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Study: अंटार्कटिका की बर्फ में दबे प्राचीन ज्वालामुखियों ने दिए सबूत, एक बार फिर धरती पर आ सकता है हिमयुग
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति मेहरा
Updated Sat, 26 Mar 2022 12:09 PM IST
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धरती पर फिर आ सकता है हिमयुग (प्रतीकात्मक फोटो)
- फोटो : istock
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आज के समय में अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड जैसे दिखते हैं, किसी जमाने में वहां इससे बिल्कुल विपरीत स्थिति थी। एक समय में अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में सैकड़ों ज्वालामुखी फटते रहते थे। हाल ही में इनमें से 69 भयानक ज्वालामुखियों का पता चला है। हिमयुग के समय में इनमें इतने भयानक विस्फोट हुए जिन्हें आधुनिक इतिहास में कभी नहीं देखा गया है। इस पर रिसर्च कर रहे वैज्ञानिकों ने कहा कि वो इसके जरिए ये बताना चाहते हैं कि ये ज्वालामुखी विस्फोट हमें किस तरह जलवायु परिवर्तन को लेकर धरती की संवेदनशीलता के बारे में बताते हैं। इस खोज के जरिए ये पता लगाया गया है कि हिमयुग से पहले अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड के आसपास 69 ज्वालामुखियों में हुए विस्फोट, आधुनिक इतिहास में हुए अब तक के सबसे भयानक विस्फोट थे।
यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के भौतिक वैज्ञानिकों के मुताबिक, आमतौर पर ज्वालामुखी विस्फोट की परिकल्पना किसी प्रलय से कम नहीं की जाती है, जिसमें कान फाड़ देने वाला धमाका, गहरे रंग की राख, वायुमंडल में धुएं की परत और जमीन पर बहती लावे की नदी का नजारा भयावह होता है।
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धरती पर फिर आ सकता है हिमयुग (प्रतीकात्मक फोटो)
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दरअसल, ज्वालामुखी विस्फोट बताता है कि आपकी धरती जलवायु परिवर्तन को लेकर कितनी संवेदनशील है। इस प्राकृतिक घटना का बीच-बीच में होना जरूरी होती है, वरना संतुलन बनाने में मुश्किल हो सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन की नील बोर इंस्टीट्यूट के एसोसिएट प्रोफेसर एंडर्स वेन्सन का कहना है कि अभी तक हमने इतिहास का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट नहीं देखा है। आने वाले दिनों में हम उसे कभी भी देख सकते हैं।
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धरती पर फिर आ सकता है हिमयुग (प्रतीकात्मक फोटो)
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जब वैज्ञानिकों की टीम ने अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में बर्फ की मोटी परतों की ड्रिलिंग की और बर्फ की गहराइयों से सैंपल निकाल कर उनकी जांच की। तब 60 हजार साल पहले ज्वालामुखियों के विस्फोट की तीव्रता और मात्रा के बारे में जानकारी मिली। वहीं पिछले 2500 सालों में ऐसे विस्फोट नहीं हुए हैं।
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धरती पर फिर आ सकता है हिमयुग (प्रतीकात्मक फोटो)
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वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में अब तक 85 ज्वालामुखीय विस्फोटों के सबूत खोजे हैं, जो वैश्विक स्तर के थे। इसका मितलब ये कि इन्होंने पूरी धरती को अपनी चपेट में लिया था। वहीं इनमें से 69 ज्वालामुखी विस्फोट 1815 में इंडोनेशिया में हुए माउंट तंबोरा से कई गुना ज्यादा ताकतवर थे। इस दौरान बहुत ही अधिक मात्रा में सल्फ्यूरिक एसिड निकला था, जिसने स्ट्रैटोस्फेयर पूरा कवर हो गया था। ऐसे में सूरज की रोशनी भी धरती तक नहीं आ रही थी। इसके चलते कई सालों तक धरती पर वैश्विक सर्दी रही थी।
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धरती पर फिर आ सकता है हिमयुग (प्रतीकात्मक फोटो)
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माउंट तंबोरा विस्फोट के कारण से कई सुनामी, कई इलाकों में सूखा, तो कई इलाकों में लोग भुखमरी के शिकार हो गए थे। इसके अलावा लगभग 80 हजार लोगों की मौत हो गई थी।
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