आने वाले पर्यटकों और वन्यजीव प्रेमियों के बीच भी काफी लोकप्रिय थी। जंगल सफारी के दौरान कई पर्यटकों ने उसे देखा और उसकी तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुईं। उसकी पहचान सिर्फ एक बाघिन के रूप में नहीं, बल्कि संघर्ष और साहस की मिसाल के रूप में भी की जाती थी।
लंबी उम्र ने बनाया खास
आमतौर पर जंगल में बाघों की औसत आयु 12 से 15 वर्ष मानी जाती है, लेकिन लंगड़ी बाघिन ने लगभग 18 वर्ष तक जीवित रहकर इस औसत को पार कर दिया। इसी कारण वह पेंच टाइगर रिजर्व की सबसे अधिक समय तक जीवित रहने वाली बाघिनों में शामिल हो गई थी। वन अधिकारियों और वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि लंगड़ी बाघिन ने अपने जीवनकाल में कई पीढ़ियों के बाघों को जन्म देकर पेंच के जंगलों की जैव विविधता को समृद्ध किया। उसके निधन से पेंच के जंगलों में एक युग का अंत हो गया है और वन्यजीव प्रेमियों के बीच शोक की लहर है।

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