हरिप्रसाद चौरसिया, नाम सुनते ही कानों में बांसुरी की मधुर ध्वनि गूंजने लगती है। बांस की बनी साधारण सी बांसुरी जब हरिप्रसाद के हाथो में होती है तो इस बांसुरी में मानव मन को मोह लेने वाली असाधारण शक्तियां आ जाती हैं। शास्त्रीय संगीत में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए हरिप्रसाद चौरसिया को पद्म भूषण, पद्म विभूषण, यश भारती और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। हिंदी सिनेमा में शास्त्रीय संगीत को पुनर्जीवित करने करने वाले महान कलाकार हरिप्रसाद चौरसिया के जन्मदिन पर आइए जानते हैं उनकी 10 अनसुनी कहानियां।
पिता से बगावत कर संगीत सीखने वाले बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया की ये हैं 10 अनसुनी कहानियां
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बांसुरी के जादूगर और शास्त्रीय संगीतकार हरिप्रसाद चौरसिया का जन्म 1 जुलाई 1938 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) में हुआ। मात्र छह साल की उम्र में ही उनके सिर से मां का साया उठ गया और इनका बचपन पिता के साथ तनहाइयों में बीता। सौतेली मां हरिप्रसाद को सगी मां जैसा प्यार नहीं दे पाएगी यह सोचकर इनके पिता ने दूसरी शादी नहीं की और उन्होंने ही इन्हें पाल पोसकर बड़ा किया।
हरिप्रसाद चौरसिया के पिता अखाड़े में पहलवानी किया करते थे। वह चाहते थे हरिप्रसाद भी कुश्ती के दांवपेंच सीखकर बड़े पहलवान बनें। संगीत के प्रेमी हरिप्रसाद का मन अखाड़े में बिल्कुल नहीं लगता था पर पिताजी के डर से अखाड़े में जाया करते थे और कुश्ती का अभ्यास भी किया करते। संगीत की दुनिया में परचम लहराने के बाद हरिप्रसाद ने एक इंटरव्यू में कहा, "उन दिनों अखाड़े में की गई मेहनत से मुझे संगीत में भी काफी मदद मिली। बांसुरी बजाते समय लंबी सांसे बांधने में मैं अखाड़े में किए गए अभ्यास की बदौलत ही कामयाब हो पाया।"
पिता से छुपकर सीखा संगीत
हरिप्रसाद के पिता उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे। उनका मानना था कि संगीत या तो राजाओं के दरबार में होता है या भीख मांगने के लिए गाया-बजाया जाता है। हरिप्रसाद के पिता बहुत सख्त रवैये वाले इंसान थे। कई बार वह हरि प्रसाद की बुरी तरह पिटाई भी कर देते थे। संगीत को अपना दिल दे चुके हरिप्रसाद ने पिता से छुपकर अपने पड़ोसी पंडित राजाराम से गायन सीखना शुरू किया। तब वो सिर्फ नौ साल के थे। पंडित जी को पता था कि हरि प्रसाद के पिता को संगीत पसंद नहीं है इसलिए उन्होंने भी सब छुपा के रखा।
घरेलू काम के बदले सीखा बांसुरी बजाना
पंडित राजाराम से थोड़ा बहुत गायन सीखने के बाद हरिप्रसाद संगीत के पुजारी बन गए। 15 साल की उम्र में उन्होंने रेडियो पर पंडित भोलानाथ को बांसुरी बजाते सुना और उसी समय इनके मन मे बांसुरी सीखने की इच्छा हुई। हरिप्रसाद जी पंडित भोलानाथ के पास पंहुच गए। पंडित भोलानाथ की शादी नहीं हुई थी और वह अकेले रहते थे। हरिप्रसाद पंडित भोलानाथ के घर पर ही रुक गए और सब्जी काटना, मसाला पीसना जैसे घरेलू कामों में उनका हाथ बंटाने लगे। बदले में पंडित भोलानाथ ने उन्हें बांसुरी सिखाना शुरू कर दिया।