किसी इंसान का यूसुफ खान से दिलीप कुमार बनना और फिर जमाने भर के खान साब बन जाना यूं ही नहीं होता। उनके बाद के तमाम खान सितारों ने खुद को खान साब कहलाने की भरपूर कोशिश भी कि लेकिन जमाने को सिनेमा का दूसरा खान साब शायद मंजूर नहीं है। मीर तकी मीर जब लिखते हैं, मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों, तब ख़ाक के परदे से इनसान निकलता है.. तो मानो यूं लगता है कि दिलीप कुमार की शख्सियत के लिए ही इसे लिखकर रखा गया होगा। दिलीप कुमार आज होते तो अपना 100वां जन्मदिन मना रहे होते। भारतीय सिनेमा के वह ‘ट्रेजेडी किंग’ कहलाए। दर्जनों ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं। रुआब ऐसा कि हिंदुस्तान ही नहीं पाकिस्तान के भी निशान ए इम्तियाज बन गए। आजादी के तीन साल पहले फिल्म 'ज्वार भाटा' में वह पहली बार परदे पर दिखे और आखिरी बार कैमरे से उनकी आंखें चार साल 1998 में फिल्म 'किला' में हुईं। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स उन्हें सबसे ज्यादा पुरस्कार जीतने वाले भारतीय अभिनेता के तौर पर गिनता है। करते हैं बात उनके करियर के उन 10 बेहतरीन पड़ावों की जिनमें उनके किरदारों ने हिंदी सिनेमा में अदाकारी का एक नया स्कूल ही खोल दिया..
100 Years Of Dilip Kumar: अदाकारी का स्कूल बने दिलीप कुमार के ये 10 किरदार, जीते सबसे ज्यादा बेस्ट एक्टर ईनाम
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शक्ति (1982)
निर्माता जोड़ी मुशीर रियाज की बनाई फिल्म ‘शक्ति’ निर्देशक रमेश सिप्पी की ‘शोले’ और ‘शान’ के बाद बनाई फिल्म है। क्या कुछ नहीं था इस फिल्म में। आर डी बर्मन का कमाल का संगीत, सलीम-जावेद की कमाल की कहानी और दिलीप कुमार एक पुलिस अफसर के किरदार में। बेटे से पिता की पटती नहीं है। जनरेशन गैप की कहानी कहती फिल्म ‘शक्ति’ को हिंदी सिनेमा में एक कालजयी फिल्म का दर्जा हासिल है। फिल्म में अमिताभ बच्चन हैं। राखी हैं। स्मिता पाटिल भी हैं। और, साथ में हैं कुलभूषण खरबंदा व अमरीश पुरी। फिल्म ने चार फिल्मफेयर अवार्ड जीते। हिंदी सिनेमा की ये उन गिनती की फिल्मों में शामिल है जिनके दोनों मुख्य अभिनेता एक ही साल फिल्मफेयर के बेस्ट एक्टर अवार्ड के लिए नामित हुए। और, जाहिर है पुरस्कार दिलीप कुमार की झोली में ही गिरा। फिल्म ‘शक्ति’ के बाद दिलीप कुमार अपनी दो और फिल्मों ‘मशाल’ और ‘सौदागर’ के लिए भी इस पुरस्कार के लिए नामित हुए।
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राम और श्याम (1967)
दिलीप कुमार की फिल्मोग्राफी को अगर सबसे बाद की फिल्मों की तरफ से बीते बरसों की फिल्मों की तरफ पढ़ना शुरू करें तो पता चलता है कि फिल्म ‘शक्ति’ से पहले उनकी अदाकारी की धूम ‘क्रांति’ में भी खूब हुई लेकिन जिन फिल्मों के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का नॉमीनेशन मिला, वे फिल्में रहीं, ‘बैराग’, ‘सगीना’, ‘गोपी’, ‘संघर्ष’ और ‘आदमी’। फिल्म ‘शक्ति’ से पहले दिलीप कुमार ने फिल्म ‘राम और श्याम’ में बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड जीता था। फिल्म में दिलीप कुमार डबल रोल में नजर आए। एक तरफ तेज तर्रार नौजवान तो दूसरा इसके बिल्कुल विपरीत। दिलीप कुमार के सामने थे फिल्म में प्राण, वहीदा रहमान और मुमताज।
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लीडर (1964)
दिलीप कुमार ने अपनी जिन फिल्मों की कहानियां खुद ही लिखीं उनमें फिल्म ‘गंगा जमना’ के अलावा फिल्म ‘लीडर’ भी शामिल है। इस फिल्म के लिए दिलीप कुमार ने फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार अपने नाम किया था। यह एक पॉलीटिकल ड्रामा फिल्म है जिसमें विजय (दिलीप कुमार) पर एक राजनेता की हत्या का आरोप लग जाता है जिसके बाद विजय और सुनीता (वैजयंती माला) इस साजिश को नाकाम करते हैं।
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कोहिनूर (1961)
कहा जाता है कि फिल्मों में लगातार दुखों से भरे किरदार करने का असर दिलीप कुमार के निजी जीवन पर भी पड़ने लगा था। जिसके बाद उन्हें दूसरे तरह के किरदार करने की हिदायत दी गई। दिलीप कुमार ने इसके बाद फिल्म 'कोहिनूर' का चयन किया। फिल्म में दिलीप कुमार के साथ मीना कुमारी हैं। दोनों राजकुमार और राजकुमारी के किरदार में हैं। फिल्म में दोनों तलवारबाजी और डांस करते हुए नजर आते हैं। इस फिल्म की हास्य से से भरपूर अदाकारी को दर्शकों ने खूब पसंद किया था।