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MP News: 'गुरु तेग बहादुर ने धर्म को मानवीय सत्य में रूपांतरित किया', व्याख्यानमाला में बोले साहित्यकार अरोरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: उज्जैन ब्यूरो
Updated Sat, 22 Nov 2025 08:43 PM IST
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सार
मुख्य वक्ता पुणे के साहित्यकार एवं उद्योगपति रणजीत सिंह अरोरा ने गुरु तेग बहादुर साहब के मानवीय आदर्शों, त्याग, करुणा और धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर की शहादत मानवाधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की रक्षा का अद्वितीय उदाहरण है।
साहित्यकार एवं उद्योगपति रणजीत सिंह अरोरा।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
23वीं अखिल भारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला का शनिवार को छठा दिन रहा। कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा और पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन की स्मृति में भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने संबोधित किया। कार्यक्रम का आरंभ संस्थान की शिक्षिकाओं द्वारा सद्भावना एवं देशभक्ति गीत से हुई। दीप प्रज्ज्वल डॉ. पिलकेंद्र सिंह अरोरा, पूर्व कुलगुरु बालकृष्ण शर्मा, खुशहाल सिंह वाधवा, रिचा विचार मंच के महेश ज्ञानी, वरिष्ठ शिक्षाविद बी.एस. मक्कड़, अमृता कुलश्रेष्ठ द्वारा किया गया। इस अवसर पर डॉ. राकेश ढंड, युधिष्ठिर कुलश्रेष्ठ, डॉ. अनामिका सोनी, प्रो. बृजकिशोर शर्मा, मुकेश जोशी, आचार्य राम दवे, रफीक नागौरी, प्रवीण जोशी, दीपक सोनी, महेश सिंह बेस, अनिल व्यास सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन प्राचार्य रचना श्रीवास्तव ने किया।
इस दौरान मुख्य वक्ता पुणे के साहित्यकार एवं उद्योगपति रणजीत सिंह अरोरा ने डिजिटली सभा को संबोधित करते हुए कहा कि गुरु तेग बहादुर साहब ने धर्म को केवल परंपरा नहीं रहने दिया, उसे शाश्वत मानवीय सत्य में रूपांतरित किया। उनकी शहादत ने विश्व को बताया कि अत्याचार का उत्तर केवल हथियार नहीं, बल्कि सिद्धांत, त्याग और मानवीय करुणा की शक्ति से भी दिया जा सकता है। धार्मिक स्वतंत्रता किसी एक समुदाय का अधिकार नहीं, बल्कि समस्त मानवता की गरिमा का आधार है। गुरु साहब ने इसे अपनी शहादत से प्रमाणित किया। उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर की शहादत को दूसरों के अधिकारों के लिए दी गई पहली मौन याचिका कहा जा सकता है जो किसी अदालत में नहीं, बल्कि अटल संकल्प और निस्वार्थ समर्पण से दायर की गई थी। इस शहादत ने हिंदू, सिख, धर्म, देश—सभी को बचाया और सबसे महत्वपूर्ण मनुष्य को बचाया। गुरु तेग बहादुर साहब का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है शक्ति और करुणा यदि आदर्शों की रक्षा में एकजुट हों, तो इतिहास बदलना निश्चित है।
गुरु तेग बहादुर ने मानवाधिकारों की रक्षा हेतु अपना शीश अर्पित किया
श्री गुरु तेग बहादुर के मानवीय आदर्श विषय पर अपनी बात रखते हुए रणजीत सिंह अरोरा ने कहा कि तेग शब्द केवल तलवार का अर्थ नहीं, बल्कि तेज निर्णय, धैर्य, संयम और अदम्य मनोबल का प्रतीक है और यही मूल्य गुरु तेग बहादुर के व्यक्तित्व की आधारशिला बने। गुरु तेग बहादुर साहब का संपूर्ण जीवन इस सत्य को सिद्ध करता है कि जब शक्ति और करुणा किसी आदर्श की रक्षा के लिए साथ खड़ी हों, तब इतिहास बदल जाता है। बचपन से ही उनके भीतर असाधारण संवेदना और सेवा का भाव था। चार वर्ष की आयु में जब गुरु तेग बहादुर ने एक निर्धन का तन ढका, तब स्पष्ट था कि उनका जीवन मानवता के दु:ख हरने के लिए समर्पित होगा। आगे चलकर उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता, सत्य और मानवाधिकारों की रक्षा हेतु स्वेच्छा से अपना शीश अर्पित किया, जो इतिहास में करुणा और नैतिक साहस का अनोखा उदाहरण है।
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इस दौरान मुख्य वक्ता पुणे के साहित्यकार एवं उद्योगपति रणजीत सिंह अरोरा ने डिजिटली सभा को संबोधित करते हुए कहा कि गुरु तेग बहादुर साहब ने धर्म को केवल परंपरा नहीं रहने दिया, उसे शाश्वत मानवीय सत्य में रूपांतरित किया। उनकी शहादत ने विश्व को बताया कि अत्याचार का उत्तर केवल हथियार नहीं, बल्कि सिद्धांत, त्याग और मानवीय करुणा की शक्ति से भी दिया जा सकता है। धार्मिक स्वतंत्रता किसी एक समुदाय का अधिकार नहीं, बल्कि समस्त मानवता की गरिमा का आधार है। गुरु साहब ने इसे अपनी शहादत से प्रमाणित किया। उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर की शहादत को दूसरों के अधिकारों के लिए दी गई पहली मौन याचिका कहा जा सकता है जो किसी अदालत में नहीं, बल्कि अटल संकल्प और निस्वार्थ समर्पण से दायर की गई थी। इस शहादत ने हिंदू, सिख, धर्म, देश—सभी को बचाया और सबसे महत्वपूर्ण मनुष्य को बचाया। गुरु तेग बहादुर साहब का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है शक्ति और करुणा यदि आदर्शों की रक्षा में एकजुट हों, तो इतिहास बदलना निश्चित है।
गुरु तेग बहादुर ने मानवाधिकारों की रक्षा हेतु अपना शीश अर्पित किया
श्री गुरु तेग बहादुर के मानवीय आदर्श विषय पर अपनी बात रखते हुए रणजीत सिंह अरोरा ने कहा कि तेग शब्द केवल तलवार का अर्थ नहीं, बल्कि तेज निर्णय, धैर्य, संयम और अदम्य मनोबल का प्रतीक है और यही मूल्य गुरु तेग बहादुर के व्यक्तित्व की आधारशिला बने। गुरु तेग बहादुर साहब का संपूर्ण जीवन इस सत्य को सिद्ध करता है कि जब शक्ति और करुणा किसी आदर्श की रक्षा के लिए साथ खड़ी हों, तब इतिहास बदल जाता है। बचपन से ही उनके भीतर असाधारण संवेदना और सेवा का भाव था। चार वर्ष की आयु में जब गुरु तेग बहादुर ने एक निर्धन का तन ढका, तब स्पष्ट था कि उनका जीवन मानवता के दु:ख हरने के लिए समर्पित होगा। आगे चलकर उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता, सत्य और मानवाधिकारों की रक्षा हेतु स्वेच्छा से अपना शीश अर्पित किया, जो इतिहास में करुणा और नैतिक साहस का अनोखा उदाहरण है।

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