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14 सितंबर से श्राद्ध, जानिए किस तारीख को कौन-सा और ये एक काम करेंगे तो प्रसन्न होंगे पूर्वज
नीरज कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Wed, 11 Sep 2019 09:09 AM IST
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श्राद्ध
14 सितंबर से श्राद्ध शुरू होने जा रहे हैं। जानिए किस तारीख को कौन-सा है। ज्योतिषियों के अनुसार, अगर लोग श्राद्ध करते हुए एक काम करेंगे तो निश्चित ही पूर्वज प्रसन्न होंगे।
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श्राद्ध
- फोटो : फाइल फोटो
आश्विन कृष्ण पक्ष श्राद्ध पक्ष और पितृपक्ष कहलाता है। इस दौरान मृत्यु प्राप्त व्यक्तिों की मृत्युतिथियों के अनुसार इस पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध दो प्रकार के होते हैं। पार्वण श्राद्ध और एकोदिष्ट श्राद्ध। आश्विन कृष्ण के पितृपक्ष में किया जानेवाले श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। पार्वण श्राद्ध अपहारण में मृत्यु तिथि के दिन किया जाता है। यह बात सेक्टर-30 के श्री महाकाली मंदिर स्थित भृगु ज्योतिष केंद्र के प्रमुख पंडित वीरेंद्र नारायण मिश्र ने कही।
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श्राद्ध
- फोटो : फाइल फोटो
प्रौष्ठपदी श्राद्ध
उन्होंने बताया कि साल में मृत्यु तिथि पर मास पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध को एकोदिष्ट श्राद्ध कहते हैं। एकोदिष्ट श्राद्ध हमेशा मध्याह्न में किया जाता है। पूर्वजों को श्रद्धासुमन अर्पित करने का महापर्व है पितृपक्ष का श्राद्ध। जो श्रद्धा से किया जाए उसे श्राद्ध कहा जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक के समय को श्राद्ध कहते हैं। देवालय पूजक परिषद के कोषाध्यक्ष और सेक्टर-18 के श्री राधा कृष्ण मंदिर के पुजारी डॉ. लाल बहादुर दुबे ने बताया कि धर्म शास्त्र कहते हैं कि पितरों को पिंडदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, यश को प्राप्त करने वाला होता है। पितरों की कृपा से सब प्रकार की समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पितृपक्ष में पितरों को आस रहती है कि हमारे पुत्र पौत्र पिंड दान करके हमें संतुष्ट कर देंगे। इसी आस से पितृलोक से पितर पृथ्वी पर आते हैं। मृत्यु तिथि के दिन किए श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है।
उन्होंने बताया कि साल में मृत्यु तिथि पर मास पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध को एकोदिष्ट श्राद्ध कहते हैं। एकोदिष्ट श्राद्ध हमेशा मध्याह्न में किया जाता है। पूर्वजों को श्रद्धासुमन अर्पित करने का महापर्व है पितृपक्ष का श्राद्ध। जो श्रद्धा से किया जाए उसे श्राद्ध कहा जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक के समय को श्राद्ध कहते हैं। देवालय पूजक परिषद के कोषाध्यक्ष और सेक्टर-18 के श्री राधा कृष्ण मंदिर के पुजारी डॉ. लाल बहादुर दुबे ने बताया कि धर्म शास्त्र कहते हैं कि पितरों को पिंडदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, यश को प्राप्त करने वाला होता है। पितरों की कृपा से सब प्रकार की समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पितृपक्ष में पितरों को आस रहती है कि हमारे पुत्र पौत्र पिंड दान करके हमें संतुष्ट कर देंगे। इसी आस से पितृलोक से पितर पृथ्वी पर आते हैं। मृत्यु तिथि के दिन किए श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है।
श्राद्ध
- फोटो : फाइल फोटो
प्रतिपदा का श्राद्ध
जिनकी मृत्यु तिथि प्रतिपदा को हुई हो तो उनका श्राद्ध अपराह्न व्यापिनी आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा को किया जाता है। इस वर्ष यह प्रतिपदा 14 सितंबर को अपराह्न व्यापिनी है, इसलिए इस वर्ष प्रतिपदा का श्राद्ध 14 सितंबर को होगा।
द्वादशी का श्राद्ध
आश्विन कृष्ण द्वादशी 25 सितंबर को ही अपराह्न व्यापिनी है, इसलिए द्वादशी का श्राद्ध भी इसी दिन होगा।
जिनकी मृत्यु तिथि प्रतिपदा को हुई हो तो उनका श्राद्ध अपराह्न व्यापिनी आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा को किया जाता है। इस वर्ष यह प्रतिपदा 14 सितंबर को अपराह्न व्यापिनी है, इसलिए इस वर्ष प्रतिपदा का श्राद्ध 14 सितंबर को होगा।
द्वादशी का श्राद्ध
आश्विन कृष्ण द्वादशी 25 सितंबर को ही अपराह्न व्यापिनी है, इसलिए द्वादशी का श्राद्ध भी इसी दिन होगा।
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श्राद्ध
सन्यासियों का श्राद्ध
सन्यासियों का श्राद्ध पार्वण पद्धति से द्वादशी में किया जाता है। भले ही इनकी मृत्यु की तिथि कोई भी क्यों न हो।
अकाल मृत्यु वालों का श्राद्ध
वाहन दुर्घटना, सांप के काटने से, विष के खाने से, अकाल मृत्यु के कारण जिसकी मृत्यु हुई हो, उसका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में करना चाहिए। चतुर्दशी तिथि में मरने वालों का श्राद्ध चतुर्दशी में नहीं करना चाहिए। इसका श्राद्ध त्रयोदशी या अमावस्या को करनी चाहिए। जिसे किसी की मृत्यु की तिथि का ज्ञान न हो उसका श्राद्ध अमावस्या को करना चाहिए।
सन्यासियों का श्राद्ध पार्वण पद्धति से द्वादशी में किया जाता है। भले ही इनकी मृत्यु की तिथि कोई भी क्यों न हो।
अकाल मृत्यु वालों का श्राद्ध
वाहन दुर्घटना, सांप के काटने से, विष के खाने से, अकाल मृत्यु के कारण जिसकी मृत्यु हुई हो, उसका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में करना चाहिए। चतुर्दशी तिथि में मरने वालों का श्राद्ध चतुर्दशी में नहीं करना चाहिए। इसका श्राद्ध त्रयोदशी या अमावस्या को करनी चाहिए। जिसे किसी की मृत्यु की तिथि का ज्ञान न हो उसका श्राद्ध अमावस्या को करना चाहिए।
