{"_id":"5b3b798f4f1c1b86468b45d1","slug":"a-tailors-cutter-who-became-king-of-lampedusa","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"दर्जी से राजा बन गया ये शख्स, कपड़े सिलते हुए हुआ ऐसा कारनामा, हैरतअंगेज है इसकी कहानी","category":{"title":"World of Wonders","title_hn":"ऐसा भी होता है","slug":"world-of-wonders"}}
दर्जी से राजा बन गया ये शख्स, कपड़े सिलते हुए हुआ ऐसा कारनामा, हैरतअंगेज है इसकी कहानी
बीबीसी हिंदी
Updated Tue, 03 Jul 2018 07:29 PM IST
विज्ञापन
king chair
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
फ्लाइट सार्जेंट सिडनी कोहेन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके साथ कुछ ऐसा होगा। 12 जून, 1943 को जब उन्होंने माल्टा में भूमध्यसागरीय द्वीप से उड़ान भरी थी तब उन्हें अपने साथ आगे होने वाली घटनाओं का जरा भी अंदाजा नहीं था। कोहेन अनाथ थे और उन्होंने दर्जी का काम सीखा था। साल 1941 तक उन्होंने लंदन में काम किया। 20 साल की उम्र में कोहेन ब्रिटेन की रॉयल एयर फोर्स (आरएएफ) में भर्ती हो गए।
lampedusa island
लांपेडूसा पहुंचे
उन्होंने अपने नेविगेटर पीटर से पूछा कि वो किस जगह पर हैं। पीटर ने नक्शा देखा और बताया, "हम इटली के लांपेडूसा द्वीप के पास हैं और यहां 4,000 से ज्यादा सैनिक तैनात हैं।" तकरीबन 20.2 किलोमीटर में फैला यह द्वीप बेनिटो मुसोलिनी के सैनिकों से पूरी तरह घिरा हुआ था। मुसोलिनी, दूसरे विश्व युद्ध में हिटलर के सहयोगी थे। 1943 में मित्र देशों की नजर लांपेडूसा पर थी क्योंकि यह जगह सिसली पर आधिपत्य करने के लिए चलाए गए 'ऑपरेशन हस्की' के आड़े आ रहा था। यहां कोई भी बड़ा हमला करने से पहले लांपेडूसा को काबू में करना जरूरी था।
इसलिए लांपेडूसा पर लगातार हमले किए जा रहे थे, बम बरसाए जा रहे थे। इधर, कोहेन और उनके साथियों के सामने हालात बद से बदतर हो रहे थे। उनके पास सिर्फ दो विकल्प थे- विमान को समुद्र में क्रैश कराना या लांपेडूसा पर लैंड करना, ये जानते हुए कि वहां हजारों सैनिक हैं और उन्हें बंदी बना लिया जाएगा। उन्होंने दूसरा, यानी लांपेडूसा में लैंड करने का विकल्प चुना।
उन्होंने अपने नेविगेटर पीटर से पूछा कि वो किस जगह पर हैं। पीटर ने नक्शा देखा और बताया, "हम इटली के लांपेडूसा द्वीप के पास हैं और यहां 4,000 से ज्यादा सैनिक तैनात हैं।" तकरीबन 20.2 किलोमीटर में फैला यह द्वीप बेनिटो मुसोलिनी के सैनिकों से पूरी तरह घिरा हुआ था। मुसोलिनी, दूसरे विश्व युद्ध में हिटलर के सहयोगी थे। 1943 में मित्र देशों की नजर लांपेडूसा पर थी क्योंकि यह जगह सिसली पर आधिपत्य करने के लिए चलाए गए 'ऑपरेशन हस्की' के आड़े आ रहा था। यहां कोई भी बड़ा हमला करने से पहले लांपेडूसा को काबू में करना जरूरी था।
इसलिए लांपेडूसा पर लगातार हमले किए जा रहे थे, बम बरसाए जा रहे थे। इधर, कोहेन और उनके साथियों के सामने हालात बद से बदतर हो रहे थे। उनके पास सिर्फ दो विकल्प थे- विमान को समुद्र में क्रैश कराना या लांपेडूसा पर लैंड करना, ये जानते हुए कि वहां हजारों सैनिक हैं और उन्हें बंदी बना लिया जाएगा। उन्होंने दूसरा, यानी लांपेडूसा में लैंड करने का विकल्प चुना।
plane
कोहेन ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में लैंड करने के बाद की पूरी कहानी सुनाई, जो कुछ इस तरह है...
