करीब एक दशक पहले टीवी से अपने करियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री हिना खान के बीते दो साल खूब अच्छे बीते। नए साल की शुरुआत उन्होंने वेब सीरीज 'डैमेज्ड 2' और फिल्म 'हैक्ड' से की है।
हिना खान ने इंटरव्यू में कहा- 'घाघरा-चोली वाले शो को छोड़ना मेरा सबसे सही फैसला था'
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तो वो कौन सा शो है जिसने आपके करियर को सबसे ज्यादा बल दिया?
वह शो मेरे लिए 'बिग बॉस' है। उस शो ने मेरे लिए बहुत अच्छा मुकाम बनाकर तैयार किया। उस शो से मुझे आज भी उतनी ही इज्जत मिलती है। इस चैनल और उस शो के निर्माता मुझे आज भी बहुत मानते हैं।
बिग बॉस के दौरान आपके ड्रेसिंग सेंस की बहुत चर्चाएं हुई थीं। ये चीज आपके अंदर कैसे आई?
ये सब मेरे अंदर पहले से ही था। मैं एक ही चीज लगातार आठ साल तक घाघरा चोली, सलवार सूट और साड़ी पहन कर करती रही तो मुझे दूसरी चीजें दिखाने का मौका ही नहीं मिला। मैं अंदर से चाहती थी कि मुझे सलवार, सूट, साड़ी, घाघरा ये सब नहीं पहनना है।
आप फिल्में और वेब सीरीज के लिए अपने किरदारों के चुनाव किस तरह से कर रही हैं?
मैं ऐसे किरदार चुन रही हूं जिसमें मुझे कुछ अलग करने का मौका मिले। जिनमें मेरी अलग अलग प्रतिभाएं नजर आएं। मेरे दर्शकों को पता चलना चाहिए कि हिना खान कॉमेडी, थ्रिलर, ड्रामा, हॉरर, रोमांस सब कर सकती है।
आपके नाम के साथ सबसे कामुक महिला, सबसे स्टाइलिश टीवी अभिनेत्री जैसे तमगे जुड़ते हैं तो आपकी क्या प्रतिक्रिया रहती है?
मैं इनको पढ़ती हूं और बंद करके रख देती हूं। ये सब चीजें हमें खुश करती हैं लेकिन सिर्फ इन्हीं के साथ हमें खुश होते नहीं रहना चाहिए। जिस वजह से आपको यह सब मिला है, आपको फिर उसी पर अपना ध्यान केंद्रित करते रहना चाहिए।
डैमेज्ड 2 वेब सीरीज में आपका किरदार काफी अलहदा है, क्या मुश्किलें आईं इसकी तैयारी में?
मेरे लिए इस सीरीज में सबसे मुश्किल रहा धूम्रपान करना। मेरा ये किरदार नशे में भी रहता है। ये सब मैं निजी जिंदगी में पसंद नहीं करती। कुछ लोगों ने मुझे इसके बारे में थोड़ा बताया और मैंने भी मेहनत की तो सब हो गया। मैं चाहती तो ये किरदार बिना इन सबके भी निभा सकती थी लेकिन किरदार को मजबूती प्रदान करने के लिए यह करना मुझे जरूरी लगा।
अखबार का आपके जीवन में क्या महत्व है?
मेरे हिसाब से आज भी हमारे देश की 60 से 65 फीसदी आबादी अखबार ही पढ़ती है। मेरा पहला शो राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित था। अखबार में छपी मेरी खबरों की कटिंग काटकर लोग मेरे पास भेजते थे। कुछ की तो भाषा भी समझ में नहीं आती थी लेकिन फिर भी खुशी होती थी।
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