गणपति को पाना है तो मन का अंधकार मिटना पड़ता है। प्रथम पूज्य भगवान गणेश इस सकल ब्रह्मांड की ऊर्जा हैं। यह चराचर उन्हीं की ऊर्जा से संचालित हो रहा है।
गणेश चतुर्थी 2018: इस पावन जगह पर जन्मे भगवान श्रीगणेश, यहां आकर मिलता है असीम पुण्य
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श्रीगणेश उत्तराखंड की इसी पावन भूमि पर जन्मे। वास्तव में इस ब्रह्मांड की स्थापना विष्णु के निर्देश पर ब्रह्मा ने की। पौराणिक आख्यानों के अनुसार ब्रह्मांड को ऊर्जा श्रीगणेश से मिली। उन्हीं की ऊर्जा से यह जगत शक्ति सूत्र में बंधा हुआ है। अज्ञान का आवरण मिटते ही गणपति का दर्शन हो जाता है।
शिव को पाने के लिए कनखल के राजा दक्ष की पुत्री सती ने दूसरा जन्म हिमालय पुत्री पार्वती के रूप में लिया था। उन्होंने हरिद्वार के बिल्वकेश्वर के समीप गौरीकुंड में शिव को पाने के लिए तपस्या की। आज तृतीया के दिन मां गौरी का उत्सव पूरे देश में मनाया गया। इसे गौरा तीज कहा जाता है। शिव और पार्वती के विवाह के बाद श्रीगणेश का जन्म उत्तराखंड की इसी पावन भूमि पर पार्वती के मैल से हुआ था।
श्रीगणेश वास्तव में शिव और पार्वती के मिलन से उत्पन हुए गर्भ पुत्र नहीं हैं। शिव पुराण में पार्वती के जिस मैल का वर्णन है, वह वास्तव में स्त्री के कर्म शक्ति का प्रतीक है। शिवोत्सव के बाद महोत्सव की धूल पार्वती के शरीर पर चढ़ गई थी। उसी धूल ने गणेश का आकार ग्रहण किया। भगवान शिव ने अनजाने में अपने पुत्र गणेश का सिर युद्ध के बाद धड़ से अलग कर दिया था। पार्वती से यह पता चलने पर कि गणेश तो शिव के ही पुत्र हैं, शिव ने हाथी का सिर गणेश के धड़ पर लगाकर उन्हें पुर्नजन्म दिया।
देवताओं के बीच जब यह संघर्ष चला देवों में प्रथम पूज्य कौन है, तब ब्रह्मा ने निर्णय दिया कि जो भी पहले इस ब्रह्मांड की परिक्रमा कर लेगा, वही प्रथम पूज्य माना जाएगा। सभी देव अपने-अपने वाहनों पर परिक्रमा के लिए निकले। ज्ञान के धनी श्रीगणेश का वाहन मूशक था। वे जानते थे कि इस छोटे से वाहन पर वे ब्रह्मांड की परिक्रमा नहीं कर सकते।