भोजपुरी सिनेमा देश की ऐसी इकलौती फिल्म इंडस्ट्री है जिसके दर्शक सारी बोलियों और भाषाओं से सबसे ज्यादा है। विदेश तक में इसका असर है। यूट्यूब पर गाने इसके हिंदी सिनेमा से भी ज्यादा देखे जा रहे हैं। भोजपुरी सिनेमा में काम करने वाले मंचीय गायकों की शोहरत इतनी बढ़ी कि वह अब संसद तक पहुंच चुके हैं। लेकिन, भोजपुरी सिनेमा का हाल बहुत ज्यादा खराब हो चुका है। सिर्फ बीते डेढ दशक में भोजपुरी सिनेमा ने अपना पुनरुत्थान भी देख लिया और पूरी तरह अपना अस्तित्व सिमटते भी। हालत ये है कि अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, मिथुन चक्रवर्ती, हेमा मालिनी जैसे सितारों को लेकर भोजपुरी फिल्में बना चुके निर्माता अब इसका नाम तक लेने से चिढ़ते हैं। वजह? भोजपुरी के कारोबार में पारदर्शिता का अभाव, बिहार के वितरकों की अपने राज्य में दबंगई और बिहार की किसी भी सरकार का इस मामले में कभी कोई दखल नहीं देना। हमने भोजपुरी के कुछ दिग्गज फिल्म निर्माताओं से बात करके इन्हीं सारी दिक्कतों की पड़ताल करने की कोशिश की, आइए समझते हैं..
Bhojpuri EXCLUSIVE 2: 15 साल में यूं सिमट गई भोजपुरी इंडस्ट्री, निर्माताओं का दर्द पढ़कर कलेजा मुंह को आ जाएगा
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भाभी पर देवर का हक समझने वाली मानसिकता
अब सांसद बन चुके मनोज तिवारी कभी क्षेत्रीय टीवी चैनलों पर कार्यक्रम करते थे। माता की भेंटें गाते थे और टी सीरीज के दफ्तर की कैंटीन में उनसे मिलने वाले उनके किस्से आज भी बड़े चाव से सुनाते रहते हैं। फिल्म 'ससुरा बड़ा पइसावाला' ने भोजपुरी सिनेमा का पुनर्त्थान किया तो लोगों को लगा कि अब मामला सेट हो जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, क्यों वजह निर्माता बी एन तिवारी बताते हैं। वह कहते हैं, 'मैंने ‘हमरी भी आवेगी बरात', 'हनुमान भक्त हवलदार', 'देवर भाभी', 'सैंया चितचोर' जैसी भोजपुरी फिल्में बनाईं। भाभी को हमारे यहां मां का दर्जा दिया जाता है। जब मैंने फिल्म 'देवर भाभी' बिहार के वितरक को दिखाई तो वह बोले ये तो ‘वेजटेरियन’ फिल्म है। लोग भाभी का मतलब यह समझते हैं कि भैया के बाद भाभी पर हमारा भी पूरा अधिकार है।’ इस मानसिकता के साथ कौन सा सिनेमा जीवित रह सकता है? फिल्म रिलीज होने के बाद वितरक कमाई में हिस्सेदारी देते नहीं हैं। फिल्म हिट होती है तो हीरो, हीरोइन अपनी फीस बढ़ा लेते हैं। वितरक अपनी तिजोरी भर लेते हैं और निर्माता? उसकी तो असल रकम भी इन सबका भला करने में डूब जाती है। भोजपुरी इंडस्ट्री में अब कोई कमाई नहीं है। बहुत ही बुरी हालत है।’
फिल्म का आधा बजट तो कलाकार ले जाते हैं
