भले गणेश गायतोंडे बनकर नवाजुद्दीन सिद्दीकी को कैमरे के सामने लगा हो कि अपुन ही भगवान है, लेकिन ये उनको भी अच्छी तरह पता है कि हिंदी सिनेमा में तमाम बड़े सितारों के सामने उनकी फिल्मों को रिलीज करने में कितनी दिक्कतें होती हैं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने हाल के दिनों में अपने तेवर बदले हैं और हमेशा लंबी लंबी हांकने के लिए चर्चित रहने के बाद अब वह हकीकत के करीब वाली बातें ज्यादा करते हैं। नवाजुद्दीन का ये बदला रूप उनके प्रशंसकों की गिनती भी फिर से बढ़ा रहा है।
बदले बदले से इन दिनों नवाज नजर आते हैं, समझिए कि आखिर क्या है बर्ताव में बदलाव का ये पूरा मामला
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अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी इन दिनों अनौपचारिक बातचीत में इस बात से बहुत खुश दिखते हैं कि साल 2020 में उनकी दो फिल्में बहुत अच्छे से रिलीज हुईं और लोगों ने उनकी सराहना भी की। लेकिन, सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली अपनी फिल्मों के अच्छे प्रदर्शन न करने पर उन्होंने एक बहुत बड़ी बात भी कही। नवाज के मुताबिक, सिनेमाघरों में जब उनकी फिल्म रिलीज होती है तो उन्हें समीक्षक तो सराहते हैं लेकिन दर्शकों तक वह फिल्में पहुंच ही नहीं पातीं। उसका कारण यह है कि फिल्म को अपेक्षित संख्या में सिनेमाघर ही नहीं मिलते।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी की इस साल ओटीटी पर कई फिल्में रिलीज हुई हैं जिनमें 'सीरियस मैन' और 'रात अकेली है' में उनके किरदार को काफी सराहना भी मिली। नवाजुद्दीन का कहना है कि लोग ओटीटी पर सामग्री देखकर फिल्मों के प्रति थोड़े शिक्षित बन रहे हैं और उन्हें अब कहानियों की समझ हो रही है। यहां उन कलाकारों को भी सराहना मिल रही है जिनके लिए सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्मों में पहचान बनाना बहुत मुश्किल होता है। इसका कारण नवाजुद्दीन ने सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्म में होने वाले स्टार पॉवर को बताया है।
एक इंटरव्यू के दौरान नवाजुद्दीन ने कहा कि जब कोई फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज होती है तो उसके साथ सीधे तौर पर एकाधिकार जैसा भाव पैदा किया जाता है। जब किसी सुपरस्टार की फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज होती है तो वह आराम से पांच हजार सिनेमाघरों तक पहुंच जाती है। वह फिल्म कितनी भी बेकार होगी तो भी पहले दिन में उसके 20 करोड़ रुपये तो कहीं नहीं गए। लेकिन, वहीं अगर कोई छोटे बजट की और किसी छोटे कलाकार की फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज होती है तो उसे स्क्रीन ही नहीं मिलतीं।
नवाजुद्दीन का कहना है कि सुपरस्टार की फिल्में पहले दिन में पैसे ज्यादा कमा लेती हैं इसलिए उसे सुपरहिट बता दिया जाता है जबकि छोटे बजट की फिल्में स्क्रीन ज्यादा न मिलने की वजह से पहले दिन में अच्छी कमाई नहीं कर पातीं। हालांकि, हफ्ते में बाकी के छह दिन और भी बचते हैं लेकिन उन पर कोई ध्यान नहीं देता। पहले ही दिन छोटे बजट की फिल्म को फ्लॉप करार दे दिया जाता है। छोटे बजट की जो फिल्में रहती हैं उन्हें लोग तब देखने जाते हैं जब एक देखकर आया और वह दूसरे से कहे। इसी तरह फिल्म को सिनेमाघरों में कुछ दिन टिकने की जरूरत होती है। फिल्मों के साथ यह सौतेला व्यवहार बहुत गलत है।
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