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आज विश्व संग्रहालय दिवस: निजी संग्रह में अनोखा खजाना, होलकर राजाओं को भी था ऐतिहासिक सामग्री संजोने का शौक
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सार
विश्व संग्रहालय दिवस पर इंदौर और मालवा-निमाड़ की ऐतिहासिक विरासत को सहेजने वाले संग्रहकर्ताओं की अनूठी दुनिया सामने आई है। होलकर रियासत के दौर से शुरू हुई संग्रहालय परंपरा आज भी इतिहास प्रेमियों के प्रयासों से जीवित है। कोई दुर्लभ सिक्के सहेज रहा है तो कोई प्राचीन डाक टिकट और पांडुलिपियों के जरिए इतिहास को संजोए हुए है। पढ़ें पूरी खबर
होलकर रियासत के राजा इतिहास की यादों को सहेजने के प्रति 1923 से ही सजग रहे है।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
इतिहास की सामग्री के प्रति जनरुचि कायम रखने के इरादे से संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1983 से संग्रहालय दिवस घोषित किया है, पर इंदौर की पूर्ववर्ती होलकर रियासत के राजा इतिहास की यादों को सहेजने के प्रति 1923 से ही सजग रहे है।
इसकी शुरुआत सामान्य स्तर पर सामग्री संग्रह करने से हुई। शुरू में इस संग्रहालय का नाम नररत्न मंदिर था। अक्तूबर 1929 में इंदौर में केंद्रीय संग्रहालय की विधिवत स्थापना की गई। 1966 में वर्तमान संग्रहालय छावनी के समीप पुराने आगरा-बॉम्बे मार्ग पर स्थानांतरित किया गया, जो आज भी मालवा-निमाड़ की पुरातत्व संपदा के संग्रह का विशाल केंद्र है।
इसकी शुरुआत सामान्य स्तर पर सामग्री संग्रह करने से हुई। शुरू में इस संग्रहालय का नाम नररत्न मंदिर था। अक्तूबर 1929 में इंदौर में केंद्रीय संग्रहालय की विधिवत स्थापना की गई। 1966 में वर्तमान संग्रहालय छावनी के समीप पुराने आगरा-बॉम्बे मार्ग पर स्थानांतरित किया गया, जो आज भी मालवा-निमाड़ की पुरातत्व संपदा के संग्रह का विशाल केंद्र है।
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संग्रहित सामग्री को देखते हुए लोग।
- फोटो : अमर उजाला
मिलन महाजन ने सहेजे सिक्के
खरगोन निवासी मिलन महाजन, पेशे से व्यवसायी हैं। उन्होंने करीब दो दशक में देश के महत्वपूर्ण सिक्के अपने संग्रह की सहेज कर रखे हैं। महाजन के संग्रह में सिक्कों के अलावा कई पांडुलिपियां भी हैं। महाजन का कहना है कि हमारी पहचान हमारी संस्कृति और विरासत से बनती है, इसलिए मेरा यह एक शौक है, जो पूरा कर रहा हूं।
उमेश नीमा के पास दुर्लभ डाक टिकट
इंदौर निवासी उमेश कुमार नीमा, बैंक में नौकरी करते थे। वे करीब चार दशक से डाक टिकट संग्रह कर रहे हैं, उनके संग्रह में कई दुर्लभ डाक टिकट, प्राचीन सिक्के और होलकर रियासत की पुस्तकें संग्रहित हैं।
खरगोन निवासी मिलन महाजन, पेशे से व्यवसायी हैं। उन्होंने करीब दो दशक में देश के महत्वपूर्ण सिक्के अपने संग्रह की सहेज कर रखे हैं। महाजन के संग्रह में सिक्कों के अलावा कई पांडुलिपियां भी हैं। महाजन का कहना है कि हमारी पहचान हमारी संस्कृति और विरासत से बनती है, इसलिए मेरा यह एक शौक है, जो पूरा कर रहा हूं।
उमेश नीमा के पास दुर्लभ डाक टिकट
इंदौर निवासी उमेश कुमार नीमा, बैंक में नौकरी करते थे। वे करीब चार दशक से डाक टिकट संग्रह कर रहे हैं, उनके संग्रह में कई दुर्लभ डाक टिकट, प्राचीन सिक्के और होलकर रियासत की पुस्तकें संग्रहित हैं।
1937 में उज्जैन की हिरा मिल का शेयर,, उमेश नीमा के संग्रह में।
- फोटो : अमर उजाला
विनोद जोशी के पास फिल्मी सामग्री
सिनेमा के प्रति समर्पित विनोद जोशी ने फिल्मों से जुड़ी सामग्री के साथ उनके विज्ञापनों का बड़ा संग्रह कर रखा है। उनके संग्रह में ललित चंद्र मेहता द्वारा निर्देशित 1948 में रिलीज फिल्म आजादी की राह पर, 1944 में श्रीकृष्ण सिनेमा में प्रदर्शित तानसेन जैसी फिल्मों के विज्ञापनों के अलावा कई फिल्मों के विज्ञापन हैं।
