बॉलीवुड में कई फिल्में मुगल पृष्ठभूमि पर बनती रही हैं। ये आज से नहीं बल्कि बहुत पहले से ही चला आ रहा है। इन फिल्मों के लिए ऐसे अभिनेताओं का चयन किया जाता है जो इन भूमिकाओं में एकदम फिट बैठें। कई अभिनेता ऐसे भी रहे जिनके ऊपर इन किरदारों को करने की वजह से मुगल शहंशाह का ठप्पा ही लग गया। ऐसे ही एक अभिनेता रहे हैं बॉलीवुड में जो मुगल सम्राट के किरदार में एकदम फिट बैठा करते थे। ये अभिनेता भाषा से तो बंगाली थे। लेकिन उर्दू भाषा में इनका सानी कोई नहीं रहा है। ये अभिनेता हैं प्रदीप कुमार...
बॉलीवुड के मुगल शहंशाह जो पर्दे के पीछे काम करते-करते आ गए सामने, उर्दू में नहीं रहा कोई इनका सानी
प्रदीप कुमार ने पर्दे के पीछे रहकर भी कई कलाकारों को तराशा है। ऐसे में खुद उनका पर्दे के सामने आकर अभिनय करना उनके साथियों को बेहद खुश कर गया। प्रदीप ने अपने एक इंटरव्यू के दौरान अपने इस अनुभव को बताया था। इस दौरान जब प्रदीप से पूछा गया था, "आप जब फिल्मों में आए थे तब कैमरे के जरिए आर्टिस्टों को देखा करते थे। लेकिन अब जब आप कैमरे के सामने आ गए हैं ये बदलाव आप कैसे महसूस करते हैं?" इस सवाल का जवाब प्रदीप ने बेहद खूबसूरती के साथ दिया था।
प्रदीप ने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि, 'आइने के पीछे आइना नहीं होता। लेकिन जो मवाद उसके पीछे लगाया जाता है। वही आइने को आइना बनाता है। इसी तरह कैमरे के पीछे जो हस्ती होती है वो कैमरे के सामने काम करने वालों का डायरेक्टर रहता है और डायरेक्टर हमेशा पर्दे के पीछे रहता है। अब देखो ना दुनिया नाम की इतनी बड़ी फिल्म बनाने वाला खुदा भी तो सात पर्दों के पीछे रहता है। इसी तरह मेरी पहली बंगाली फिल्म 'अल्कानंदा' में कैमरे के सामने आते ही असिस्टेंट डायरेक्टर प्रदीप को लगा कि आइने का मवाद खुद आइना बन गया।'
प्रदीप कुमार खुद बंगाली पृष्ठभूमि के अभिनेता थे। लेकिन उर्दू भाषा में उनका सानी कोई नहीं था। ऐसे में जब उनसे पूछा गया कि बंगाली होते हुए आप इतनी अच्छी उर्दू कैसे बोल लेते हैं? तो इसके जवाब में उन्होंने बताया था कि, 'लोग कहते हैं कि रास्ते हमें मंजिल पर ले जाते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि हमारे कदम के साथ हमारी लगन, हमारी हिम्मत, हमारी दीवानगी, ही मरहले तय करके हमारी मंजिल को सामने ले आती है। मेरी मातृ जबान बंगाली में उर्दू की चाशनी घोलने का मौका मुझे तब मिला। जब फिल्म इंडस्ट्री की तीन बड़ी अभिनेत्रियां नरगिस, मधुबाला और मीना कुमारी के साथ जिंदगी का एक खूबसूरत मोड़ आया। उनके परिचय के आते ही उर्दू का शौक और बढ़ा और एहले जबान साथियों ने मेरी जुबान पर उर्दू की शिरनी रख दी और नतीजा तो सभी देख ही रहे हैं।'
प्रदीप कुमार ने काफी समय तक फिल्मों में बतौर मुख्य अभिनेता अभिनय किया। लेकिन कुछ समय के बाद उन्होंने कैरेक्टर आर्टिस्ट का किरदार निभाना शुरू कर दिया। ऐसे में जब उनसे पूछा गया था कि आप रोमांटिक हीरो रहे और अब आप कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं, लोगों के व्यवहार में आपने बदलाव महसूस किया? इसके जवाब में प्रदीप कुमार कहते हैं, 'पुख्तगी को गिरावट कहने वाले मेरी नजर में बेवकूफ हैं। अभिनय तो हर जगह अभिनय है। चाहे वो बुजुर्ग हो, जवान हो, गुमनाम हो या मशहूर, अमीर हो या गरीब। हम सब अभिनय के सौदागर होते हैं। हमें अपना नहीं बल्कि किसी दूसरे की पसंद का सौदा करना पड़ता है। इसलिए मुझे तो कभी कोई फर्क महसूस नहीं हुआ। बाकी जिसने मुझे जिस निगाह से देखा हो उसने कोई फर्क महसूस किया हो तो पता नहीं।'
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