हिंदी से लेकर तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम तक सिनेमा के विकास की सबसे अहम वजह रही है, इनके कलाकारों की फिल्म निर्माण में रुचि रखना। उन्होंने अपने स्टूडियो खोले। अपना पैसा लगाकर सिनेमा बनाया। जनता का मनोरंजन किया और सैकड़ों परिवार भी चलाए। भोजपुरी के सितारों का सिनेमा से नहीं अपनी फीस से लगाव रहा है। 'सोहागन बना द सजना हमार' जैसी कई भोजपुरी फिल्मों का निर्माण कर चुके निर्माता सुनील बूबना इस बारे में बात करने पर कहते है, 'भोजपुरी के पुनरुत्थान के दौर में जिन दो तीन लोगों ने भोजपुरी फिल्मों का निर्माण शुरू किया उनमें मैं भी था। भोजपुरी फिल्मों के निर्माण के साथ साथ उसका डिस्ट्रीब्यूशन मैं खुद ही पूरे भारत में करता था। उस समय जी पी सिप्पी, दिलीप कुमार, भाग्यश्री, निर्मल जानी जैसे लोगों ने भोजपुरी फिल्मों का निर्माण किया। लेकिन, कलाकारों की फीस की वजह से फिल्म का बजट बढ़ता गया। जितने भी हिंदी के अच्छे और बड़े निर्माता भोजपुरी में आएस उनके पास उतना समय नहीं होता था कि वे डिस्ट्रीब्यूशन पर ध्यान दें। और, डिस्ट्रीब्यूटर के एकाउंट में बराबर हिसाब नहीं मिलता था और एकमुश्त राशि में बेच देने से कमाई नहीं दिखती थी। इसी के चलते ये सब भोजपुरी सिनेमा से दूर हो गए।'
सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच रहा भोजपुरी सिनेमा
'दुलारा', 'सात सहेलियां', 'दुश्मनी' जैसी दर्जनों फिल्मों का निर्माण कर चुके दुर्गा प्रसाद मजूमदार कहते हैं, 'भोजपुरी सिनेमा में वहीं निर्माता सुरक्षित रहे हैं, जिनका खुद का डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क है। लेकिन पिछले कुछ सालो से तो फिल्में थिएटर में ढंग से रिलीज ही नहीं हो रही हैं। अब तो डिस्ट्रीब्यूशन का भी खेल खत्म हो गया है। नए निर्माताओं को डिस्ट्रीब्यूटर परेशान पहले करते थे,लेकिन अब वह जमाना चला गया। परेशान तो तब करेंगे जब फिल्में थिएटर में रिलीज होगी। अभी जो भी फिल्में यदा कदा रिलीज हो रहीं हैं, उनकी कोई रिकवरी ही नहीं है। आज 100 में 95 प्रतिशत फिल्में सैटेलाइट पर ही रिलीज हो रही हैं। थिएटर में फिल्में नहीं रिलीज हो पा रही है तो इसके जिम्मेदार खुद भोजपुरी के निर्माता है क्योंकि उन्होंने क्वालिटी पर ध्यान दिया नहीं और लॉक डाउन के बाद दर्शको का ज्यादा झुकाव ओटीटी प्लेटफार्म पर हो गया।'
भोजपुरी सिनेमा की पहली जरूरत, पारदर्शिता
'निरहुआ रिक्शावाला' जैसी कई हिट भोजपुरी निर्देशित कर चुके दिनकर कपूर कहते हैं, 'जब तक तक थिएटर में टिकट की बिक्री डिजिटल नहीं होगी तब तक भोजपुरी सिनेमा के डिस्ट्रीब्यूशन में धांधली चलती रहेगी। पुराने जमाने में जब हिंदी फिल्में हिट होती थी तो उसका भी ठीक से हिसाब किताब नहीं मिलता था। अब मल्टीप्लेक्स खुलने से जिस तरह से सारी चीजें पारदर्शी हो गई है, उसी तरह से भोजपुरी सिनेमा में कुछ ऐसा हो तभी कुछ होगा। वैसे भी इन दिनों थिएटर रिलीज की स्थिति बहुत दयनीय है। देखा जाए तो बहुत सारी फिल्म हिट होने के बाद भी कमाई नहीं कर पाती हैं, इसलिए अब ज्यादातर पुराने निर्माता फिल्में नहीं बना रहे हैं। अब थिएटर में फिल्में रिलीज ना होकर डिजिटल पर रिलीज हो रहीं हैं। नए नए निर्माता इस लालच में आ रहे हैं कि डिजिटल पर कमाई हो जाएगी, लेकिन यहां भी सिर्फ बड़े स्टार्स की ही फिल्में लागत निकाल पाती हैं। वह भी तब जब वे सीमित बजट में बनीं हों। सब्सिडी वगैरह से भी सिनेमा बनता नहीं है। ये बस मन का भ्रम है।’