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छह साल की मेहनत रंग लाई, कैंसर पर अब अधिक असर करेंगी दवाएं, पीयू के शोधार्थियों को मिली सफलता

सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Sat, 31 Oct 2020 04:46 PM IST
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Drugs will now have more effect on breast and liver cancer
सांकेतिक तस्वीर।

स्तन और लीवर कैंसर के रोगियों पर अब दवाएं अधिक प्रभावी होंगी। यह सफलता पंजाब विश्वविद्यालय के फार्मास्युटिकल विभाग के शोधार्थियों को शोध में मिली है। पीयू के सीनियर प्रोफेसर भूपिंदर सिंह भूप के निर्देशन में छह साल तक चले इस शोध के बड़े अच्छे परिणाम आए हैं। कैंसर में प्रयोग की जाने वाली दवाओं का असर शरीर पर 0.003 फीसदी पड़ रहा था, अब रिसर्च के जरिए यह बढ़कर 0.027 फीसदी तक पहुंच गया। एक दवा का असर तो 60 फीसदी तक पहुंचा है। नैनो फॉर्मूले के जरिए एनिमल स्टडी पूरी हो गई है। अब फार्मा इंडस्ट्री इस फॉर्मूले के जरिए अपना कार्य आगे बढ़ा सकती हैं। इन दवाओं से शरीर पर भी कम नुकसान होगा। 

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पंजाब विश्वविद्यालय।

टीनू शर्मा ने इस तरह किया रिसर्च
पीयू के फार्मास्युटिकल विभाग की शोधार्थी टीनू शर्मा ने स्तन कैंसर व लीवर कैंसर पर शोध किया। कृष्णकमल पौधे के फूल से निकलने वाले केमिकल क्राइसिम पर काम किया। यह क्राइसिम ब्रेस्ट कैंसर पर काबू पाने का काम करता है लेकिन इसका प्रभाव शरीर पर महज 0.003 फीसदी ही होता है जो बहुत कम है। 

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- फोटो : अमर उजाला

टीनू ने इसके लिए नैनो फॉर्मूला तैयार किया और इस क्राइसिम के प्रभाव को रिसर्च के जरिए बढ़ाकर 0.027 फीसदी कर दिया यानी नौ गुना क्राइसिम स्तन कैंसर पर काम करेगा। इससे कैंसर की रोकथाम जल्दी होगी। इसी तरह टीनू ने लीवर कैंसर के लिए प्रयोग की जा रही दवा सोराफेम्ब पर शोध किया। यह दवा शरीर पर 8 फीसदी ही प्रभाव डाल रही थी। नैनो फॉर्मूले के जरिए उन्होंने इस दवा का प्रभाव शरीर में 40 से लेकर 60 फीसदी तक कर दिया। 

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कैंसर - फोटो : डेमो

अतुल जैन को इस तरह मिली सफलता
इसी तरह शोधार्थी अतुल जैन ने ब्रेस्ट कैंसर में प्रयोग हो रही दवा रिलोक्सीफिन व मेथोटेरेक्स दवा का प्रभाव अपने रिसर्च से बढ़ाया है। रिलोक्सीफिन शरीर में केवल दो फीसदी ही जा पाती थी। नैनो फॉर्मूले से अब इसका असर चार गुना बढ़ गया। वहीं मेथोटेरेक्स दवा का प्रभाव 30 से बढ़कर 90 फीसदी तक हो गया। 

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फाइल फोटो।

प्रो.भूपिंदर सिंह भूप कहते हैं कि इस रिसर्च में लगभग छह साल लगे हैं। बड़े परिणाम सामने आए हैं। कैंसर की दवाओं का प्रभाव शरीर पर इस फॉर्मूले से अधिक होगा। साथ ही नुकसान भी कम से कम होंगे। बड़ी बात यह है कि लॉकडाउन के दौरान इन शोधार्थियों ने अपनी थिसिस लिखी और फाइनल किया। यह अपने में बड़ी सफलता है। लॉकडाउन के दौरान प्रो. भूप के 19 रिसर्च पेपर प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हुए।

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