जानिए उस पिंक गेंद के बारे में, जिसे देखने के लिए ईडन गार्डन में मेला लगने जा रहा है
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पहली पिंक बॉल
पहली गुलाबी गेंद का निर्माण ऑस्ट्रेलिया की बॉल मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी कूकाबूरा ने किया था। कूकाबूरा ने कई साल तक इस नई पिंक बॉल को लेकर परीक्षण किया तब जाकर एक बेहतरीन गुलाबी गेंद बन पाई। पहली पिंक बॉल तो 10 साल पहले बन गई थी, मगर इसकी टेस्टिंग करते-करते पांच-छह साल और लग गए। आखिरकार 2015 में एडिलेड में ऑस्ट्रेलिया बनाम न्यूजीलैंड के बीच खेले गए पहले डे-नाइट टेस्ट में पिंक बॉल से खेला गया। इसके बाद से इस नई गेंद का सफर बढ़ चला।
गुलाबी रंग ही क्यों?
टेस्ट क्रिकेट सफेद जर्सी में खेला जाता है, तो इसलिए उसमें लाल रंग की गेंद का इस्तेमाल होता है, ताकि गेंद आसानी से नजर आए। उसी तरह वन-डे रंगीन कपड़ों में होता है, ऐसे में उसमें सफेद गेंद इस्तेमाल होती है। अब डे-नाइट टेस्ट में गुलाबी रंग की गेंद का ही क्यों इस्तेमाल होता है, यह सवाल तमाम क्रिकेट फैंस के जेहन में उभर रहा होगा।
इस पिंक के पीछे की वजह बताई थी कूकाबूरा कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर ब्रेट एलियट ने, एलियट ने कहा था कि शुरुआत में हमने कई तरह के रंगों का इस्तेमाल किया, जैसे कि येलो और ऑरेंज, लेकिन इन रंगों की गेंदों में सबसे बड़ी समस्या थी कि, यह कैमरा फ्रेंडली नहीं थी। दरअसल मैच कवर कर रहे कैमरामैन ने अपनी परेशानी जाहिर करते हुए कहा था कि ऑरेंज कलर को कैमरा के लिए कैप्चर कर पाना काफी मुश्किल होता है, यह गेंद दिखाई नहीं देती। इसके बाद सबकी सहमति से पिंक कलर को चुना गया।
वन-डे वाली सफेद क्यों नहीं ?
वन-डे में दो नई गेंदें इस्तेमाल की जाती हैं। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह ये है कि सफेद गेंद का रंग जल्दी नहीं खराब हो और दूधिया रोशनी में इसे आसानी से देखा जा सके। वहीं टेस्ट क्रिकेट में लगातार 80 ओवर का मैच होने के बाद ही गेंद बदली जाती है। वन-डे की एक पारी के बाद ही सफेद गेंद का रंग भूरा पड़ने लगता है, वहीं 80 ओवर्स तक तो इसका रंग गहरा भूरा हो जाएगा और पिच भी भूरी होती है।
यानी बल्लेबाजों को नहीं बल्कि फील्डर्स को भी इससे खासी परेशानी होगी। इसके साथ ही टेस्ट भले ही डे-नाइट हो रहा है, लेकिन खिलाड़ियों के कपड़ों का रंग सफेद ही रहेगा। यानी सफेद गेंद से इस टेस्ट के खेले जाने का कोई भी सवाल नहीं पैदा होता।
16 तरह के पिंक शेड्स में चुना गया एक
एक बार गुलाबी रंग पर मुहर लगने के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी कि पिंक में भी कैसा पिंक कलर होगा। इसके लिए करीब पिंक के 16 शेड्स ट्राई किए गए। एलियट बताते हैं, 'हमने 16 तरह के पिंक कलर का परीक्षण किया और हर बार उसमें बदलाव देखने को मिला। अंत में एक आयडल शेड को सलेक्ट किया गया जिसकी बनी गेंद अब डे-नाइट टेस्ट मैच में इस्तेमाल होती है।
रंग के फाइनल हो जाने के बाद कंपनी के समाने बड़ी समस्या ये थी कि इसकी सिलाई किस रंग के धागे से की जाए। इसके लिए भी तमाम प्रयोग किए गए। कूकाबूरा कंपनी ने पिंक बॉल की सिलाई सबसे पहले काले रंग के धागे से की थी। इसके बाद हरा रंग इस्तेमाल हुआ, फिर सफेद कलर के धागे का प्रयोग हुआ। अंत में हरे रंग की सिलाई पर सबकी सहमति बनी, लेकिन टीम इंडिया जिस कंपनी की बनाई गुलाबी गेंद से खेलेगी उसकी सिलाई काले रंग के धागे से हुई है।