दिल्ली में रंगमंच पर खुद को जमकर मांजने के बाद अभिनेता आशीष विद्यार्थी जब मुंबई पहुंचे तो उनके सामने हर दिन अपने आप को साबित करने की चुनौती रही। तीस साल से लगातार अभिनय के क्षेत्र में जमे आशीष विद्यार्थी से हाल ही में लंबी बातचीत हुई और इसी बातचीत के दौरान वह कहने लगे, ‘बंधु, आपको मौका मिले तो आप मेरी दो फिल्में अवश्य देखिएगा।’ मैंने पूछा, कौन सी? ‘इस रात की सुबह नहीं’ और ‘बॉलीवुड डायरीज’, उनकी मनुहार थी। फिर आशीष ये जानकर चौंके कि फिल्म ‘इस रात की सुबह नहीं’ मेरी पसंदीदा फिल्मों में शामिल है। और जब मैंने उन्हें इस फिल्म में उनके किरदार रमन भाई की खासियतों के बारे में बताना शुरू किया तो वह भी चौंक गए। चौंकते इसी तरह पहले निर्देशक सुधीर मिश्रा भी थे, जब कोई उनसे इस फिल्म के बारे में बातें करता। उनके भाई के साथ हुई सच्ची घटना पर बनी ये फिल्म है। भाई दुनिया छोड़ गया, पर दुनिया ने उसकी कहानी को 25 साल बाद भी सीने से लगाए रखा है। ‘इस रात की सुबह नहीं’ ने पिछले 25 साल में हिंदी सिनेमा की न जाने कितनी फिल्मों की बुनियाद बनाई है। रामगोपाल वर्मा और अनुराग कश्यप के सिनेमा की जो बुलंद इमारतें इनके करियर के शुरूआती दौर में बनी, उनकी नींव में ‘इस रात की सुबह नहीं’ के तमाम सबक शामिल हैं।
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‘निशाचर’ नाम से बननी शुरू हुई फिल्म
फिल्म ‘इस रात की सुबह नहीं’ जब बननी शुरू हुई तो इसका नाम सुधीर मिश्रा ने रखा था, ‘निशाचर’। वो इसलिए कि इसमें जितने किरदार हैं सब एक रात की कहानी में शामिल है। कोई न ऊंघ रहा है, न अलसा रहा है। सब अपने अपने हालात को लेकर चौकन्ने हैं। मेरे करीबी दोस्त रहे निर्मल पांडे के करियर का ये फिल्म टर्निंग प्वाइंट रही। तारा देशपांडे और स्मृति मिश्रा ने भी सबको प्रभावित किया। खासतौर से स्मृति मिश्रा ने जिस तरह एक शादीशुदा शख्स से प्रेम करने का किरदार बहुत ही संतुलित और सधे हुए अंदाज मे किया, उसके लिए उनकी अब तक तारीफें होती हैं। फिल्म में विलेन बने सुधीर विद्यार्थी का किरदार ऐसा है कि फिल्म देखते समय आपको हीरो से नफरत और विलेन से प्यार हो जाएगा। आशीष विद्यार्थी को भी अपना ये किरदार बहुत प्यारा है। वह कहते हैं, ‘रमन भाई के किरदार ने मुझे हिंदी सिनेमा में जो पहचान दी, उसके बाद मेरा लोगों के सामने एक्टिंग करके दिखाने का समय खत्म हो गया।’ आशीष ने अपना पहला ऑडीशन फिल्म ‘1942 ए लव स्टोरी’ के लिए जो नटराज स्टूडियो में दिया था, उसका पूरा किस्सा आप पढ़ ही चुके हैं। महेश भट्ट ने उन्हें अपने घर में बुलाकार एक्टिंग का टेस्ट लिया और आशीष ने वह भी खुशी खुशी दिया। एक सच्चा कलाकार ही वही होता है जो पूरा जीवन लगातार सीखता रहता है।
कहानी मुंबई की एक रात की
