जॉनी प्रकाश राव उर्फ जॉनी लीवर के चुटकुलों और हास्य प्रसंगों की नब्बे के दशक में कैसेटों के जरिए खूब बिक्री हुई। सुपरस्टार का तमगा पाने वाले जॉनी पहले मंचीय हास्य कलाकार हैं। उनसे ‘अमर उजाला’ के लिए ये खास बातचीत की पंकज शुक्ल ने।
Johny Lever Exclusive: "हास्य कलाकार का मजबूत होना बहुत जरूरी, सामाजिक व्यंग्य लिखना ‘पंगा’ है"
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हिंदी मनोरंजन उद्योग में हास्य का नया दौर है, कितना बदला है लोगों को हंसाने का ये अंदाज?
कॉमेडी में बदवाल आया है, आ रहा है और आता रहेगा। दर्शकों के हिसाब से फिल्में बनाने का तरीका बदलता रहेगा। समय के साथ खुद को बदलना हर कलाकार के लिए जरूरी है। अगर वह बदलेगा नहीं तो लोगों को नया कुछ समझेगा नहीं। मैंने जॉनी वाकर, किशोर कुमार और महमूद जैसे कलाकारों को देखकर कॉमेडी सीखी। डबल मीनिंग वाले संवादों को मैंने कभी जीवन में तवज्जो नहीं दी, ये आप भी जानते हैं।
आपके हास्य में अक्सर सामाजिक विसंगतियों पर एक व्यंग्य भी दिखता है। व्यंग्य से नए दौर के सृजनकर्ता दूर क्यों होते जा रहे हैं?
मेरा ये मानना है कि किसी भी हास्य कलाकार को अंदर से मजबूत होना बहुत जरूरी है। अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो कुछ नया लिख नहीं पाएगा। मेरे पास जब लोग द्विअर्थी संवादों वाली फिल्म या कोई दूसरी चीज लेकर आते हैं, तो मैं उनसे बात करता हूं कि आपको कॉमेडी चाहिने ना, आप जो लेकर आए हैं, मैं उससे बेहतर देता हूं।
समाज से जुड़कर उसके दर्द को हास्य में बदल देने में आप माहिर रहे हैं? ‘दंगों के बीच शराबी’ वाले आपके प्रहसन को लोगों ने खूब सराहा भी?
मैं चार्ली चैपलिन के हास्य को अपना आदर्श मानता हूं। बहुत छोटा था तो मैंने ‘चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ देखी। चैपलिन की ‘सिटी लाइट्स’ और ‘मॉडर्न टाइम्स’ ने भी मुझे काफी प्रभावित किया। चैपलिन अपनी फिल्मों में हमेशा कोई संदेश दे जाते थे। याद रहे कि वह मूक फिल्मों का जमाना था और पर्दे पर संवाद तब लिखकर आते थे। तो अब तो बोल सकने की सहूलियत मिली हुई है। अगर हम अब भी नहीं बोल सकते तो क्या फायदा।
हां, चैपलिन इसके लिए मेहनत भी काफी करते थे?
चैपलिन सामाजिक विषयों में से हास्य निकालते थे। जब तरक्की शुरू हुई और मशीनों से काम शुरू हुआ तो वह भारत आए, महात्मा गांधी से मिलने। वह उनसे मिलकर इंसान और मशीन का संघर्ष समझने आए थे। वह दौर संघर्ष का था, दुख और तकलीफों के समय वह दर्शकों को हंसाना चाहते थे। इस सब के बारे में हम सबको भी सोचना जरूर चाहिए।
तो फिर आपके दिमाग में इन दिनों चल रहे किसान आंदोलन को लेकर भी कुछ न कुछ चल ही रहा होगा?
जी हां, मुझे पता चला है उनकी दिक्कतों के बारे में। मैं जरूर लिखूंगा इस बारे में। होता क्या है लोग अब ज्यादा सोचते नहीं हैं। समाज की समस्या पर न लिखने वाला कलाकार नहीं है। लेकिन, क्या है कि व्यंग्य लिखना एक ‘पंगा’ है। लोग सोचते हैं कि मुझे क्या, मैं जो कर रहा हूं, उसमें मेरा ठीक चल रहा है तो मैं क्यों लिखूं। ज्यादातर कलाकार सामाजिक मुद्दों से बचकर निकल जाते हैं। समाज की बात कहना हर कलाकार का कर्तव्य बनता है।
हां, और इसकी एक स्वस्थ परंपरा रही है हिंदी सिने जगत में..
क्या है कि जैसा मैंने कहा सामाजिक व्यंग्य बनाने के लिए आपको असाधारण काम करना जरूरी है। सामाजिक व्यंग्य बनाना कलाकार के लिए एक पंगा है लेकिन महमूद ने बनाई ना फिल्म। महमूद की फिल्म ‘कुंआरा बाप’ सामाजिक सरोकार का बेहतरीन उदाहरण है। उनके बच्चे को पोलियो हो गया था तो लोग अपने बच्चों को पोलियो का टीका लगवाएं, इसलिए उन्होंने बनाई थी ये फिल्म।
मनोरंजन का इन दिनों व्यक्तिगत मनोरंजन और सामाजिक मनोरंजन में विभाजन हो चुका है? आप क्या देखते हैं इन दिनों?
मैं ओटीटी पर गाली गलौज वाली सामग्री नहीं देखता देता हूं। सीधे फास्ट फारवर्ड कर देता हूं। क्या है कि अच्छी फिल्म बनाना आसान काम नहीं है। और, पारिवारिक मनोरंजक फिल्म बनाने के लिए बहुत मेहनत चाहिए। अच्छी फिल्म के लिए चुस्त पटकथा और मजबूत निर्देशन जरूरी। मैं मानता हूं समय के साथ कलाकार का भी विकास होता रहता है और सामग्री का। लोगों के पास अपनी पसंद है कि वे क्या देखें और क्या नहीं?
मनोरंजन के डिजिटल माध्यम के लिए आप क्या कुछ नया कर रहे हैं?
बन रही हैं योजनाएं। मैं मानता हूं कि मनोरंजन की तकनीक से जुड़ना बहुत जरूरी है। समय के साथ कदम ताल करना जरूरी है। अभी जैसे सुनील ग्रोवर अच्छा कर रहे हैं, कृष्णा अभिषेक हैं, सुदेश लहरी, कपिल शर्मा अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन, मंच पर स्टैंड अप कॉमेडी करने से फिल्म अभिनय बहुत अलग है।