"हमने जैसे ही विमान लैंड कराया, लोगों की एक भीड़ हमसे मिलने आई।" हमने आत्मसमर्पण के लिए हाथ उठाए, लेकिन तभी हमने देखा वो लोग हाथ उठाए, सफेद कपड़े लहराते हुए चिल्ला रहे हैं, 'नहीं, नहीं...हम सरेंडर करते हैं...' ऐसा लगा कि जैसे पूरा द्वीप हमारे सामने पेश किया जा रहा हो। मैं थोड़ा शर्मिंदा हुआ, लेकिन फिर मैंने हिम्मत जुटाई और उनसे कहा कि वे हमें अपने कमांडर से मिलवाएं।
उनके कमांडर ने चट्टानों में तकरीबन 20 मीटर नीचे बनी एक जगह पर शरण ले रखी थी। एक दुभाषिये ने मुझे समझाया कि वो कमांडर के समर्पण की खबर जल्द से जल्द अधिकारियों को देना चाहते हैं। लांपेडूसा में तैनात सैनिक वहां लगातार होने वाली बमबारी से तंग हो गए थे और वो मित्र राष्ट्रों के समक्ष जल्दी से जल्दी समर्पण करना चाहते थे।
"हमने जैसे ही विमान लैंड कराया, लोगों की एक भीड़ हमसे मिलने आई।" हमने आत्मसमर्पण के लिए हाथ उठाए, लेकिन तभी हमने देखा वो लोग हाथ उठाए, सफेद कपड़े लहराते हुए चिल्ला रहे हैं, 'नहीं, नहीं...हम सरेंडर करते हैं...' ऐसा लगा कि जैसे पूरा द्वीप हमारे सामने पेश किया जा रहा हो। मैं थोड़ा शर्मिंदा हुआ, लेकिन फिर मैंने हिम्मत जुटाई और उनसे कहा कि वे हमें अपने कमांडर से मिलवाएं।
उनके कमांडर ने चट्टानों में तकरीबन 20 मीटर नीचे बनी एक जगह पर शरण ले रखी थी। एक दुभाषिये ने मुझे समझाया कि वो कमांडर के समर्पण की खबर जल्द से जल्द अधिकारियों को देना चाहते हैं। लांपेडूसा में तैनात सैनिक वहां लगातार होने वाली बमबारी से तंग हो गए थे और वो मित्र राष्ट्रों के समक्ष जल्दी से जल्दी समर्पण करना चाहते थे।
विज्ञापन
विज्ञापन
flag
वो चाहकर भी समर्पण करने का संकेत नहीं भेज पा रहे थे क्योंकि बमबारी की वजह से उनके वायरलेस कनेक्शन ने काम करना बंद कर दिया था। मैंने उनसे कहा कि वो सरेंडर करने का संदेश एक कागज पर लिखकर दें। उन्होंने कागज पर कमांडर का नाम और कुछ लिखकर मुझे दिया, जो मैं समझ नहीं पाया।
इसके साथ ही कमांडर ने पूरा लांपेडूसा द्वीप सार्जेंट कोहेन को सौंप दिया। मैंने उनसे कहा कि वो मुझे प्लेन पर ले जाएं, लेकिन वहां मदद के लिए कोई तैयार नहीं था क्योंकि अगले कुछ मिनटों में बमबारी हो सकती थी और सभी लोग छिपकर जान बचाए हुए थे। हालांकि द्वीप पर मौजूद लोगों के पास पर्याप्त ईंधन था और उन्होंने कोहेन को ईंधन दे दिया, लेकिन लांपेडूसा पर लैंड करना जितना नाटकीय था, वहां से टेक ऑफ करना भी लगभग उतना ही मुश्किल।