‘इस रात की सुबह नहीं’ की कहानी यूं है कि विज्ञापन कंपनी में काम करने वाला आदित्य घर पहुंचने के बाद बिस्तर पर ढेर होता है और थोड़ी देर में शुरू होने वाली ऑफिस पार्टी के लिए अपनी माशूक मालविका को फोन करता है। इतने में बाथरूम से उसकी बीवी पूजा निकलकर आ जाती है। उसे आना तो हफ्ते भर बाद था लेकिन वह जल्दी आ गई है। पार्टी में वह भी आती है। पूजा को आदित्य और मालविका के प्रेम के बारे में पता चल जाता है और वह अपने पति को भरी महफिल में चांटा रसीदकर घर चली आती है। उसी होटल में डॉन रमन भाई अपनी टोली के विलास को सबक सिखाने आया हुआ है। दोनों को अपने बीच की गलतफहमी समझ में आने ही वाली होती है कि गोलीबारी में विलास की पत्नी मारी जाती है। उधर, पूजा अपने पति आदित्य को घर से निकाल देती है तो वह एक बार में बैठकर बार बार उसे फोन कर रहा है। रमनभाई के गुर्गे उसी बार से सरकारी अस्पताल के डॉक्टर को फोन कर रहे हैं ताकि विलास की बीवी की मौत को हार्ट अटैक से हुई मौत बताकर सर्टिफिकेट बनवा सकें। फोन एक ही है और उससे कॉल करने को लेकर हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि आदित्य का गुस्से में उठा हाथ रमनभाई के गाल पर पड़ता है। अब एक पूरी रात में दर्शकों को मुंबई का हर चेहरा नजर आ जाता है। जब सारे अच्छे लोगों के बुरे चेहरे एक के बाद एक सामने आते रहते हैं तो सामने ये भी आता है कि रमनभाई जैसा डॉन जिसे जमाना बुरा समझता है, वह इतना बुरा भी नहीं है।
सच्ची घटना पर आधारित फिल्म
सुधीर इस फिल्म को अपने छोटे भाई के साथ हुई सच्ची घटना बताते हैं। फिल्म के क्रेडिट्स में स्टोरी का क्रेडिट भी सुधांशु मिश्रा को ही दिया गया है। आपको जानकर हैरानी होगी कि फिल्ममेकिंग सुधांशु मिश्रा ने पूना फिल्म इंस्टीट्यूट से सीखी और फिल्म डायरेक्टर सुधीर मिश्रा बने। ऐसा इसलिए क्योंकि सुधीर का ज्यादातर वक्त अपने भाई के साथ ही बीतता था। सुधीर ने सुधांशु से ही सिनेमा सीखा। वहीं पढ़ाई के दौरान एक रात सुधांशु ने सरेराह किसी लड़की से छेड़खानी करते एक युवक को चांटा मार दिया। बाद में पता चला कि वह तो लोकल डॉन का भाई है। फिर इसके बाद कई दिन सुधांशु के हॉस्टल में छिपे रहे। सुधांशु का निधन बहुत कम उम्र में हो गया। फिल्म में सुधीर का एक रिश्ता और बना है। ‘इस रात की सुबह नहीं’ की एडीटर रेनू सलूजा जब अपने पति विधु विनोद चोपड़ा से अलग हुईं तो वह सुधीर की ही हमराही बनीं। तीनों एक साथ कुंदन शाह की फिल्म जाने भी दो यारों के दिनों से काम करते आए थे।
अनुराग और सौरभ ने सीखे ‘सत्या’ के सबक
फिल्म ‘इस रात की सुबह नहीं’ का पूरा अंडरकरंट रामगोपाल वर्मा की ‘सत्या’ में आपको दिख सकता है। लेकिन, सुधीर ने कभी इस बारे में किसी से जिक्र तक नहीं किया। ‘सत्या’ लिखने वाले अनुराग कश्यप और सौरभ शुक्ला दोनों उनके दोस्त। कल्लू मामा का किरदार पूरा का पूरा ‘इस रात की सुबह नहीं’ के विलास का विस्तार ही तो है। सुधीर फक्कड़ तबीयत के इंसान हैं। ‘इस रात की सुबह नहीं’ पर सुधीर आज भी ज्यादा बात नहीं करते हैं। फिल्म का जिक्र चलने पर वह बस इस बात पर खुश हो जाते हैं कि ये फिल्म अब भी सिनेमा के कद्रदानों को न सिर्फ याद है बल्कि इसे हिंदी सिनेमा की ट्रेंडसेटर फिल्म का दर्जा भी हासिल है। ‘इस रात की सुबह नहीं’ का नाम सुधीर मिश्रा के दिल में एक टीस भी उभार देता है। इस फिल्म के शुरू होने से पहले उन्होंने अपना भाई और फिल्म खत्म होने के बाद उन्होंने अपनी सबसे करीबी दोस्त और इस फिल्म की एडीटर रेनू सलूजा खो दी। फिल्म का ये गाना जीवन के ऐसे ही एहसासों की बानगी है..