कानपुर में चुन्नीगंड डिपो के पास बनी विवेक टाकीज अब किस हाल में है, कौन जाने पर इसी थिएटर में साल 1981 की गर्मियों में एडवांस बुकिंग की जो लंबी लाइन लगती थी, वो सड़क तक पहुंच जाती थी। किसी को नहीं पता था कि ये मद्रासी हीरो कौन है, कौन इसका डायरेक्टर है, कौन इसकी हीरोइन है, यहां तक कि किसी को इसकी कहानी या संवाद लिखने से भी कोई नहीं लेना देना था। ये सब यहां जुटते थे तो बस एक गाने की आवाज सुनकर। आवाज होती लता मंगेशकर की और ये गाना अपनी पहली लाइन के आलाप से ही लोगों पर जादू कर देता, सोलह बरस की बाली उमर को सलाम...! एक लड़की अपनी प्रेमी को याद करते हुए उन सारी जगहों पर भटक रही हैं, जहां दोनों के साथ बिताए लम्हों की यादें बोई हुई हैं।
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तो किस्सा कुछ यूं है कि तमिल सिनेमा के मशहूर निर्देशक के बालाचंदर ने साल 1973 में एक नए हीरो कमल हासन को अपनी फिल्म अरंगेत्रम में लॉन्च किया। बचपन से लेकर जवानी तक कमल हासन ने फिल्मों में खूब काम किया लेकिन हीरो वह इसी फिल्म से बने। तमिल में खूब नाम चमका तो पड़ोस में तेलुगू फिल्में बनाने वाले कमल हासन के चक्कर लगाने लगे। रोज उनके पास लोग पहुंच जाते किसी न किसी नई कहानी का प्रस्ताव लेकर। और, कमल हासन ने भी एक दिन सबको बोल ही दिया, मेरी तेलुगू फिल्म बनेगी तो सिर्फ के बालाचंदर के साथ। कमल हासन ने बोल तो दिया लेकिन के बालाचंदर से पूछ के थोड़े ही बोला था। बोलना था सो बस बोल दिया। लेकिन, उस्ताद अपने शागिर्दों के लिए क्या कुछ नहीं करते। द्रोणाचार्य ने अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर साबित करने के लिए एकलव्य का अंगूठा तक कटवा लिया था। के बालाचंदर के लिए भी कमल हासन किसी अर्जुन की तरह ही थे। उन्होंने कहानी सोचनी शुरू की।
एक तमिल लड़का और एक तेलुगू लड़की। दोनों की प्रेम कहानी। फिल्म का नाम ‘मारो चरित्रा’ यानी एक और इतिहास। हीरो कमल हासन, हीरोइन एक स्कूल में पढ़ने वाली गुमनाम सी लड़की अभिलाषा जिसका नंबर आडीशन में 162वां था और जिसे लेने के हक में के बालाचंदर की यूनिट का एक भी आदमी नहीं था, उसका नाम रखा गया सरिता। फिल्म में तेलुगू की ही उभरती स्टार माधवी को भी लिया गया। बालाचंदर ने एक कमाल और किया। पूरी फिल्म उन्होंने ब्लैक एंड व्हाइट में शूट कर डाली, ये दिखाने के लिए कहानी अच्छी हो तो उसके एहसासों के रंग के आगे दुनिया के सारे रंग फीके हैं। फिल्म सुपर हिट रही। कमल हासन तमिल और मलयालम के सुपरस्टार थे ही अब वह तेलुगू के भी हिट हीरो बन गए। पूरी फिल्म तेलुगू में और वह बोलते रहे तमिल।
ऐसा ही कुछ किया कमल हासन ने इसी फिल्म के हिंदी रीमेक एक दूजे के लिए में। वासू और सपना की ये कहानी कालजयी प्रेम कहानी है। फिल्म पूरी होने के बाद के बालाचंदर ने उस समय के शो मैन राज कपूर को ये फिल्म देखने का न्यौता दिया। राज कपूर आए। फिल्म देखी और क्लाइमेक्स पर नाक भौं सिकोड़ ली। बोले ये एंडिंग जमी नहीं। के बालाचंदर ने कौन सा राज कपूर को जमाने के लिए ये फिल्म दिखानी थी, वो ये जानते थे कि फिल्म की एंडिंग कम लोगों को ही पसंद आएगी। लेकिन, जब पसंद आएगी तो लोग इसी को देखने बार बार आएंगे। वही हुआ। सच्चा प्रेम कभी पूरा नहीं होता। ये इस फिल्म की कहानी ने फिर दिखाया। फिल्म दो दो साल तक सिनेमाघरों में लग रही। वासू और सपना का नाम लैला मजनू, शीरीं फरहाद और हीरा रांझा की कहानियों की तरह युवाओं के अड्डों में तैरने लगा।
