बढती मंदी और मंहगाई का असर दुनिया के कई बड़े शहरों में देखा जा सकता है। विश्व भर के चुनिंदा सबसे महंगे लेकिन आलीशान शहरों में शुमार लंदन, हांगकांग, म्युनिख और टोक्यों में प्रतिमाह कमरे के किराए की कीमतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि लोग यहां बाथरूम में सोने को मजबूर हैं। ताजा रिपोर्टों के अनुसार लंदन में 27 स्कवैयर मीटर के एक कमरे के फ्लैट का प्रतिमाह किराया 1500 पाउंड है जो कि भारतीय मुद्रा में लगभग 1 लाख 39 हजार रुपये के बराबर है।
दुनिया के वो देश जहां बाथरूम में सोने को मजबूर हो रहे हैं लोग
लंदन में हालात इतने बदतर हैं कि शहर में लोग शादी करने के बाद शिशुओं को जन्म देने से कतरा रहे हैं। क्योंकि जितना बड़ा परिवार होगा लोगों को महंगाई का बोझ भी उतना ही ज्यादा सहन करना पड़ेगा। लंदन के मेयर ने हालातो पर चिता जताते हुए कहा है बढ़ता हुआ किराया लोगों को मानसिक बीमारियां दे रहा है। लोग अपने परिवार के साथ वक्त नहीं बिता पा रहे हैं। कभी बड़े मकानों में रहने वाले बहुत से लोगों के लिए अब सड़कों पर रहने की नौबत आ गई है। लंदन शहर की बड़ी आबादी अपनी आय का 37 प्रतिशत किराए में दे रही है।
लंदन की तरह ही जर्मनी के म्युनिख और बर्लिन में भी किराए के घर की कीमतों में तेजी से उछाल आया है। जिससे आहत होकर लोग पिछले कई महीनों से म्यूनिख, बर्लिन और फ्रैंकफर्ट में बढ़ते हुए किराए के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनों को देखते हुए बर्लिन डिपार्टमेंट फॉर अर्बन डेवलपमेंट एंड हाउसिंग ने किराए की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने का अनोखा तरीका निकाला है। इसी हफ्ते बर्लिन जर्मनी का ऐसा पहला शहर बन गया है जहां किराए की कीमत अगले 5 सालों के लिए फिक्स हो चुकी है। किराए के घरों पर अगले 5 सालों के लिए लगाम कसने से एक ओर किराएदारों की जमात खुश है तो दूसरी ओर रीयल इस्टेट कारोबारी और प्रॉपर्टी से जुड़े व्यवसायी सरकार के इस फैसले से नाराज हैं।
रीयल इस्टेट कारोबारियों के गुस्से पर तर्क देते हुए फाइनेंस मिनिस्टर ओलफ सोल्ज ने कहा कि किराए की कीमतों पर लगाम लगाई गई है क्योंकि बर्लिन लंदन जैसा नहीं बनना चाहता है। वहां हालात इतने खराब है कि डॉक्टर और वकील भी फ्लैटमेट के साथ रहने को मजबूर हैं। यहां ये भी जानना मजेदार है कि बर्लिन में बड़ी आबादी पूरी जिंदगी सिर्फ किराए के मकानों में बिता देती है। अन्य देशों से मुकाबले यहां खुद का मकान खरीदने का चलन बहुत कम है।
लंदन, म्युनिख और बर्लिन ही ऐसे शहर नहीं हैं जहां बढ़ती महंगाई में लोग ऐसे गुजर बसर कर रहे हों। हांगकांग लंदन से कहीं आगे हैं। यहां जगह की कमी इतनी बढ़ चुकी है कि यहां लोग लकड़ी के ताबूतनुमा घरों में रहने को मजबूर हैं।बक्सेनुमा इन घरों में किचन और टॉयलेट एक साथ होते हैं जो काफी छोटे होते हैं। लोग इन्हें लकड़ी या फिर तारों को जोड़कर बना लेते हैं। 15 स्क्वैयर फीट के लकड़ी के ये बॉक्स ताबूत की शक्ल के होने के कारण कॉफिन क्यूबिकल भी कहलाने लगे हैं। रिपोर्टों की मानें तो हांगकांग कि एक बड़ी आबादी इन्हीं कॉफिन क्यूबिकल्स में गुजारा कर रही है।
