जर्मनी की सर्वोच्च अदालत (फेडरल कोर्ट ऑफ जस्टिस) ने जलवायु से जुड़े एक अहम केस को खारिज कर दिया है। इस केस में BMW (बीएमडब्ल्यू) और Mercedes-Benz (मर्सिडीज-बेंज) जैसी कंपनियों को 2030 तक पेट्रोल और डीजल (इंटरनल कंबशन इंजन) (ICE) वाली कारों की बिक्री बंद करने का आदेश देने की मांग की गई थी।
ICE: जर्मन कोर्ट ने BMW और Mercedes के खिलाफ क्लाइमेट केस किया खारिज, पेट्रोल-डीजल कारों पर जल्द बैन से इनकार
जर्मनी की शीर्ष अदालत ने BMW और Mercedes-Benz के खिलाफ जलवायु संबंधी एक मामले को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कम्बशन-इंजन वाली कारों की बिक्री बंद करने के लिए समय-सीमा तय करने का अधिकार केवल सांसदों को है।
कोर्ट ने केस क्यों खारिज किया?
अदालत ने साफ कहा कि कंपनियों के कारोबार से सीधे तौर पर नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकार प्रभावित नहीं होते।
इसलिए निजी कंपनियों को यह आदेश नहीं दिया जा सकता कि वे तय समय से पहले ऐसी गाड़ियों की बिक्री बंद कर दें।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे फैसले लेना सरकार और संसद का काम है, न कि न्यायपालिका का।
क्या यूरोप में पहले से कोई समय-सीमा तय है?
यूरोपीय संघ (ईयू) ने पहले ही फॉसिल फ्यूल कारों को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का लक्ष्य तय किया है।
हालांकि DUH इस प्रक्रिया को तेज करते हुए 2030 तक प्रतिबंध लागू करवाना चाहता था। जो मौजूदा ईयू टाइमलाइन से 5 साल पहले है।
फैसले के बाद पर्यावरण समूह की क्या प्रतिक्रिया रही?
DUH की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बारबरा मेट्ज ने कहा कि यह फैसला कंपनियों को पर्यावरण संकट की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।
उन्होंने जर्मन सरकार से सख्त कदम उठाने की मांग की और संकेत दिया कि इस फैसले के खिलाफ आगे अपील की जा सकती है।
ऑटो कंपनियों ने क्या कहा?
Mercedes-Benz और BMW दोनों ने इस फैसले का स्वागत किया।
उनका कहना है:
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पर्यावरण लक्ष्य तय करना सरकार और संसद का काम है
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कोर्ट का फैसला कंपनियों के लिए कानूनी स्पष्टता लाता है
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क्लाइमेट प्रोटेक्शन उनकी प्राथमिकता बनी हुई है
क्या कोर्ट अब पर्यावरण मामलों का नया मैदान बन रहा है?
हाल के वर्षों में पर्यावरण से जुड़े मामलों में कोर्ट की भूमिका बढ़ी है।
पिछले साल एक अन्य मामले में जर्मन कोर्ट ने माना था कि कंपनियों को उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। हालांकि उस केस में मुआवजा नहीं दिया गया था।