Movie Review: तानाजी: द अनसंग वॉरियर
इतिहास के सबक इंसान अक्सर भूल जाता है। ये सबक होते हैं देश पर कुर्बान होने के, खुद से पहले परिवार और परिवार से पहले समाज को जीवन की प्राथमिकताएं बनाने के। मराठा इतिहास का ऐसा ही योद्धा है तानाजी मालुसरे। तानाजी पर इतिहास के अध्याय हैं। उनकी तेरहवीं पीढ़ी ने उन पर बाकायदे शोध किए हैं। महाराष्ट्र की लोककथाओं में वह सम्मान पाते हैं और उनको लेकर तमाम दंत कथाएं भी प्रचलित हैं।
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अजय देवगन की फिल्म तानाजी: द अनसंग वॉरियर इन दंतकथाओं और मालुसरे परिवार के शोध के बीच संतुलन बनाती चलती है। देवगन का ये देओल अवतार है और इस अवतार को ढाई किलो का हाथ सरीखा बनाने के लिए ओम राउत ने मेहनत भी काफी की है। फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है इसकी तकनीकी उत्कृष्टता। एक विदेशी सिनमैटोग्राफर और तमाम सारे देशी लोगों ने मिलकर एक ऐसा संसार परदे पर गढ़ा है जो थ्री डी में देखने पर तमाम बड़ी हॉलीवुड फिल्मों को मात भले न देता दिखता हो लेकिन उनसे उन्नीस भी नहीं है।
जोधा अकबर और पद्मावत जैसी विशाल फिल्मों के आगे का सिनेमा की गढ़ने की कोशिश करती तानाजी द अनसंग वॉरियर की कहानी छत्रपति शिवाजी के दरबार के एक सूबेदार की कहानी है। ये कहानी औरंगजेब के पैर भारत के दक्षिण में न पड़ने देने की भी कहानी है। मुगलों के साथ काम करने को तैयार हुए विघातियों की भी ये कहानी है। ऐसा ही एक भितरघाती है जय सिंह जिसके कब्जे से कोंढाना किला मुक्त कराना शिवाजी का सपना है। उन शिवाजी का जो मराठवाड़ा में शांति के लिए 23 किले पहले ही छोड़ चुके हैं। कोंढाना किला तान्हाजी को वापस पाना है।
फिल्म तानाजी द अनसंग वॉरियर यहां इतिहास पढ़ाने की कोशिश नहीं करती। फिल्म के शुरू में ही निर्माता निर्देशक ये बता भी देते हैं। ये फिल्म तानाजी की वीरगाथा है और अजय देवगन का पहली बार परदे पर आना फिल्म का इरादा साफ भी कर देता है। संधान घाटी के बीच से हवा में तैरते वीर मराठा जब परदे पर एक के बाद एक आते हैं तो हॉलीवुड की चर्चित फिल्म 300 याद आने लगती है। आगे ढाल-तलवारों के साथ जब युद्ध के नगाड़े बजते हैं तो तानाजी 300 के स्तर तक पहुंचने का जोर भी लगाती दिखती है और सुखद ये है कि फिल्म उससे इक्सीस नहीं तो उन्नीस भी नहीं दिखती है। और, ये कौशल अजय देवगन की टीम ने इतने कम बजट में हासिल किया है कि इसके लिए पूरी टीम को दाद देना बनता है।
अभिनय के लिहाज से अजय देवगन अपनी आंखों से बहुत कुछ कह जाते हैं। फूल और कांटे से शुरू हुआ अजय देवगन का सफर तानाजी तक आते-आते 99 पड़ाव और देख चुका है। करियर की सौवीं फिल्म में अजय देवगन एक अभिनेता के साथ-साथ एक निर्माता के तौर पर भी परिपक्व हुए हैं। एक अनसुनी कहानी को पूरी दुनिया को बताने का बीड़ा उठाना कोंढाना किला जीतने जैसी ही चुनौती है और इस कसौटी पर अजय खरे उतरे हैं।