माने के पास बर्तनों का संग्रह
बुरहानपुर निवासी वैद्य सुभाष माने, पेशे से आयुर्वेद चिकित्सक थे। उन्हें सिक्कों के साथ पुराने दौर के बर्तनों के संग्रह का शौक है। वे यह कार्य पिछले पांच दशक से कर रहे हैं। उनके संग्रह में दुर्लभ बर्तनों का संग्रह है।
सिनेमा के प्रति समर्पित विनोद जोशी ने फिल्मों से जुड़ी सामग्री के साथ उनके विज्ञापनों का बड़ा संग्रह कर रखा है। उनके संग्रह में ललित चंद्र मेहता द्वारा निर्देशित 1948 में रिलीज फिल्म आजादी की राह पर, 1944 में श्रीकृष्ण सिनेमा में प्रदर्शित तानसेन जैसी फिल्मों के विज्ञापनों के अलावा कई फिल्मों के विज्ञापन हैं।
माने के पास बर्तनों का संग्रह
बुरहानपुर निवासी वैद्य सुभाष माने, पेशे से आयुर्वेद चिकित्सक थे। उन्हें सिक्कों के साथ पुराने दौर के बर्तनों के संग्रह का शौक है। वे यह कार्य पिछले पांच दशक से कर रहे हैं। उनके संग्रह में दुर्लभ बर्तनों का संग्रह है।
महाराजा सिनेमा में 1948 में प्रदर्शित फ़िल्म आजादी की राह पर का विज्ञापन।
- फोटो : अमर उजाला
अंसारी के पास होलकरकालीन सामग्री का खजाना
जब होलकर इतिहास से जुड़ी किसी भी प्रकार की सामग्री की बात होती है तो शहर के जफर अंसारी संग्रहालय के जफर अंसारी का नाम आता है। जफर अंसारी ने पिछले 40 साल से इंदौर और होलकर राज से जुड़ी सामग्री संग्रह कर एक निजी संग्रहालय ही बना लिया है। इन संग्रहकर्ताओं के अलावा कई लोगों ने पुराने टाइप राइटर, माचिस की डिब्बियां आदि संजोकर रखी हैं।
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जब होलकर इतिहास से जुड़ी किसी भी प्रकार की सामग्री की बात होती है तो शहर के जफर अंसारी संग्रहालय के जफर अंसारी का नाम आता है। जफर अंसारी ने पिछले 40 साल से इंदौर और होलकर राज से जुड़ी सामग्री संग्रह कर एक निजी संग्रहालय ही बना लिया है। इन संग्रहकर्ताओं के अलावा कई लोगों ने पुराने टाइप राइटर, माचिस की डिब्बियां आदि संजोकर रखी हैं।
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1929 का साइकिल लाइसेंस, जफ़र अंसारी के संग्रह में।
- फोटो : अमर उजाला
क्यों और कब से मनाया जा यह दिवस?
किसी वस्तु का संग्रह करना या उसे सुरक्षित और संरक्षित करके रखना एक तरह से संग्रहालय जैसा कार्य है। वर्ष 1983 में 18 मई को संयुक्त राष्ट्र ने संग्रहालय की विशेषता उसके महत्व और संग्रहित वस्तुओं की उपयोगिता के लिए इस दिन को अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। संग्रहालय में प्रदर्शित सामग्री इतिहास का आईना होती है। आमजन इसे देख कर इसके महत्व को भी समझ सकते हैं। ऐतिहासिक सामग्री को सहेजना और आने वाली पीढ़ी को हमारी संस्कृति से अवगत करवाने का कार्य सरकार का तो है ही पर इस कार्य में कई लोगो ने रूचि ली है और अपने निजी संग्रहालय ही बना लिए हैं।
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किसी वस्तु का संग्रह करना या उसे सुरक्षित और संरक्षित करके रखना एक तरह से संग्रहालय जैसा कार्य है। वर्ष 1983 में 18 मई को संयुक्त राष्ट्र ने संग्रहालय की विशेषता उसके महत्व और संग्रहित वस्तुओं की उपयोगिता के लिए इस दिन को अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। संग्रहालय में प्रदर्शित सामग्री इतिहास का आईना होती है। आमजन इसे देख कर इसके महत्व को भी समझ सकते हैं। ऐतिहासिक सामग्री को सहेजना और आने वाली पीढ़ी को हमारी संस्कृति से अवगत करवाने का कार्य सरकार का तो है ही पर इस कार्य में कई लोगो ने रूचि ली है और अपने निजी संग्रहालय ही बना लिए हैं।
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