इसके साथ ही कमांडर ने पूरा लांपेडूसा द्वीप सार्जेंट कोहेन को सौंप दिया। मैंने उनसे कहा कि वो मुझे प्लेन पर ले जाएं, लेकिन वहां मदद के लिए कोई तैयार नहीं था क्योंकि अगले कुछ मिनटों में बमबारी हो सकती थी और सभी लोग छिपकर जान बचाए हुए थे। हालांकि द्वीप पर मौजूद लोगों के पास पर्याप्त ईंधन था और उन्होंने कोहेन को ईंधन दे दिया, लेकिन लांपेडूसा पर लैंड करना जितना नाटकीय था, वहां से टेक ऑफ करना भी लगभग उतना ही मुश्किल।
विज्ञापन
lampedusa
लांपेडूसा पर नियंत्रण बड़ी उपलब्धि
हम किसी तरह से प्लेन पर वापस पहुंचे और जैसे ही मैं उसे स्टार्ट करने वाला था, चार युद्धक विमानों ने हम पर फायरिंग करनी शुरू कर दी। जान बचाने के लिए हमें नीचे कूदना पड़ा और चमत्कारिक रूप से हमें कोई चोट नहीं आई थी। ऐसा चार बार हुआ। आखिरकार हम उड़ान भरने में सफल हुए और अपने माल्टाई ठिकाने पर उतरे। वहां जाकर कोहेन ने अपने अधिकारियों को वो कागज सौंपा जिसमें सरेंडर करने की बात कही गई थी।
उस वक्त ब्रिटेन की हालत बहुत खराब थी और उसे हर रोज नाजी आक्रमण का डर रहता था। ऐसे में लांपेडूसा उसके हाथ में आना एक बड़ी उपलब्धि थी।
अगले दिन ब्रिटिश अखबारों ने पहले पन्ने पर कोहन के बहादुरी भरे कारनामे की कहानी छापी। एक अखबार ने खबर की हेडिंग में उन्हें 'लांपेडूसा का राजा' बताया।
लांपेडूसा के गवर्नर ने 13 जून की सुबह आर्मी और नौसेना के सामने औपचारिक रूप से समर्पण किया। सार्जेंट कोहेन विश्व युद्ध की समाप्ति तक आरएएफ में काम करते रहे। 26 अगस्त 1946 को जब वो वापस लौट रहे थे, उनका विमान लापता हो गया और फिर उनके बारे में कुछ पता नहीं लग सका।
हम किसी तरह से प्लेन पर वापस पहुंचे और जैसे ही मैं उसे स्टार्ट करने वाला था, चार युद्धक विमानों ने हम पर फायरिंग करनी शुरू कर दी। जान बचाने के लिए हमें नीचे कूदना पड़ा और चमत्कारिक रूप से हमें कोई चोट नहीं आई थी। ऐसा चार बार हुआ। आखिरकार हम उड़ान भरने में सफल हुए और अपने माल्टाई ठिकाने पर उतरे। वहां जाकर कोहेन ने अपने अधिकारियों को वो कागज सौंपा जिसमें सरेंडर करने की बात कही गई थी।
उस वक्त ब्रिटेन की हालत बहुत खराब थी और उसे हर रोज नाजी आक्रमण का डर रहता था। ऐसे में लांपेडूसा उसके हाथ में आना एक बड़ी उपलब्धि थी।
अगले दिन ब्रिटिश अखबारों ने पहले पन्ने पर कोहन के बहादुरी भरे कारनामे की कहानी छापी। एक अखबार ने खबर की हेडिंग में उन्हें 'लांपेडूसा का राजा' बताया।
लांपेडूसा के गवर्नर ने 13 जून की सुबह आर्मी और नौसेना के सामने औपचारिक रूप से समर्पण किया। सार्जेंट कोहेन विश्व युद्ध की समाप्ति तक आरएएफ में काम करते रहे। 26 अगस्त 1946 को जब वो वापस लौट रहे थे, उनका विमान लापता हो गया और फिर उनके बारे में कुछ पता नहीं लग सका।