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फख्र भी, फिक्र भी: फौजियों की मांएं... जिनकी दुआओं से मजबूत हैं देश की सीमाएं, हर पल इम्तिहान में उनका दिल
ज्योति सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Vijay Singh Pundir
Updated Sat, 09 May 2026 09:45 AM IST
सार
देश की सरहदों पर तैनात वीर जवानों के पीछे उनकी मांओं का अटूट साहस और त्याग खड़ा है। हर पल बेटे की सलामती की चिंता के बावजूद ये मांएं गर्व के साथ देशभक्ति की मिसाल बनकर जीती हैं।
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वीर माताओं को सलाम
- फोटो : अमर उजाला
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जैसे ही फोन की घंटी बजती है धड़कन अपने आप तेज हो जाती है एक पल में आशंका और खुशी दोनों भाव मन में आते हैं। दौड़कर फोन के पास जाती हूं और कांपते हाथों से फोन उठाती हूं। उधर से हेलो मां... सुनते ही चेहरे पर मुस्कान लौट आती है और सारी चिंताएं छू मंतर हो जाती हैं। सीमा पर तनाव होने की स्थिति में यह दिन हर फौजी की मां के लिए आम है। हमे भले ही एक खबर लग रही हो लेकिन आप खुद को उस जगह रखकर देखिए कि आपका बेटा सीमा पर सवा सौ करोड़ भारतीयों की रक्षा के लिए सीना ताने खड़ा है। यह बातें उन मांओं ने बताईं, जिनके लिए फक्र और फिक्र से रोज मुलाकात होती है।
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रूपम सिंह, बेटा-विजय
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पापा के फौजी जूते पहनकर ‘जय हिंद साब’ बोलता था
रूपम सिंह बताती हैं, कि उनका बेटा विजय (बदला हुआ नाम) बचपन से ही फौज में जाना चाहता था। उनके पति भी कर्नल रह चुके हैं। जब विजय के पापा यूनिफॉर्म बदलते थे, तो वह उनके जूते पहनकर छोटे-छोटे कदमों से घर में घूमता और जय हिंद साब, जय हिंद साब बोलता था। कई बार देश में युद्ध जैसी स्थिति बनी, तो वह बिना बताए ऑपरेशन में शामिल हो गया। बाद में बताता था, ताकि मैं घबराऊं नहीं। पता ही नहीं चला कि वह कब इतना समझदार हो गया। उन्होंने बताया कि विजय ने मल्टीनेशनल कंपनी की प्लेसमेंट छोड़कर भारतीय वायुसेना जॉइन की। आज वह ट्रांसपोर्ट पायलट है। -रूपम सिंह, बेटा-विजय (ट्रांसपोर्ट पायलट, भारतीय वायुसेना)
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हंसी देवी
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त्योहारों पर सबसे ज्यादा बेटों की कमी खलती है
हंसी देवी के दोनों बेटे सेना में हैं। उनके पति भी पहले सेना में सेवा दे चुके हैं। वो कहती हैं, जब बड़े बेटे ने फौज जॉइन की, तो डर भी लगा था और गर्व भी हुआ। बाद में छोटा बेटा भी फौज में चला गया। उत्तराखंड में फौज में जाना सम्मान की बात मानी जाती है। वह आगे कहती हैं, कि त्योहार उनके लिए सबसे भावुक समय होता है। होली-दिवाली पर जब दूसरे बच्चों को घर आते देखती हूं, तब अपने बेटों की बहुत याद आती है। -हंसी देवी, (बेटा-रविन्द्र और चंदन, भारतीय थल सेना)
डर स्वाभाविक है, लेकिन सबसे ज्यादा गर्व होता है
शीखा मुखर्जी कहती हैं, बेटा फौज में है, इस बात का डर होना किसी भी मां के लिए स्वाभाविक है। लेकिन धीरे-धीरे इन सब की जैसे आदत सी हो गई हो। आदत यानी देश सेवा की आदत। शुरु से ही मेरा परिवार एक फौजियों का परिवार रहा है। उन्होंने बताया, कि उनके पिता सूबेदार मेजर थे, पति कैप्टन रहे, बेटा वर्तमान में कर्नल है और बेटी भी सेना में रह चुकी हैं। -शीखा मुखर्जी, (बेटी- कैप्टन सुमिता और बेटा-कर्नल शांतनु, भारतीय थल सेना)
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संतोष देवी
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उसका एक फोन सारी चिंता दूर कर देता है
संतोष देवी के दोनों बेटे देश सेवा में हैं । एक भारतीय जल सेना में और दूसरा पैरामिलिट्री में। वह कहती हैं, जब उनका फोन आता है और कुछ सेकंड तक उधर से आवाज नहीं आती, तो लगता है जैसे सांसें थम गई हों। लेकिन मेरा बेटा हर मुश्किल को ऐसे सुनाता है जैसे कोई फिल्मी किस्सा हो। उसे पता है कि मुझे उसकी चिंता होती है, इसलिए वह हर खतरे को आसान बनाकर बताता है। -संतोष देवी, बेटा- अजीत तोमर (भारतीय जल सेना) और रोहित तोमर (पैरामिलिट्री)
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