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कहानी थी एक उत्तर भारतीय परिवार की लड़की सपना और एक तमिल लड़के वासू की। दोनों के परिवार गोवा में पड़ोसी हैं। दोनों का प्यार घरवालों को पता चलता है तो तूफान आ जाता है। मोबाइल और इंटरनेट टाइप की चीज तब दुनिया में आई नहीं थी तो घर वालों ने शर्त ये रखी कि अगर दोनों पूरा एक साल बिना एक दूसरे से किसी भी तरह का संपर्क किए बिता लेंगे तभी दोनों की शादी हो सकेगी। वासू हैदराबाद चला जाता है। रोज सपना को एक खत लिखता है लेकिन पोस्ट नहीं करता। एक विधवा युवती संध्या से हिंदी भी सीखने की कोशिश करता है। संध्या उसे भरतनाट्यम भी सिखाती है। फिर वासू और सपना में गलतफहमियां होती हैं। वासू की संध्या से शादी तय होती है। सपना को पता ही नहीं होता कि उसकी तरफ के लोगों ने क्या गुल खिला दिया है। वासू और सपना के चटकीले प्रेम पर हालात के काले बादल घिर आते हैं और जब तक आसमान साफ हो बहुत देर हो चुकी होती है।
फिल्म में सपना की मां बनी थी शुभा खोटे। अपनी बेटी के जीवन से वासू की यादें मिटाने के लिए सपना की मां जो कुछ कर सकती थी, सब उसने किया। टेप रिकॉर्डर में बजने वाली वासू की आवाज मिटाने को टेप तोड़ दिया तो सपना पूरे कमरे में वासू का नाम दीवारों पर लिख देती है। फोटो जला दी तो सपना ने उसकी भस्म चाय में डालकर पी डाली। और ये सीन रति अग्निहोत्री ने असल में भी कर डाला। जी हां, इस वनटेक शॉट में रति ने फोटो की भस्म वाली चाय असल में भी पी डाली थी। बिना ये जाने कि चाय में फोटो की कालिख जहर भी घोल सकती है। गनीमत रही कि उन्हें कुछ हुआ नहीं।
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फिल्म एक दूजे के लिए ने साल 1981 में कामयाबी का ऐसा झंडा गाड़ा कि लोग हैरान रह गए। ये वो साल है जिस साल मनोज कुमार की क्रांति साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बनी थी। अमिताभ बच्चन की लावारिस और नसीब ने भी खूब पैसा कमाया। जीतेंद्र की एक्शन फिल्म मेरी आवाज सुनो भी टॉप 5 में शामिल रही। इन फिल्मों के बाद पांचवें और छठे नंबर पर उस साल कमाई के लिहाज से जो फिल्में रहीं वे थीं कुमार गौरव और विजेयता पंडित की लव स्टोरी और कमल हासन और रति अग्निहोत्री की फिल्म एक दूजे के लिए। लव स्टोरी और एक दूजे के लिए ने उस साल याराना, कालिया, क्रोधी, रॉकी और बरसात की एक रात जैसी फिल्मों से भी ज्यादा कमाई की थी।
फिल्म एक दूजे के लिए ने हिंदी सिनेमा को कई नए चेहरे दिए। इसके लीड कलाकार कमल हासन, रति अग्निहोत्री और माधवी तीनों साउथ की फिल्मों के जाने पहचाने चेहरे थे और तीनों की ये पहली हिंदी फिल्म थी। उत्तर प्रदेश के बरेली में जन्मी रति अग्निहोत्री तो इस फिल्म के बाद इतना मशहूर हुईं कि उनकी तीन साल में तीस से ज्यादा फिल्में रिलीज हो गईं। इसी फिल्म से नेपाल के अभिनेता सुनील थापा ने भी अपना करियर शुरू किया। लेकिन, फिल्म से जिस एक और शख्स ने सबसे धमाकेदार एंट्री हिंदी सिनेमा में मारी, वो रहे इसके गायक एस पी बालासुब्रमण्यम।
फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल में से लक्ष्मीकांत को एस पी खास पसंद नहीं आए थे, उन्हें लगा कि पता नहीं ये मद्रासी गायक कुछ कर भी पाएगा कि नहीं लेकिन निर्देशक के बालाचंदर के भरोसा जताने के बाद वह मान गए। कमल हासन की आवाज बनने के बाद एस पी बाद में फिल्म मैंने प्यार किया में सलमान खान की आवाज भी बने। कम लोगों को ही पता होगा कि एस पी न सिर्फ कमाल के गायक हैं बल्कि बहुत अच्छे अभिनेता औऱ डबिंग आर्टिस्ट भी हैं। कमल हासन की जितनी भी फिल्में तमिल से तेलुगू में डब होकर रिलीज हुई हैं, सब में उनकी डबिंग एस पी ने ही की। फिल्म एक दूजे के लिए के गाने ‘तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अनजाना’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला। इसी गाने को लिखने के लिए आनंद बक्षी ने जीता था बेस्ट लिरिसिस्ट का फिल्मफेयर पुरस्कार।
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फिल्म एक दूजे के लिए के गानों में गीतकार आनंद बक्षी ने प्रेम का शायद ही कोई एहसास हो जो न लिखा हो। गोवा के बीच पर मोटरसाइकिल पर बैठे वासू सपना जब प्रेम के सबसे असीम आनंद के पास होते हैं तो के बालाचंदर अगले सीन में वासू को एक लट्टू नचाता दिखाते हैं, जो नाच रहा होता है सपना के पेट के ऊपर। पूरे जमाने की जवानी इन गानों पर तब लट्टू हो गई थी। फिल्म में आनंद बक्षी की लिखावट का एक नमूना देखिए,
मिलते रहे यहां हम, ये है यहां लिखा
इस लिखावट की ज़ेर ओ ज़बर को सलाम
साहिल की रेत पर यूं लहरा उठा ये दिल
सागर में उठने वाली हर लहर को सलाम
घूंघट को तोड़ के जो, सर से सरक गई
ऐसी निगोड़ी धानी चुनर को सलाम
उल्फ़त के दुश्मनों ने कोशिश हज़ार की
फिर भी नहीं झुकी जो, उस नज़र को सलाम
ऐ प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम
इस गाने की शूटिंग करते जब ‘ज़ेर ओ ज़बर’ का ज़िक्र आया तो के बालाचंदर ने एकदम से शूटिंग रोक दी। पूछने लगे कि ये ज़ेर ओ ज़बर मतलब क्या होता है। पूरी यूनिट में किसी को नहीं पता। ये हुआ कि गीतकार को बुलाओ।
अब शूटिंग गोवा में चल रही। आनंद बक्षी मुंबई में नहीं। उनकी खोजबीन शुरू हुई तो पता चला कि वो हैदराबाद में हैं। के बालाचंदर ने आनंद बक्षी को हैदराबाद से गोवा बुलवा लिया सिर्फ ये समझने के लिए इस शब्द के जो मायने हैं, गाना उनके हिसाब से शूट हो रहा है कि नहीं। इतनी बारीकी से काम हो और मशहूर न हो, भला कैसे हो सकता है। ये और बात है कि फिल्मफेयर वालों पर तब आर्ट फिल्मों का झंडाबरदार बनने का शौक चर्राया था और अगले साल के फिल्मफेयर पुरस्कारों में 13 नॉमीनेशन हासिल करने के बाद इस फिल्म की झोली में सिर्फ तीन पुरस्कार गिरे। जिसमें से एक अवार्ड मिला फिल्म की शानदार एडीटिंग के लिए एन आर किट्टू को। के बालाचंदर को मिला पुरस्कार बेस्ट स्क्रीनप्ले का। फिल्म में बी एस लोकनाथ की सिनेमैटोग्राफी भी लाजवाब रही। तो एक बार फिर से सोलह उमर की बाली उमर को सलाम और अब कल यानी छह जून को बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।
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(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)
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