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शहीदी दिवस: भगत सिंह से जुड़े वो 8 सच, न कभी सुने होंगे न कहीं पढ़ें होंगे

Fri, 23 Mar 2018 09:51 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, चंडीगढ़
टीम डिजिटल/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Fri, 23 Mar 2018 09:51 AM IST
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Martyrs' Day 23 March 1931, secrets of shaheed-e-azam bhagat singh
भगत सिंह
शहीदी दिवस पर हम आपको भगत सिंह उनकी निजी जिंदगी से जुड़े कई ऐसे सच बता रहे हैं, जो न कभी किसी ने सुने होंगे और न ही कहीं पढ़े होंगे।
Martyrs' Day 23 March 1931, secrets of shaheed-e-azam bhagat singh
भगत सिंह
आठ वर्ष की खेलने की उम्र में जब बच्चों को खिलौनों का शौक होता है, भगत सिंह अपने पिता से पूछते थे कि अंग्रेजों को भगाने के लिए क्यों न खेतों में पिस्तौले उगा ली जाएं। पिस्तौलों की जो फसल उगेगी उससे अंग्रेजों को आसानी से भारत से भगाया जा सकेगा। उस दौर में पंजाब में अराजकता का माहौल था। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग की घटना हुई तो उस समय भगत सिंह मात्र 12 वर्ष के थे। 10 मिनट की गोलीबारी में 379 लोगों की मौत हुई और 2000 के करीब घायल हुए। हालांकि कुछ लोगों ने मृतकों की संख्या 1000 से अधिक बताई। वे महात्मा गांधी का सम्मान तो बहुत करते थे लेकिन उनकी अहिंसा वाली पद्धति से बहुत निराश थे।
Martyrs' Day 23 March 1931, secrets of shaheed-e-azam bhagat singh
bhagat singh
1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए हो रहे प्रदर्शन पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गयी। इस का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को करीब सवा चार बजे, एएसपी सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सिर में मारी। इसके बाद भगत सिंह ने 3-4 गोली दाग दीं। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चनन सिंह ने इनका पीछा शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया - "आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।" नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया।
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Martyrs' Day 23 March 1931, secrets of shaheed-e-azam bhagat singh
भगत सिंह
भगत सिंह का पैतृक गांव खटकड़कलां है, इनकी पढ़ाई लाहौर के डीएवी हाई स्कूल में हुई। वे कई भाषाओं के धनी थे। अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू के अलावा पंजाबी पर भी उनकी खास पकड़ थी। कालेज में भगत सिंह ने इंडियन नेशनल यूथ आर्गेनाइजेशन का गठन किया। अच्छे थियेटर आर्टिस्ट के साथ-साथ उनका शैक्षणिक रिकार्ड भी बढ़िया रहा। स्टेज पर उनका प्रदर्शन राणा प्रताप, सम्राट चंद्रगुप्त और भारत की दुर्दशा दिखाता हुआ होता था। बाद में भगत सिंह ने अपनी थियेटर की कलाओं को भारतीयों के बीच देशभक्ति की भावनाएं जगाने में किया। भगत सिंह ने एक क्रांतिकारी लेखक का भी रोल अदा किया।
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Martyrs' Day 23 March 1931, secrets of shaheed-e-azam bhagat singh
bhagat singh - फोटो : अमर उजाला
शहीद भगत सिंह का फिरोजपुर से गहरा रिश्ता था। यह ठिकाना क्रांतिकारी डॉ. गया प्रसाद ने किराए पर ले रखा था। इसके नीचे केमिस्ट की दुकान थी और ऊपर क्रांतिकारियों का ठिकाना। यहां भगत सिंह, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद के अलावा अन्य क्रांतिकारियों का भी आना जाना था। यह ठिकाना पार्टी की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया था। क्रांतिकारी पंजाब से दिल्ली, कानपुर, लखनऊ और आगरा आने जाने के लिए फिरोजपुर में बने इस ठिकाने पर आकर अपनी पहचान बदलते थे, फिर ट्रेनों में यात्रा करते थे। बम बनाने का सामान जुटाने के लिए क्रांतिकारी डॉ. निगम को यहां पर केमिस्ट की दुकान खुलवाई थी। क्रांतिकारियों का गुप्त ठिकाना 10 अगस्त 1928 से लेकर 4 फरवरी 1929 तक रहा। लाहौर में 17 दिसंबर 1928 को सहायक सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस सांडरस व हेड कांस्टेबल चानन सिंह की हत्या कर दी थी, जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद समेत कई क्रांतिकारी शामिल थे।
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