रवि किशनः भोजपुरी का वो स्टार जो पहले कांग्रेस का हुआ, फिर भाजपा का
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इस कतार में एक नाम रविकिशन का भी था जो मनोज तिवारी और निरहुआ के साथ मिलकर भोजपुरी की स्टार त्रिमूर्ति रचते थे। अलबत्ता एक मामले में वे अपने दोनों साथियों से एकदम अलग थे। दूसरों की तरह वे महज़ भोजपुरी सिनेमा के उत्पाद नहीं थे बल्कि मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा के एक मशहूर और समर्थ अभिनेता थे। इतने समर्थ कि जिस साल 'ससुरा बड़ा पईसा वाला' रिलीज होकर भोजपुरी सिनेमा की कामयाबी का सुनहरा राजमार्ग बना रही थी उसी साल झील सी गहरी आँखों वाले इस अभिनेता को फिल्म 'तेरे नाम' के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्रदान किया गया था।
उन्हें भोजपुरी में मनोज तिवारी और निरहुआ जैसी शानदार और लगातार सिल्वर जुबिलियाँ भले न हासिल हुई हों मगर उन्हें भोजपुरी फिल्मों में भी वो मुक़ाम हासिल हुआ जो इन दोनों सुपर स्टार्स को नही मिला. 2005 में आई उनकी भोजपुरी फिल्म 'कब होई गवनवा हमार' को सर्वश्रेष्ठ क्षेत्रीय फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी हासिल हुआ। तो इस तरह वे इकलौते ऐसे अभिनेता बने जिन्हें एक साथ हिंदी और भोजपुरी की राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त फिल्मों का हिस्सा होने का गौरव मिला।
आमतौर पर उन्हें थोड़े बड़बोले और 'एटीट्यूड' वाले अभिनेता के बतौर शुमार किया जाता है मगर वे सच को स्वीकार करने और उसे कहने का साहस रखने वाले गिने चुने कलाकारों में से एक हैं। कुछ साल पहले भोजपुरी सिनेमा के पचास साल पूरे होने के मौके पर हुई बातचीत में उन्होंने मुझसे बिना लाग लपेट कहा था- "भोजपुरी के नये स्वर्ण काल की शुरुआत का श्रेय बेशक मनोज को ही जाता है. हम लोग तो कर ही रहे थे लेकिन नया दौर और नया रास्ता तो वही लेकर आये।"
और किस्मत देखिये कि एक बार फिर मनोज तिवारी ने ही राजनीति और सत्तारूढ़ दल के टिकट का एक ऐसा रास्ता बनाया है जिस पर निरहुआ और रवि किशन दोनों शान से निकल पड़े हैं। निरहुआ आज़मगढ़ सीट पर एक पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ खड़े हैं तो वहीं रविकिशन मौजूदा मुख्यमंत्री की गोरखपुर सीट पर उत्तराधिकारी के बतौर मैदान में उतर आये हैं। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले की केराकत तहसील के एक गाँव बरई बिसुयी-शुक्लान पट्टी के ब्राह्मण परिवार में जन्में पचास वर्षीय रवि किशन शुक्ला ने बचपन में सोचा भी नहीं था कि वे फिल्मों में काम करेंगे।